नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संख्या को द्विगुणित करे तथा द्विगुणित करने के पश्चात् उस संख्या के
अन्तिम द्विगुणित रूप वाले गुरु से एक निकाल दे। इसके पश्चात् लघुस्थ
द्विगुणित संख्या को पिण्ड रूप में (महायोग के रूप में) एकत्र कर जोड़
दें। [यही उद्दिष्ट क्रिया है।] [१०]
सम संख्या के सम संज्ञक वृत्त को आदि पाद को सर्व गुरु से युक्त और
अन्तिम को सर्व लघु वाला समझना चाहिए। कोश अर्थात् मध्यवर्ती सभी
पादों में मिश्र रूप रहता है अर्थात् सर्वादि और सर्वान्त पादों के मध्यवर्ती
पादों में गुरु लघु मिश्रित रूप में होते हैं। [११]
समान (संख्या वाले) वृत्तों की समास अर्थात् जोड़ी गयी संख्या को
उतने प्रकार से जोड़ लें। इसी तरह समान जोड़ी हुई संख्याओं में अर्धविषम
संख्या वाले छन्दों में एक राशि को घटा कर बतलावे। [१२]
एकादिकां तथा संख्यां छन्दसो विनिवेश्य तु¹।
यावत् पूर्णन्तु पूर्णेन पूरयेदुत्तरं² गणम् ॥ [१३]
³समानां विषमाणां च संगुणय्य तथा स्फुटम्⁴।
राश्युनामभिजानीयाद्विषमाणां ५ समासतः ॥ [१४]
एवं ६कृत्वा तु सर्वेषां परेषां पूर्वपूरणम्⁷।
⁸क्रमान्नैधनमेकैकं ⁹प्रतिलोमं विसर्जयेत् ॥ [१५]
सर्वेषां छन्दसामेवं¹⁰ लध्वक्षरविनिश्चयम्।
जानीत समवृत्तानां ¹¹संख्यां सङ्क्षेपतस्तथा ॥ [१६]
संख्या के ज्ञान के उपाय को दिखलाते हुए कहते हैं कि—छन्द की
एकादिक संख्या का क्रमशः निवेश कर के जब तक पूरा नहीं हो तब तक पूर्व
पूर्व गण से उत्तरवर्ती (उत्तर) गण को पूर्ण करे। [१३]
इस प्रकार सम एवं विषम मात्राओं की संख्या को स्पष्ट रूप से गुणन
कर समास अर्थात् जोड़ लगाने के पश्चात् विषम वृत्तों की राशि को घटा दे
१. च—क०। २. तावतोऽन्तरं—क (च०)। ३. समार्ध—क.
(न०); तात्त्वार्थविषमाणां तु—क (भ०)। ४. संख्यां कृत्वा तु तावतीम्-
क (न०); संख्यां संयोज्य तावतीम्—क (ढ०)। ५. मभिजानीत—क
(न०), मभिजानीते—क (ढ)। ६. कुर्यात् तु सर्वेषां—क (ड),।
७. पूर्व पूर्वस्य पूरणम्—क (ड),। ८. नैधनादेकमेकं तु—क०। ९. प्रति-
लोम्यक्रियात्मकम्—क०। १०. छन्दसां न्यस्य—क०। ११. व्याससङ्क्षे-
पतस्तथा—क (भ०); संख्या चाङ्गं समासतः—क०।