नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
४१४ नाट्यशास्त्र
२१. बद्धा-चारी :-यहाँ ऊरुओं का वलन करना ही 'जंघास्वस्तिक' पद
का आशय है । जंघाओं के सम्यक् बन्धन हो जाने के कारण इसका 'बद्धा'
नामकरण किया गया है ।
२२. ऊरुद्वृत्ताचारी :-इसमें अग्रतलसंचर पाद की एडी जब दूसरे
पैर के पृष्ठभाग की ओर उन्मुख हो और जानुओं के झुकने से जंघा
आकुञ्चित होकर दूसरी जंघा के सम्मुख वलन से उद्वृत्ता की स्थिति लेले
तो 'ऊरुद्वृत्ता' होती है। क्योंकि इसमें ऊरुओं के ऊपर विवर्तन या वलनक्रिया
रखी जाती है। इसकी लज्जा या ईर्ष्या के भाव प्रकाशन में योजना रखी
जाती है । अन्य आचार्यों के मत में एडी को द्वितीय अग्रतलसंचर पाद के
बाहर की ओर रख कर इस चारी को प्रस्तुत किया जाता है ।
२३. अड्डिता-चारी :-अड्डधातु अतिक्रमण तथा हिंसा अर्थ में पठित
है इसमें इतच् प्रत्यय से अड्डिता शब्द निष्पन्न है। इसमें एक पाद सम-
स्थित और दूसरा तलसञ्चर की स्थिति में आगे और पीछे क्रमशः श्लिष्ट होता
है । इसमें पाद अपने स्थान से अतिक्रमण करता है अतः इसे 'अड्डिता'
कहते हैं ।
२४. उत्स्पन्दिता-चारी :-इसमें एक पैर की कनिष्ठिका अंगुली के
बाहरी भाग और दूसरे पैर के भीतरी भाग से निवर्तन होता है । वह पैर
का अपसारण रेचितपाद को अवधि कर करके रखा जाता है । चारी में
शोभाबृद्धि के लिये यह अपसारण रखा जाता है । यह क्रिया नदी के प्रत्यावर्तन
रूप स्पन्दित के तुल्य रहने से इसका उत्स्पन्दिता नाम है। जिसमें रेचक नृत्त-
हस्त रहता है ऐसा अन्य आचार्यों का मत है ।
२५. जनिता-चारी :-इसमें तलसञ्चरपाद से गमन किया जाता है ।
यह समस्त गतियों की जननी अर्थात् उत्पादिका होती है तथा इसी से गतियों
का आरम्भ किया जाता है । यही इसकी व्युत्पत्ति भी है। इसमें मुष्टिका-
कार हस्त का वक्षःस्थल पर विन्यास तथा अन्य हस्त का प्रसारण केवल इति-
कर्तव्यता को दिखलाने के लिये रखा गया है ।
२६. स्यन्दिता तथा अपस्यन्दिता-चारी :-इन दोनों चारियों का एक
साथ विवरण दिया गया है। इसमें समस्थित एवं निषण्ण ऊरू वाले दाहिने
पैर को पञ्च तालों के अन्तर से फैला दिया जाता है । इस फैलाने रूप धर्म के
कारण इसका नाम भी 'स्यन्दिता' हो गया है। इसी के विपर्यय या विपरीत
स्थिति से 'अपस्यन्दिता' चारी निर्मित हो जाती है। यहाँ प्रश्न होता है
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१५
कि स्यन्दिता का ही विपर्यय अपस्यन्दिता क्यों माना जाए, अपस्यन्दिता
विपर्यय स्यन्दिता क्यों नहीं है ? इसके उत्तर में यही समझना चाहिए कि
'अपस्यन्दिता' शब्द में लगाया गया 'अप उपसर्ग' ही इस को विपर्यय में
ला बैठाता है ।
२७. समोत्सारित-मत्तल्लीचारी :—इसमें परस्पर जंघाओं के वेध से
किये जाने वाले स्वस्तिक के बीच या जब एक तलसंचरपाद हो तब
दूसरा तलसंचर उसी समय होता है और दोनों ऐसे घूर्णमान या घूमते हुए
पादों का जो उपसर्पण है वही इस चारी को बनाता है । इस चारी में—
एक सम या अविकल रूप में उत्सारित तथा दूसरी मत्तल्ली अर्थात् मद से
विकल न होना या रक्षार्थ अन्यत्र पलायन करना—इस प्रकार की दो गतियां
रहती हैं । इसकी मध्यममद के अभिनय में योजना की जाती है ।
२८. मत्तल्लीचारी :—इसमें अग्रतलपाद भूमि में लगता या श्लिष्ट
रहता है । यहाँ पैर जंघा स्वस्तिक के योग से अर्ध त्र्यश्र ( आधा तिरछा )
होने से तथा पैरों के घूर्णन और अपसर्पण करने के कारण यह 'मत्तल्ली'
चारी होती है । इसकी प्रगाढ़मद में योजना रखी जाती है ।
२६. इन चारियों का प्रयोग नियुद्ध या बाहुयुद्ध या मल्लयुद्ध में तथा
इससे भी अधिक रूप में क्रमशः करण, अङ्गहार और नाट्य के प्रस्तुतीकरण
में रखा जाता है । आगे आकांशिकी चारी के क्रमशः लक्षण वर्णित हैं ।
३०. अतिक्रान्ताचारी :—इसमें कुञ्चितपाद ( १०।५३ ) को दूसरे
पैर के घुटने के क्षेत्र में रख आगे की ओर फैलाया जावे और चतुस्ताल की
दूरी तक ( पैर को ) ऊपर उठाकर भूमि पर गिराते हैं । गन्तव्य के अति-
क्रमण करने के कारण इसका 'अतिक्रान्ता' नामकरण है ।
३१. अपक्रान्ताचारी :—इसमें वद्धाचारी को पहिले सम्पादित कर फिर
पैर को ऊपर उठाकर बाजू में क्षिप्त या अपक्रमणदशा में रखते हैं । अपक्रमण
करने से इसे 'अपक्रान्ता' कहा गया है ।
३२. पार्श्वक्रान्ताचारी :—इसमें कुञ्चित पाद को अपनी बगल से ऊपर
की ओर ले जाकर भूमि पर एडी को गिराया जाता है । इसलिये कुञ्चितपाद
के बल से एडी का उद्घट्टित होना यहाँ सूचित होता है । अन्य आचार्य कहते
हैं कि द्वितीय पाद को उसके क्षेत्र तक उत्क्षिप्त रख कर उद्घट्टित कर भूमि
पर पटका जाता है यही 'पार्श्वक्रान्ता' है ।
३३. ऊर्ध्वजानुचारी :—यहाँ 'क्रमस्तब्ध' पद से पाद के उत्क्षेपण के
बाद उसे निश्चल करना ही 'स्तब्धता' होती है ।
४१६ नाट्यशास्त्र
३४. सूचीचारी :-जानु से ऊपर ऊरु तक जंघा को पूरी फैला कर
अग्रभाग से भूमि पर गिरावे । इस प्रकार यह 'सूची' के आकार की होने से
'सूची' कहलाती है।
३५. नूपुरपादिका-चारी :-यहाँ 'पृष्ठतः' पद का भाव है कि 'अंचित'-
पाद को पीछे की ओर एड़ी को छूते हुए अन्त तक ले जावे । बाजू में उस
'अग्रतल-संचर' पैर को पृथ्वी पर पटका जाए । ऐसा करने पर नूपुरों की
झनझन आवाज निकलेगी जिससे शीघ्रता प्रकट होगी तथा नूपुरों की योजना
भी । इसी आधार पर इसका नामकरण भी हुआ है ।
३६. दोलपादाचारी :-यहाँ 'उत्क्षिप्य' पद से आशय है कि कुञ्चित-
पाद को दक्षिणपाद के क्षेत्र तक बगल में ले जाए और फिर वहाँ दोला के
आकार में स्पन्दित कर बाद में उसे एड़ी की बाजू में पृथ्वी पर पटके । यह
'दोलपादा' का स्वरूपानुसारी नाम है ।
३७. आक्षिप्ताचारी :-यहाँ 'आक्षिप्त' पद से आशय है कि कुञ्चितपाद
को आगे तीन ताल के अन्तर में ऊपर उछाल कर अंचित के अर्धमण्डल आकार
में दूसरी बाजू में ले जावे और स्वस्तिक कर पृथ्वी पर पटके ।
३८. आविद्धा-चारी :-विश्लिष्ट जंघावाले स्वस्तिक बने कुञ्चितपाद
को फैलाया जाए और उसी 'आविद्ध' अर्थात् संश्लिष्ट उसी पाद को बाजू में
द्वितीय पार्ष्णि (एड़ी) के क्षेत्र में तदनुसार पटके ।
३६. उद्वृत्ताचारी :-यह चारी आविद्धा की शेषभूता मानी जाती
है । इसमें आवेष्टन अर्थात् दूसरे ऊरु के क्षेत्र की पार्ष्णि तक उछाल लेकर
'भ्रमरक' की तरह एक पाद को पृथ्वी पर पटकना होता है; और फिर दूसरे
पाद का इसी प्रकार ऊपर उद्वर्तन करना रहने से इसे 'उद्वृत्ता' (यथार्थ
नामा) कहते हैं ।
४०. विद्युद्भ्रान्ता-चारी :-'पृष्ठतः' अर्थात् पीछे की ओर ऊरु के मूल
में घुमावे किन्तु इसका आशय सही यह है कि बाजू के पीछे वलन कर मस्तक
को छू ले फिर इसी के अनुसार उस पैर को अगल बगल सभी ओर गोल
चक्कर में घुमा कर फैला दिया जाए ।
४१. अलाता-चारी :-इसमें पहिले पाद को को पीछे की ओर फैलाकर
फिर घुमा कर भीतर लिया जाए, इसके बाद द्वितीय ऊरु पर अभिमुख तल
कर उसे रखे तथा इस प्रकार करते हुए अपने पास वाली एड़ी के पास
उसे पटके । यह अलातचक्र की आकृति में आने से 'अलाता' है ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१७
४२. भुजङ्गत्रासिता-चारी :-कुञ्चितपाद को दूसरे ऊरु के क्षेत्र तक
ऊपर उठा कटि के बराबर ले जाकर जानु की ओर लौटा ले तथा नितम्ब
के सम्मुख तिकौनी या टेढ़ी एड़ी को उसी पर विवर्तित करे । इसके पश्चात्
बगल की जानु पर एक पैर को उत्तानतल में स्थापित करे । पैर के समीप
सर्प के आने पर भय से इधर उधर भागने वाले की तुलना से निर्मित यह
'चारी' नामानुरूप अपनी क्रिया के प्रदर्शन के कारण सार्थकनामा है ।
४३. हरिणप्लुताचारी :-अतिक्रान्ता चारी के प्रकरण में कथित
कुञ्चितपाद को उत्क्षिप्त कर (उछाल कर) उसे पृथिवी पर पटके । फिर दूसरी
जँघा के पृष्ठ भाग पर अञ्चित पैर रखे। इस प्रकार मृग की प्लुति (उछाल) के
तुल्य यह चारी रहती है। इसकी विदूषक की गति में योजना रखी जाती है ।
४४. दण्डपादा-चारी :-('नूपुरपाद' में कथित ) अञ्चितपाद को
दूसरे पैर की एड़ी पर ले जाकर शीघ्रता से फैलावे । इस प्रकार ऊरु, जानु
एवं जंघा की स्तब्धता से पैर के दण्डाकार स्थिति में आने के कारण इसे
'दण्डपादा' चारी कहा गया ।
४५. भ्रमरी-चारी :-अतिक्रान्ता चारी में कथित कुञ्चितपाद को ऊपर
कर सांप से डरे हुए की तरह तिरछी ऊरु को विवर्तित करे और फिर द्वितीय
पाद तल के घूमाने में त्रिक का भी एक घुमाव ले ले । इस प्रकार समग्र शरीर
के घुमाव से नेमि की तरह चक्कर लगाने के सदृश स्थिति रखने के कारण
इसका नाम 'भ्रमरी' है ।
४६. अब इनकी योजना को दिखलाते हैं कि इन चारियों में अङ्गों की
क्रिया का अभिनय सुन्दरतापूर्ण होना चाहिए और धनुष, वज्र आदि शस्त्रों के
छोड़ने में इनका विनियोग रखना होता है ।
४७. इन्हीं चारियों के विनियोग की व्यापक सीमा को दिखलाकर
शरीर की शोभा में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान बतलाते हैं—'अथंगौ' इत्यादि
के द्वारा । इसका आशय यही है कि इनमें कभी गति की प्रधानता रखी
जाती है तथा कभी हस्तों के व्यापार रूप अभिनय की और कभी दोनों की
भी । इनमें प्रथमपक्ष में हस्तों को पादविक्षेप के अनुसार रहने वाले तथा
पादविक्षेप के बाद व्यापृत रखना होता है । द्वितीय में हस्ताभिनय के अनुगत
एवं उनके पीछे पैरों की गति रखी जाती है तथा तृतीयपक्ष में दोनों की
प्रवृत्ति एवं व्यापार एक ही समय में विनियोग की अपेक्षा से रहेंगे । यहाँ
कारिकास्थ योग शब्द भी इसी तथ्य को प्रकट करता है ।
४८. उपाङ्ग = भ्रू, नेत्र आदि अवयव !
२७ ना० शा० द्वि०
४१८ नाट्यशास्त्र
४६. पाद क्रिया के समय यदि हस्ताभिनय भी हो तो पाद की गति
विश्रान्त हो जाती है अतः ऐसे समय हस्त की क्या दशा हो इस आशंका
के उत्तर में कहते हैं कि पादचारी की समाप्ति पर हस्त को कटिप्रदेश में
रखा जाता है ।
५०. पैरों को पृथ्वी पर रखने पर पादचारी के समान होने पर काय
का सन्निवेश बतलाने के लिये स्थानकों को बतलाना क्रम प्राप्त हो जाता है ।
‘स्थान’ शब्द भाव, अधिकरण या करण अर्थ में व्युत्पन्न है ( स्थीयन्ते इति
स्थानाति, तिष्ठन्त्येषु इति स्थानानि, तिष्ठन्त्येभिरिति स्थानानि ) । अतः
इसके अनुसार चारी के द्वारा कायसन्निवेश भी होता है अर्थात् चारियाँ प्रथम
गतिरूप होती हैं तथा बाद में जब स्थितिरूपा हो जाती हैं तो उन्हें स्थानक
या स्थान कहा जाता है ।
५१. छः स्थानकों के नाम दिखलाकर सर्व प्रथम वैष्णवस्थान का स्वरूप
दिखलाते हैं ।
५२-५४. वैष्णवस्थानः- पक्षः स्थित पद से अंगुलियों की बाजू में
[L
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१९
६५-६७. मण्डलस्थान :--घोड़ों तथा हाथियों के संचालन के समय
वैशाखस्थानक का उपयोग होता है उनसे भी स्थूल वाहन गरुड़ पक्षी आदि है
उसके निरूपण में मण्डलस्थान की योजना होती है ।
६७-७०. आलीढ़ स्थान :--आलीढ़ कहते हैं जिसमें चारों ओर से भूमि
का स्पर्श होता हो । सम्फेट का अर्थ है संघर्षपूर्ण दशा ।
७०-७२. प्रत्यालीढ़ स्थान :--इस स्थान में उत्तान तथा आकुञ्चित
पाद रहता है जो प्रसारण के विपरीत है । स्थानों से शस्त्र विमोक्षण का
विधान पूर्व में बतलाया गया है तथा इसी में सहायक होते हैं न्याय । अतः
न्यायों के अनुसार वृत्तियों के विभाग में स्थान अंगभूत हो जाते हैं यही यहाँ
समझाया है ।
७२-७६. हन्तव्य के कटि, पाद, वक्षःस्थल एवं शिर स्थानों पर अति-
क्रमण के लिये नाट्यशास्त्र में चार न्याय बतलाये गये हैं । अङ्गों के औचित्य
से न्याय का आश्रय लिया जाता है । न्यायों से प्रवृत्त होकर ही अंगों के स्वरूप
स्वाभाविक एवं उत्कृष्ट नियमन दर्शा सकते हैं । क्योंकि उन्हीं से क्रियायें
होती भी है अतः इसकी 'न्याय' आख्या इसी कारण सार्थक है ।
७६-८०. भारतन्याय :--परिवेष्टन करते हुए ले जाना यहाँ 'परिगम'
है । उद्वेष्टित = चारों ओर से उद्वेलित किया हुआ । अतः कलाई में उद्वेष्टन
करके शस्त्र का उद्बन्धन किया जाता है ।
८१-८२. सात्वतन्याय :--पृष्ठतः = शरीर के पिछले भाग या पीछे से ।
८२-८४. वार्षगण्यन्याय :--इसमें शस्त्र का घुमाना ऊपर ही से मस्तक
का एक चक्कर लगाते हुए कराते हैं ।
८४-८८. कैशिकन्याय :--इसमें शस्त्र को अन्त में मस्तक पर ले जाया
जाता है । समग्र युद्ध का अभिनय सौष्ठवपूर्ण आंगिक व्यापारों के द्वारा
सम्पन्न किया जाना चाहिए । युद्ध के प्रसंग में ( ऐसे युद्ध के समय ) छेदन
भेदन भी पात्रों के अङ्ग का हो सकता है । अतः इस विषय में यह बात ध्यान
में रखने की है कि रंगमञ्च या अभिनय के स्थल पर भेदन आदि नहीं होना
चाहिए । यहाँ ऐसी चेष्टाएँ रखी जाये कि प्रेक्षक गण को केवल युद्ध का भान
हो सके । ऐसे विषय या प्रसंग नाटक या प्रकरण में यदि रखे जायें तो युद्ध
को केवल संज्ञा ( इङ्गित या चेष्टाओं ) के द्वारा दिखलाया जाए । यही
यहां उचित माना गया है । यहाँ 'अथवा' पद के द्वारा व्यवस्थितविकल्प की
सूचना दी गयी है ।
८८-६०. सौष्ठव :--अङ्गों के प्रसंग में पूर्व में जिस सौष्ठव को कहा
४२० नाट्यशास्त्र
गया था उसकी अब परिकर सामग्री बतलाते हैं—'व्यायाम' इत्यादि से। यहाँ
व्यायाम पद का अर्थ अंग विषयक प्रशिक्षण एवं अभ्यास के उपयुक्त काल है
जिसके परिणाम स्वरूप द्रुत, मध्य एवं विलम्बित चच्चत्पुटादि ताल के अंग का
(यहाँ) पठन किया गया है। (उसका अनुगमन कर के ही शारीर चेष्टाओं
को युद्धादि प्रसंग में प्रदर्शित करना अभीष्ट है)।
६०-६१. सन्नगास्त्र = जिसका शरीर थक गया हो तथा विश्रान्ति ग्रहण
कर रहा हो। कूर्परांसशिरः = कूर्पर (कोहनी), अंस (कन्धे) तथा शिर—
ये सभी अंगों का प्राण्यङ्ग होने से यहाँ एकवद्भाव हुआ है।
६२-६३. चतुरस्रता :-- जिसके लिये सौष्ठव का विधान किया जाता
है। यहाँ कटिनाभिचरौ पद से आशय है कि कटि और नाभि पर हाथ क्रमशः
तथा एक साथ भी स्थित रखे जायें।
६३-६५. खड्ग युद्ध में जिन न्यायों को बतलाया वे ही धनुर्युद्ध में भी
होते हैं, अतः धनुर्
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४२१
से शरीर दृढ़ है वह सुडोल आकार वाला भी होगा ही तथा ऐसे व्यक्ति को
जिस कार्य में लगाया जाए उसमें उपयुक्त होने से नाट्य प्रयोग में सफलता
प्राप्त होती है । गात्रों में माधुर्य का अर्थ है उनका सुन्दर या सुडोल दिखलाई
देना ।
१०१-१०२. अङ्गक्रिया = अङ्ग-सिद्धि । अङ्गों के अनुसार प्राप्त चारी
की परम्परा से निर्मित स्वरूप वाले मण्डलों का विवरण अब दिया जा
सकता है, इस तथ्य को चारी के निरूपण के उपरान्त ही बतला कर चालू
अध्याय समाप्ति तथा अगले अध्याय में मण्डल के प्रतिपादन की बात को भी
दिखलाया गया है ।
:
The ही has: ह with ी. The top loop of ी curves to the right and down to a vertical line on the right.
Now look at Word 1 in दस मण्डल [?] है:
It has ह with ो! Wait, does it have a loop to the right?
Wait, it has a vertical line on the right, and an oblique stroke to the left top: that is ो!
Wait, does it say हो?
Wait, if it is हो, then हो है? Or ही है?
Wait, look at the top of that letter:
The curve goes to the right!
Wait, let me look at ही in line 5: बनता है वही 'मण्डल'.
In line 6: ( आगे भी ) इसी प्रकार.
In line 11: दिखलाया गया है ।
In line 17: इसी को 'आस्कन्दिता' भी कहते हैं ।
Look at ही in इतने ही (line 8): ह and ी.
Now look at the word before है in line 8:
Wait, could it be होते हैं? No, it's 2 letters: हो and है? Or ही and है?
Wait, look at हो in line 10: हो जाती है.
Notice
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १२ ४२३
६६-६७. परं चैव में 'च' पद का अर्थ 'अपि' लेना चाहिए । अर्थात्
इसके बाद भी मण्डलों का प्रयोग किया जाय । कैसे किया जाए का—उत्तर
है समचारी से । अर्थात् पारस्परिक योजनां से प्राप्त चारियों का ( औचित्य
या अपेक्षा के अनुसार ) यहाँ वहाँ सर्वत्र प्रयोग करना चाहिए ।
आचार्यात् — आचार्य की बुद्धि से प्रयोग किये जाए अपनी ऊहा से नहीं ।
६८. खण्डों का भी मण्डलों के साथ रहने से प्राधान्य दिखलाया गया
है । 'वाद्येन अनुगतानि' इससे यह बतलाया गया कि यहाँ चतुर्थ अध्याय
में नृत्त के उपयोगी विषयों में प्रतिपादित गति से विपरीत या भिन्न नाटकीय
गति में मण्डलों की प्रमुखता रखनी अभीष्ट है ।
त्रयोदश अध्याय
( गतिप्रचार )
१. यहाँ 'मण्डलकल्पनं' पद से जो चारी के संयोग या मिश्रण से मण्डल
निर्मित होते हों, उनके स्वरूप की कल्पना आचार्य के द्वारा नहीं बतलाने
पर भी स्वयं लक्षणों को देख कर अपनी बुद्धि से समझ लिया जा सकता
है। यहाँ एक प्रश्न फिर भी बना ही रहता है कि जब पिछले अध्याय में
चारी के संयोग से निर्मित मण्डलों को तो बतलाया परन्तु आचार्य ने उन
मंडलों की योजना या विधान क्यों नहीं बतलाया। इसके उत्तर में यही कहा
जा सकता है कि चारीमण्डल का प्रसंग चित्तवृत्ति रूप नहीं है कि उन्हें रस
एवं भाव की उपयोगिता में बतलाया जाए। अतः रस एवं भाव के अनुसार
की जाने वाली गतियों के विनियोग बतलाये गये हैं तथा इसी कारण मुनि
ने पृथक् से इस विषय पर (अलग से या स्वतन्त्र) एक अध्याय भी रखा है।
यह गति प्रकृति या पात्र के दिव्य, अदिव्य एवं दिव्यादिव्य रूप (और)
उसकी अवस्था और देशकाल की अपेक्षा को देख कर रखी जाती है। यह
गति प्रत्येक पुरुष की भिन्न-भिन्न होती है जिसे आगे बतलाया भी जाएगा।
अतः प्रथमतः उसकी प्रक्रिया दिखलायी गयी।
२-३. अभिनय के आरम्भ में नान्दी के उपक्रम के साथ प्रयोग के
उपक्रम में कैसी गति रखी जाए। यही 'तत्रोपवहनं' से आरम्भ किया गया।
उपवहन-विधि के उपरान्त मंच पर प्रविष्ट सूत्रधार तथा उनके सहयोगी,
नट, नटी (आदि) के साथ जो अभिनेय-विषयक संवाद हों उनके बाद
क्योंकि इस के पूर्व नान्दी हो चुकी रहती है। यहाँ यही तथ्य 'ध्रुवागीति'
के हो जाने के द्वारा सूचित किया गया है। 'ध्रुवागीति' देश, रस तथा
पात्र के अनुगत विषयों में उपनिबद्ध रहना चाहिए। पट या यवनिका के
हटाने के उपरान्त पात्र प्रवेश के समय भी उपोहन क्रिया की जाए। जिसके
बीच में नटी (पात्र) का प्रवेश अंगों के वलन क्रिया के सम्पादन के साथ
रखा जाए। यद्यपि स्त्रीपात्र का प्रवेश शरीर के स्वाभाविक वलन कर्म
के साथ ही होता है। अतः उसे शब्द से बतलाने की यद्यपि आवश्यकता नहीं
है फिर भी कोहल आदि आचार्यों के मत में यहाँ ऐसी गति विहित
या इष्ट है। इस समय शुष्काक्षर गान कर समुचित स्थान, दृष्टि एवं
तत्काल उपयुक्त मुखरागादि से युक्त हो कर पात्र को प्रवेश करना चाहिए
जिससे सामाजिकों को शीघ्र ही सम्बद्ध अर्थ या विषय की प्रतीति हो जाए।
इस समय गीत भी उत्तम रखा जाए जिससे सामाजिक या दर्शक उत्सुक
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२५
हो जाए। यहाँ 'यथामार्गरसोपेतं' के स्थान पर 'यथामार्गकलोपेतम्' पाठ भी
मिलता है। इसका अर्थ है कि मार्ग अर्थात् चित्र आदि में जो दो, चार, आठ
मात्राओं की कलाएँ होती हैं उनसे उपेत अर्थात् युक्त होना चाहिए।
४-५. विकृष्ट, त्र्यस्र एवं चतुरस्र इन तीन स्थानों में त्र्यस्र में वैष्णव
स्थान जिसमें एक पक्ष या बाजू समान या बराबर और दूसरा समुन्नत रहता
है। प्रसन्न—अर्थात् अपने प्रवेश के समय ही सन्न अर्थात् अचल। स्वस्थ
मयूर सदृश सुन्दर सिर जिसमें हो उसी प्रकार ग्रीवा प्रदेश रखना चाहिए।
६-७. यहाँ 'नाभिसंस्थ' पद से चतुरस्र का संकेत है। अतः नाभिस्थित
दक्षिण खटकामुखहस्त और कटिस्थित वाम अर्धचन्द्र हस्त (का प्रयोग)
अभीष्ट है यह यहाँ दिखलाया गया है।
८-१०. गति के बाद क्रमप्राप्त एवं उचित होने से स्थान (स्थिति)
को दिखलाने हेतु 'पादयोरन्तरम्' इत्यादि से पूर्व अध्याय ११।५२ में दर्शित
स्थानक को प्रस्तुत करने के बाद गति का उपक्षेप किया गया है। इसे देश
तथा काल को दिखलाने वाले लक्षणों के (जिन्हें इसी अध्याय में कह रहे हैं)
अनुरूप किया जाए। ताल-फैलाई गई अंगुलि और अंगूठे के बीच की लम्बाई
या प्रदेश हो वह ताल कहलाता है, जिसे बालिश्त कहते हैं। (अर्थात् एक
ताल = एक बालिश्त)। यह ताल अभिनेता के अपने हाथ के प्रमाण से रख
लेना चाहिए। यह गति की स्थिति या डग रखने की पृथ्वी पर की दूरी
(देश) चार, दो तथा एक ताल की होती है। यहाँ उत्तमादि प्रकृति के
अभिनय की अपेक्षा से क्रमशः ऐसी संख्या को लिया गया है। यह
विनियोजना उत्तम प्रकृति के पात्रों की चार ताल, मध्य पात्रों की दो ताल
तथा अधम पात्रों की एक ताल के प्रमाण पर की जाती है। इसे शोभाधायक
या नाट्यधर्मी प्रकार से मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उत्तमादि
पात्रों में क्रमशः तालों का ह्रास स्वभावतः होता है।
११. देश के नियम के पश्चात् इसमें समय का मान भी नियत होता है।
इसमें पैर को उठा कर रखने के समय में भी इसी प्रकार उत्तमप्रकृति के लिये
चार कलाएँ तथा इनसे आधी-आधी मध्यम एवं अधमों के लिये नियत हैं। पाँच
निमेष की एक मात्रा होती है, इस सामान्य लक्षण से यही सूचित होता है कि
सर्वत्र ध्रुवक के प्रमाणानुसार पैर को रखने में चार कलाएँ आवश्यक हैं।
कोहलाचार्य ने इस प्रसंग में उत्तमादि पात्रों के लिये द्विपदी आदि का भी
विधान बतलाया है जिसे विस्तारभय से यहाँ नहीं दिया जा रहा है। यहाँ
मध्यमध्य में स्थान; फिर उनमें भिन्न-भिन्न क्रियाएँ या चेष्टाएँ तथा उनमें भी
विश्राम की कल्पना के लिये विराम-स्वरूप मात्रा की कल्पना की गयी है।
इसी मात्रा की कल्पना के आधार पर चतुष्कला आदि का विधान रहता है
तथा यही तथ्य मुनि ने उपर्युक्त विवरण से सूचित भी किया है।
१२. यह समय के लय विषयक (मान का) नियम दिखलाने के लिये
कहा गया है। स्थित = (अर्थात्) विलम्बित लय। इसे प्रकृति आदि के
विभाग के अनुसार ठीक से विचार कर प्रयुक्त करे। यहाँ आदि पद से देश,
काल, अवस्था तथा रस को ध्यान में रखना भी अपेक्षित है। जैसे-धीरता के
कारण विलम्बित लय तथा इसके अभाव में कभी मध्य तथा कभी द्रुत लय का
होना। क्योंकि यह भी देखा गया है कि उत्तम जाति होने पर भी उसका
भाव अन्यथा रहता है अत यह प्रकृतिविभाजन है जात्यादि कृत विभाजन नहीं।
१३. लयत्रय का यह प्रयोग सत्व के कारण होता है। सत्व से आशय है
चित्तवृत्ति। अतएव संग्राम आदि के अवसर पर उत्तमपात्र की भी द्रुतलय
में गति रखी जाती है तथा शोकादि के अवसर पर अधमपात्र की भी
विलम्बित लय में गति रहती है।
१४. देश, काल आदि के नियम के अनुसार पात्रों के गतिगत विशेषरूप
या विचित्रता को दिखला कर अब विशिष्ट विवरण देने के भाव से मुनि
उनको बतला रहे हैं जिन्हें पूर्व में सामान्यरूप से कहा था।
१५. यहाँ 'तु' शब्द विशेषता के द्योतक रूप में प्रयुक्त है। अतः मन्थर
गति में चार ताल, स्वभावगति में तीन तथा दीप्तगति में पाँच ताल भी रखे
जा सकते हैं—(यही इस "तु" के द्वारा सूचित किया गया है)।
१६-१७. पार्श्वक्रान्तैः इत्यादि से कुञ्चितपाद में पार्श्वक्रान्ताचारी के
स्वरूप को दिखलाया गया है। (द्र० ना० शा० ११।३२) रंगकोण
अर्थात् प्रेक्षागृह के (रंगस्थल के) उत्तर-पूर्व कोण में तथा द्वितीयकोण
अर्थात् उत्तर-पश्चिम कोण में। तत परं=अन्य (शेष) दो कोणों में।
१८-१९. 'वामवेध' का अर्थ है पार्ष्णि क्षेत्र में एडी पर सूचीपाद का
निपात या प्रक्षेप करना। पञ्चपदी गमन स्वाभाविक गति में होता है। गति
की सिद्धि होने पर रंगकोणों में जाने के समय ब्रह्म स्थान का उल्लंघन नहीं
किया जाए यह ध्यान देने की बात है। मूल में 'पादानामेक विंशतिम्'
अर्थात् इक्कीस डग की जो बात कही है वह प्रत्येक कोण में पञ्चपदी गमन
करने पर (४ × ५ = २०) बीस ही होते हैं इक्कीस नहीं। परन्तु इसे
आचार्य की आज्ञा मान कर यहाँ यथाशक्य निर्वाह होगा संगति न बैठने से।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२७
२०. यहाँ 'भरत' शब्द भरत से प्राप्त शास्त्र शिक्षा वाले एवं भरत की
सन्तति से सम्बद्ध नट की सूचना देता है । परिमित दिशा में पञ्चपदी का
नियम है अतः एक ही स्थान पर पादों के दो दो विक्षेप करना चाहिये ।
विकृष्ट में बार २ पञ्चपदी हो सकती है इस विषय में भिन्न प्रमाणों में दी
गई गति की रीति या विवरण ही प्रमाण है ।
२१. मिश्रगतियों के विषय में विशेष बात कहने की भावना से
'समगति' का उपसंहार किया गया है—'यः समै' इत्यादि से । तथैव-अर्थात्
समानता से ।
२२. मिश्रगति को बतलाते हैं—'अथ' इत्यादि से । परिवारितः = जो
( उत्तमरूप आदि से ) विवक्षित हों ऐसे पात्रों से युक्त । इस समय उत्तम
की चार कलाएँ, मध्यम की दो तथा अधम पात्र की एक कला प्रमाण का
पाद पात रहे ।
२३. यहाँ कला के चतुस्तालादि विभाग को निश्चय करने के लिये विशेष
कहा गया है—दैत्य दानव आदि ।
२४. सभी अर्थात् देवदूत आदि उत्तम पात्र । उद्धत देवपात्र जैसे
मातलि प्रभृति ।
२५-२६. राजा भी देवांश से उत्पन्न होने वाला व्यक्ति है क्योंकि शास्त्र में
इसे लोकपालों के अंशों से उद्भूत माना गया है । (द्रष्ट—'अष्टाभिर्लोकपालानां
मात्राभिर्निर्मितो नृपः') इत्यादि ( मनु० ) । इसी कारण इनका प्राधान्य
होता है । यही तथ्य गीता में भी—'राजविद्या राजगुह्यम्' इत्यादि से कहा
है । अयं = चतुष्कल इत्यादि । स्वच्छन्द गमन = स्वस्थ स्थिति में गति ।
संभ्रम = आवेग । उत्पात = उन्माद जैसी मानसी दशा । इन दशाओं में
निश्चयपूर्वक गति में कोई प्रमाण या मान नहीं होता है ।
३०-३३. विशेष स्थिति या अवस्थाओं के बल से नियम में ( भी )
परिवर्तन हो जाता है । तब उत्तम पात्र की दों कलाएँ, मध्यम की एक तथा
अधम की आधी कला गति का प्रमाण हो जाती है । यह श्वासादि की
विश्रान्ति के साथ होता है तथा चार प्रकार से होता है और यहीं द्रुत
उपयुक्त मानी जाती है ।
३४-३५. भय से युक्त होने पर 'ऊरुस्तम्भ' हो जाता है । इसी प्रकार
विस्मय और अवहित्था अर्थात् कृत्रिम धीरता के अवसर पर भी । ऐसे
समय गति स्थित या विलम्बित लय वाली की जाए । आदर से विशिष्ट,
औत्सुक्य से युक्त शृंगार के विप्रलम्भ नामक प्रकार में भी इसी प्रकार 'गति'
४२८ | नाट्यशास्त्र
रहती है। स्वच्छन्दगमन = बिना किसी लक्ष्य के या कार्य के क्रीडा करते हुए
चलना। पादपात भी जिस गति में जैसा कलान्तर का परिमाण बतलाया
हो वैसा ही रहना चाहिए। यह बात आगे इसी अध्याय में कही भी जा रही
है। अभिनय के दौरान स्त्री-पात्रों से छः या आठ कलाओं तक के पादपात
नहीं करवाये जाने चाहिये क्योंकि देर तक ऐसा करने पर उन्हें थकावट
(खेद) हो जाएगी। विषम संख्या के किसी विशेष परिमाण में पादों का
उत्क्षेप तथा निपात का योग नहीं बनता अतः साम्य या सम संख्या ही
आचार्यगण यहाँ उचित समझते हैं।
३६-३६. पूर्व में कलागत आधिक्य दिखलाया गया था। इसके विपरीत
कलागत न्यूनता भी होती है—यह तथ्य अगली-'अस्वस्थकामिते' इत्यादि
से कहा गया है। अस्वस्थ = प्रच्छन्न । कामित = कामुक । बान्धव आदि के
अनिष्टश्रवण के बाद उनके समीप शीघ्र जाना अभीष्ट होता है, इसी तरह
अद्भुत पदार्थ के दर्शन में भी (मन में) उतावलापन रहता है तब कलाओं में
न्यूनता रखा जाना उचित हो जाता है। आत्ययिक = अवश्यकर्तव्य कार्य।
शत्रु और अपराधी के ढूंढ़ने या पकड़ने में भी इसी प्रकार विकला (जिसमें
कला का चार से आधा परिणाम या कम हो) की योजना रखी जाती है।
'विकला' पाठ में अर्थ है अर्धकला रहित चतुर्थी कला। इसी कारण
'चतुरर्धकलं' कहा भी है (जो संभ्रम, उत्पात आदि के प्रसंग में कहा था।)
कलाओं के परिमाण का यह विधान या नियम उपयोगी (होता) है तथा
इसका उत्तम, मध्यम तथा अधम पात्रों में प्रयोग भी किया जाता है। अतः
नियम की व्यावहारिकता भी है तथा महत्त्व भी।
४०-४४. इस प्रकार प्रकृतिभेद से गति का विवरण देकर रस में गति
को दिखलाने की भावना से तथा पुरुषार्थ में उपयोगी रसों में शृंगाररस के
प्रमुख होने से उसी की गति बतलाई जा रही है—'गतिः शृङ्गारिणी'
इत्यादि से। स्वस्थकामित = प्रकट कामुक या प्रेमी। यहाँ 'सूचा' का पुनः
कथन आकर्षक पदार्थ के अतिशय चमत्कारी होने से पर्यालोचन के निरूपणार्थ
है अर्थात् शृङ्गार में 'सूचा' की योजना आवश्यक समझी जाए।
(सूचाभिनय का स्वरूप ना० शा० २४।४४ पर है। जिसे टिप्पणी०
पृ० १३६ पर दिया गया है।) उस सूचा से भी अन्तरङ्ग प्रकृत में गति
निरूपण है इसलिये इसे यहाँ दिखलाया गया। यहाँ पर सौष्ठव से अङ्ग की
चतुरस्रता तथा उससे युक्त लय, (विलम्बित आदि) ताल सभी सामान्यरूप
में होना चाहिए।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२९
४५-४८. प्रच्छन्नकामिता—छिप कर प्रिया से मिलने या सम्बन्ध रखने
वाला। जैसे रत्नावली नाटिका में वत्सराज उदयन। इसके विपरीत सर्वलोक
समक्ष कामिता जैसे पौलस्त्य की सीता में कामिता। इस समय किसी के
देख लेने की आशंका होने से दीपक को बुझा दिया जाता है। वेलासदृश
वस्त्र—समय के अनुरूप वस्त्र या वेषधारी। यहाँ वैसे ही आभूषण भी धारण
करना उपलक्षण है। शब्दशङ्की पद से खण्डित कला की मिश्रित गति
रखने की बात भी बतलाई गयी है तथा वेपमान-शरीर से कला के चौथाई
भाग का काल भी संकेतित किया गया है !
४८-५४. विप्रलम्भशृङ्गार में संभोग शृङ्गार की तरह गति बतलाकर अब
रसत्वेन समानरूप वाले रौद्ररस की गति बतलाते हैं—‘रसे रौद्रे’ इत्यादि से।
दैत्य, दानव आदि में प्रयुक्त कहने का आशय यही है कि उनमें क्रोध के बिना
भी रौद्रता रहती है। यह बात रसाध्याय में पूर्व में कही जा चुकी है क्योंकि
इनमें एक ही रस (रौद्र) होता है। यहाँ ताल शब्द काल का प्रमाणवाची
समझा जाए। ‘तालान्तरपातित्व’ से जितने समय उत्क्षेप हो उससे न्यून
काल में पातन रहने का भी संकेत है। ‘तद्विधा’ से भीमसेन सदृश व्यक्ति
का ग्रहण है तथा युद्धवीर में भी ऐसे व्यक्ति की ऐसी ही गति रखने की बात
की सूचना भी !
५५-५७. रौद्ररस की प्राणभूता ‘उग्रता’ को बतलाने के अवसर के बीच
ही पुरुषार्थ के अनुसार प्राप्त बीभत्सगति का क्रम आगया था। जिसे—
‘अहृद्या’ इत्यादि से बतलाते हैं। अहृद्या मही = स्मशान की भूमि या जहाँ
युद्ध होने से कट-कट गिरने वाले नरदेह (कबन्ध आदि) के कारण भूमि
स्मशान बन गयी हो।
५७-५६. वीररस की गति—‘अथ वीरे च’ इत्यादि से बतलाते हैं।
‘पादविक्षेप’ का अर्थ है विस्तार से क्षेप या पाद का स्थापन करना। इससे
‘स्पन्दिता’ तथा ‘अपस्यन्दिता’ चारी का ग्रहण सूचित होता है तथा इसमें
गन्तव्य प्रदेश में शीघ्रता से आगे बढ़ कर स्थान प्राप्ति करना अभीष्ट होता
है। वीर तथा रौद्र रस में आवेग नामक भाव का स्पर्श रहने से यहाँ कभी
धीरे तथा कभी द्रुत प्रचार भी विहित माना गया है। आवेग की दशा में—
कला गत प्रमाण वाले काल के अनुगत गतिशील पैरों के द्वारा तीन पादपात
किये जाए। एक लघुपात एक दूसरे की ओर दो द्रुतपात तथा फिर एक कला
का विश्राम। यह वीर तथा रौद्र दोनों रसों में ‘गतिपरिक्रम’ होता है।
४३० | नाट्यशास्त्र
मध्यमपात्रों की इसी क्रम में रहनेवाली गति में भी अनुकूल संचारी (आवेग
आदि में) भाव में यही गति होती है। इसमें इधर उधर चलने में व्याकुल
एवं द्रुत बहुल पादविक्षेप होते हैं। अद्भुतरसत्व को प्राप्त होनेवाले विस्मय
स्थायी में उत्तमपात्र की स्वच्छन्द गति बतलाई जा चुकी है, परन्तु यहाँ वदन
में राग लालिमा उत्पन्न हो जाना विशेष रूप में होता है। (तथा इस
विस्मय में आवेग सदृश ही पाद विक्षेप द्वारा गति भी रखी जाती है)
६०-६१. स्मित से अतिहसित तक उत्तम हास्य है। इसमें उत्तम पात्र की
गति स्वस्थ होती है किन्तु यहीं अपहसित एवं अतिहसित वाले मध्यम पात्र
की गति विक्षिप्त रखी जाती है। 'अन्यच्च' पद से विदूषक की गति के
विषय में आगे बतलाये जाने वाले विवरण का संकेत दिया गया है। यहाँ
केवल प्रसङ्गवश हास्यगति द्रुत बतलायी गयी है।
६१-६४. अब करुणरस की गति—'पुनश्च करुणे' इत्यादि से बतलाते हैं।
यद्यपि 'ज्वरातें' (ना० शा० १३।३५) इत्यादि से करुण में स्तोकगति को
(इसी अध्याय में) बतलाया जा चुका है परन्तु कुछ अन्य बातें भी और है
यह 'पुनः' शब्द से दिखलाया गया है जिन्हें आगे कहेंगे।
६५-६७. प्रहार लगने पर करुणरस में होनेवाली गति में 'चूर्णपद'
का विधान है अर्थात् पैरों को ऊपर थोड़ा उठाये तथा बड़े जोर से नीचे
पटके। इस क्रिया में 'अध्यर्धिका' से चूर्णपद में स्वतः अन्तर हो जाता है।
६७-७०. शीत या वर्षा से अभिभव होने पर अब गति को बतलाते हैं—
'शीतेन' इत्यादि से। मध्यम तथा उत्तम पात्रों की शीतादि में होनेवाली गति
अनुभावों से शून्य भावों के द्वारा सूचित की जाती है। 'च' पद से शरीर के
अवयवों का कम्पन के अतिरिक्त संकोचन कार्य भी लिया जाए। 'एव' शब्द से
यहाँ 'सौष्ठव तथा चतुरस्र' की योजना का निषेध किया गया है। 'करौ' से वे
हाथ यहाँ अपेक्षित हैं जो कटि के ऊपर पटके जाएँ। इस स्थिति में शरीर
को सिकोड़ कर और हाथों को छाती पर रख कर लोक प्रसिद्ध या प्रचलित
गति का ही अभिनय किया जाए जिसमें ओठ, दांत और चिबुक का कम्पन
एवं शरीर का कुञ्चन का भाव भी लोक प्रचलित रूप में ही प्रस्तुत
होता हो।
७१-७६. शृङ्गार तथा करुणरस की गति के प्रसंग से शीत एवं वर्षा में
होने वाली गति का भी निरूपण करके बाद में 'भयानक रस' में गति को
बतलाते हैं—'तथा भयानके' इत्यादि से। सत्ववर्जिता = जिनको अपने
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३१
कुछ शील आदि के कारण उत्तम (स)त्व के औचित्य प्राप्त होने पर भी जो
सत्वहीन अर्थात् प्राणरहित हैं—जैसे विराट् का पुत्र उत्तर । 'द्रुतैः' इत्यादि
से कोहल के द्वारा दिखलाई गई धारा-लयादि का संकेत है । अनुसरण = शत्रु
का पीछे से आ जाना । जिनमें धैर्य या पराक्रम पुनः लाया जाए ऐसी गति ।
इसका फल यह है कि इसमें बीच में हल्के और भारी पादपात भी होते हैं
जिन्हें 'आसन्नपतितैः' इत्यादि से यहाँ कहा भी गया है ।
७५-७६. धीरप्रशान्त प्रकृति के 'वणिक्' तथा 'सचिव' जैसे पात्र की गति
को बतलाने के प्रसंग को उठा कर शान्त रस में होने वाली गति को भी बतलाते
हैं—'वणिजां' इत्यादि से । 'धीरप्रशान्ताः वणिजः' इस वचन के अनुसार
वणिक् जैसे पात्र के अन्तःकरण में संस्कार रूप में शान्तत्व स्थित है । इसी
प्रकार शान्तरस प्रधान यति आदि के नाटक आदि में प्रसङ्ग आते हैं वहाँ
भी उनकी गति को बतलाना अभीष्ट होता है जिसे इसी प्रकरण में दिखलाया
गया है । वणिक्, सचिव आदि का हृदय शान्त होने से नियमन के योग्य
होता है । स्वभावजा गति से गति के अनाविष्ट रूप को बतलाया गया है
अर्थात् जिसकी गति आवेश रहित रखी जाए वही स्वाभाविक है ।
७६-८६. नैष्ठिक यति आदि पात्रों की गति—'यतीनाम्' इत्यादि से
बतलाते हैं । नैष्ठिकों की गति ब्रह्मचर्य से प्रवृत्त होती है । उपस्थितस्मृति =
संस्कार के सर्वदा उद्बुद्ध रहने से जिसे सर्वदा स्मरण बना रहता हो वह ।
व्रतानुगा पद से व्रतों की अनुकूलगामिता स्पष्ट की गई हैं । उन्मत्तादि के
आगमादि में जो व्रत दिखलाये हैं तदनुसार योग्य पादों से इसी प्रकार गति
होती है । पाशुपत तथा नकुलीशपाशुपत—जो परमेश्वरव्रत को धारण
करते हैं—उनका उन्मत्तव्रत होता है तथा इसी व्रत के कारण इनकी
गति में भी उद्धतत्व रहता है । इसी प्रकार रसान्तरों की भी संगति कही
गयी है ।
८७. रसों के अनुसार गति को बतला कर अब देशों के अनुसार भी गति
को बतलाते हैं—'अन्धकारे' इत्यादि से । अन्धकार में या अन्धा बन कर
चलने में या अन्धे की तरह चलने में भूमि पर पैरों को घिसाते हुए चल
कर मार्ग के अन्वेषण में तत्परता को दिखलाया जाए ।
८८-९०. समपाद नामक स्थानक द्वारा रथ से जहाँ जाया जाता हो उसे
प्रदर्शित किया जाता है या रथविशिष्ट की गति सामान्यतः यहाँ दिखलाई
गयी है या फिर प्रकृति के विभागगत औचित्य से विचित्रता लिये हुए अश्व,
४३२ नाट्यशास्त्र :
वृषभ, खर तथा उँट के चित्रपट भी इस कार्य में लिये जाएँ यह भी या फिर
नट के पदों में ही ऐसा अनुकूलगमन रखा जाए जिससे यह मालूम होने लगे
कि जैसे कोई रथ चल रहा है।
६१-६२. यही बात विमान में बैठे हुए पात्र की गति में भी समझना
चाहिए। रथ में चढ़ने की दशा में गात्र को ऊपर ले जाये और इसके
विपरीत उतरने की दशा में उसे नीचे ले जाकर अवरोहण करे।
६२-६५. अब विमान के प्रसंगवश आकाशगति को भी बतलाते हैं—
'अधोऽलोकनेन' इत्यादि से। यहाँ चक्करदार घुमाव में गति को रखे परन्तु
यहाँ आकाशीकीचारी तथा मण्डलों की बार-बार आवृत्ति भी रखी जाती है।
ऋजु = सरल एवं ललित जंघाओं के द्वारा और आयत अर्थात् चरणों को ऊपर
ले जाकर गिराते हुए तथा कुटिल गति से घुमा कर। इसमें उत्क्षेपण के
समय उन्नत और पात के समय नत रखा जाए। भ्रश्यतः—गिरने वाले
की, जो कि अनजाने में नीचे आ रहा हो। अपविद्धभुज-जिसमें दोला के
आकार में भुजा जल्दी २ गिरती हो।
६६-६८. अर्थवश = प्रयोजन के अनुकूल मान कर अवतरण किया जाए।
इसमें नदी या जल में अवतरण (में उतर रहे हों) जैसा वर्णित क्रियाओं में
अभिनय कर शरीर को ललित अंगक्रिया द्वारा उतारे।
१०१-१०३. तैरने की प्रक्रिया जल के प्रमाण की अपेक्षा से की जाए
अर्थात् जब पानी थोड़ा हो तो वस्त्रों को ऊपर लेकर तथा अधिक
जल में पाणि के द्वारा विचित्र रूप में जल को हटाते हुए गति रखे। इसमें
पताक तथा सर्पशीर्ष हस्त से उपलक्षित गति रखी जाती है।
१०३-१०४. वैसे अपनी जानकारी या इच्छा में तैर कर मनुष्य चलते
हैं किन्तु कभी कभी-कभी तेज प्रवाह में बिना इच्छा के भी जल में बहते हुए
चला जाता है या जल बहा कर ले जाए तो ऐसी स्थिति में गति दिखलाते
हैं—'प्रसार्य' इत्यादि से। एकैकं—अर्थात् क्रमशः। ऐसी गति में सभी अंगों
में आकुलता तथा मुख को तिरछा घुमा कर (आधूत) रखा जाता है।
अन्य आचार्य पारी पारी से पार्श्व परिवर्तन के द्वारा भी इसे दिखलाने की
बात कहते हैं परन्तु इसमें पार्श्वपरिवर्तन नहीं होता वह तो स्वेच्छा से जल
में तैरने के समय ही सम्भव रहता है।
१०५-१०७. जल के प्रसंग में नौका की एवं नौका में बैठे हुए पात्र की
गति भी—'नौस्थस्यापि' के द्वारा बतलाते हैं।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३३
१०८-१०६. इस प्रकार देश की अपेक्षा से गति बतलाई गयी तथा
नागादि के प्रसंग से सर्प-गति भी बतलाई ।
११०-१११. अवस्थाभेद से गति निरूपण के प्रसंग में विट की गति
बतलाते हैं—'विटस्यापि' इत्यादि से । सौष्ठव जो अपनी प्रकृति के
उपयुक्त हो ।
११२-११३. कञ्चुक के योग्य वृत्ति को जो अपने लिये चाह कर
लेता है इस विग्रह से कञ्चुक पद से क्यच् तथा 'क्वचि + च' से ककार
को ईकार युक्त कर कञ्चुकी शब्द निष्पन्न होता है । वय एवं अवस्था के
विभाग को विचार कर यह विवरण दिया गया है जिसका अभिनय में प्रयोग
किया जाता है ।
११४-११७. विष्कम्भनकृतप्राण-विष्कम्भ अर्थात् स्थैर्य, वह जिसे हो
या ऐसी दशा में यष्टि आदि से प्राण बल को जिसने समन्वित किया हो—
ऐसी गति ।
११८. विकूणन, सङ्कोचन, विमर्दन इत्यादि मिश्रित क्रियाओं को लिया
जाए पथिक की गति में ।
११९-१२०. स्थूल अर्थात् महाकाय या मोटे आकार का व्यक्ति जिसे
थोड़े से श्रम से थकावट आ जाए तथा पसीना आने लगे ।
१२१-१३०. पैरों की विपर्यय गति के साथ चेष्टा के साथ तदनुकूल
हाथों की गति, स्थिति भी रखी जाती है ।
१३१-१३४. 'कुहक' शब्द का कुछ आचार्य अधम-लिङ्गी (नीच साधु)
अर्थ करते हैं । 'कुहना' पाठ के अनुसार अर्थ होगा जो दम्भी या ईर्ष्यालु
है । (मेदिनी कोष भी इसका—'कुहना दम्भचर्यायामर्ष्यालौ कुहनस्त्रिषु'
के द्वारा समर्थन करता है) । पैर में कांटा या क्षत हो जाए तो ऐसे
(लंगड़े) पात्र की गति या पंगु की गति का 'अग्रतलसंचरपाद' से अभिनय
दिखलावे । अन्य आचार्यों ने यहाँ नर्कुट की योजना भी दिखलाई है ।
१३७-१४२. विदूषक की गति बतलाते हैं—'विदूषकस्यापि' इत्यादि
से । असम्बद्ध प्रभाषण अर्थात् निरर्थक या अनुचित भाषण । जब ऐसा
पात्र रंगमञ्च पर आता है तो अङ्गहास्य होता है। यहाँ प्रवेश पद से
नाट्य में ही रस है, लोक में नहीं; यही दिखलाया गया है । इस प्रकार
तीन हास्यों में में से कहीं पर एक प्रकार का, कहीं दो तथा कहीं तीनों
प्रकारों का आश्रय लिया जाता है । इस क्रम में विदूषक को अपने
स्वामी राजा, अमात्य या श्रेष्ठो की प्रकृति को समझते हुए विभागशः इसे
२८ ना० शा० द्वि०