नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०७
फैला देने पर 'ऊर्ध्वमण्डल' हस्त हो जाते हैं। ललाट प्रदेश तक ऊपर ले जाना
ही इसका मुख्यतः 'लक्षण' है।
पार्श्वमण्डल-हस्त :- ऊर्ध्वमण्डल हस्त ही जब पताका के आकार में
(गोल घूमते हुए) परस्पर सम्मुख एक पार्श्वगत हो जाते हैं तो 'पार्श्वमण्डल'
कहलाते हैं। अन्य आचार्यों का कहना है कि वक्षःस्थल के बराबर अपने ही
बाजू या पक्ष में परस्पर आहत भुजों का ताल देकर घुमाते हुए वर्तना क्रम
से प्रचार करना ही इस हस्त का स्वरूप है।
१६६. उरोमण्डलीहस्त :- इसमें उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित हस्तों का
एक साथ योग रखा जाता है तथा ये वक्षःस्थल के समीप या सामने से
रहनेवाले होते हैं। इसमें हस्तक्रम ऐसा रखा जाता है कि एक के आगमन
से दूसरे का गमन या गोल घुमाना बना रहे (ऐसी वर्तना रहती है)
उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित क्रिया 'पताक' हस्तों की होती है। अन्य आचार्यों
के मत में यह 'हंसपक्ष' हस्त में रखे जाने की बात कहीं गयी है।
१६७. उरःपार्श्वार्धमण्डलहस्त :- इसमें वक्षःप्रदेश में उत्तान हस्त को
ठहरा कर फिर अलपल्लव हस्त को व्यावर्तित करण से निकाले तथा बाजू
में भुजा को फैला दे। यह एक हस्त की प्रक्रिया हुई। तब दूसरे हाथ की
अंगुलियों को अराल हस्त में उद्वेष्टित कर लावे। इसके नाम का भी यहाँ यही
कारण है कि इसमें एक हाथ से वक्षःस्थल के आधे भाग को और दूसरा हाथ
पार्श्व (बाजू) में मण्डल की तरह क्रमशः गतागत करते हैं।
१६८. मुष्टिकस्वस्तिकहस्त :- इसमें कलाई के समीप में दोनों हाथों में
से एक हस्त को अराल वर्तना से कुञ्चित रूप से तथा दूसरे हस्त को अलपल्लव
वर्तना से अञ्चित रूप से बार बार आवागमन करवाने के पश्चात् खटकामुख
हस्तों से स्वस्तिक करते हैं। इस प्रकार खटकामुखों की मुष्टि (हस्त) से
उत्पत्ति होने के कारण इसका 'मुष्टिकस्वस्तिक' नामकरण सार्थक है।
१६६. नलिनीपद्मकोशहस्त :- इस हस्त का विभिन्न आचार्यों ने
पृथक् २ वर्णन तथा स्वरूप बतलाया है। इसमें मुष्टिक युक्त स्वस्तिक के क्षेत्र
में जब दोनों कलाइयों को व्यावर्तित करण से कनिष्ठिका अंगुली एवं अंगूठों
का परितंन कर देते हैं तब दोनों कलाइयाँ परस्पर पराङ्मुख हो जाती हैं
जिससे दो पद्मकोश बन जाते हैं। इस प्रकार इसके नाम के अनुरूप ही
एक कमलिनी में अनेक कमलों की उत्पत्ति हो जाने से इसका 'नलिनीपद्म-
कोश' नाम हो जाता है।
४०८ नाट्यशास्त्र
२००. अलपल्लव या अलपद्महस्त :- जब अलपल्लव हस्तों को वक्षः
प्रदेश से उद्वेष्टित क्रिया में रख कर कन्धे के पास तक ऊपर ले जाकर फैला
दिया जाए तो 'अलपल्लव' हस्त होता है । इसका अन्य नाम है 'अलपद्म' ।
उल्बणहस्त :- इसमें दो अलपल्लव हस्तों को वक्षः क्षेत्र से उद्वेष्टित
कर स्कन्ध के पास ऊपर फैलाए हुए एक हस्त से आबिद्ध तथा दूसरे से
पल्लव रूप को प्रदर्शित करे तो 'उल्बण' हस्त होता है । इसकी हर्षभरित
मनोवस्था में योजना रखी जाती है ।
२०१. ललितहस्त :- इसमें दो अलपल्लवहस्तों को मस्तक पर ले जाते
हैं । इसमें चतुरस्र से अङ्गों का लालित्य दिखलाया जाता है । अतः इसका
नाम भी 'ललित' है ।
वलितहस्त :- इसमें कलाई प्रदेश पर लताहस्त स्वस्तिकाकार में
वलित या घुमाव लेते हैं । इसमें बाहुओं का वलन होता है अतः इसका नाम
'वलित' है जो भिन्न-भिन्न वर्तनाओं का संकेत देता है । अन्य आचार्य मुष्टिक
स्वस्तिकहस्त को मस्तक पर फैलाने को ( घुमाने को ) 'वलित' मानते हैं
तथा कुछ अन्य दो कटकमुख हस्तों को एक दूसरे के साथ अग्र भाग लगाते
हुए मिला कर ऊपर उठाते हैं जब तक कि वे पृष्ठ तक पहुँच कर कलाई पर
झुकाये न जाएँ तो 'वलित' होता है ।
नृत्तहस्तों की संख्या भरतमुनि ने तीस बतलाई है जो केवल उपलक्षण-
मात्र हैं । इन नृत्तहस्तों के अतिरिक्त कुछ अन्य नृत्तहस्त भी प्राप्त हैं जिनके
नाम इस प्रकार हैं—१. निकुञ्चकहस्त, २. द्विशिखरहस्त, ३. वरदाभयहस्त,
४. सूचीविद्धहस्त, ५. ज्ञानहस्त, ६. मुद्रहस्त तथा ७. प्रकीर्णहस्त । इनके
लक्षण तथा योजना नाट्यशास्त्रसंग्रह में कारिका संख्या २८६ से २६५ तक
देखना चाहिए । विस्तारभय से यहाँ नृत्तहस्तों के शेष विवरण भी नहीं दिये
जा रहे हैं ।
२०२-२०३. पताकहस्त सब हस्तों की प्रकृति या कारण माना जाता है
अतः सभी वर्तनाओं में कार्य करने से 'पताक' सर्वसाधारण होता है तथा
शब्द से भी रखता है । यहाँ नाट्यशब्द से अभिनयोपयोगी हस्त और नृत्त
प्रमुखता नृत्त के उपयोगी हस्तों की सूचना दी गयी है ।
२०४-२०६. जिस अंगुलितुलन रूप क्रिया से अभिनय विशेष का
सम्पादन किया जाये उसे 'करण' कहते हैं । किन्तु जहाँ अभिनय की समाप्ति
नहीं होती हो वहाँ 'वर्तना' की आंकाक्षा रहती है जिसका 'अंगत्रोटन' के
नाम से बुधजन व्यवहार करते हैं ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०९
२०७-२१०. अभ्यन्तरेण इत्यादि । अभ्यन्तर अर्थात् हथेली के सम्मुख
बाह्यप्रदेश से लेकर वक्षःस्थल के क्षेत्र तक पहुँचना । इसकी अपेक्षा विपरीत
वक्षःस्थल के क्षेत्र विरुद्ध दिशा में कनिष्ठादि का आवर्तन या घुमाव ।
बहिर्मुखत्व पद से वक्षःक्षेत्र से बहिर्गमन तथा अभ्यन्तरत्व से तलसम्मुखत्व
समझना चाहिए । अभ्यन्तरत्व के विपर्यास से बाह्यता यहाँ समझना चाहिए ।
२११. नृत्त तथा अभिनय में करणों का प्रयोग अधिक मात्रा में किया
जाना इष्ट है जो हाथों से होता है । क्योंकि उनसे ही वर्तना उत्पन्न की जाती
है । नृत्त तथा नाट्य में उपयोगी हस्त-पाणि हैं । इन्हें मुख, नेत्र, भ्रुकुटि से युक्त
या अनुगत ही रखा जाये इसका आशय यही कि जिधर वर्तना चले उधर ही
मुखादि रहें । प्रश्न—जब नेत्र, मुखादि का राग वर्तना से व्यक्त होता हो
तो उन्हें मुख, भ्रूनेत्र से युक्त कैसे रखें । उत्तर—अभिनय की पूर्ति के लिये
यह वर्तना में रहने वाली प्रक्रिया है अतः इसमें पुनरुक्ति नहीं आती ।
२१२-२१४. क्योंकि अंगुलियाँ बाहु से संलग्न हैं अतः उनकी क्रियाएँ
भी बाहु से संलग्न होगी ही जिनके प्रभेद का ज्ञान अपेक्षित होने से उन्हें
बतलाते हैं । ये दस प्रभेद हैं । तिर्यक् का आशय है कि उसकी गति पार्श्व
में रहती है । ऊर्ध्व = मस्तक के ऊपर जाता है । अधोमुख = पृथ्वी को छूने
वाला । अञ्चित = वक्षःस्थल से निकल कर ऊपर शिरःप्रदेश से लौटना ।
अपविद्ध = चक्राकार गति में चारों ओर घूमना । पृष्ठानुसारी = शरीर के
पृष्ठभाग का अनुगमन करने वाला । उद्वेष्टित = जो मणिबन्ध ( कलाई )
से सम्बद्ध वर्तना से निष्क्रामण करे । प्रसारित = जो कलाई के अग्रदेश का
अनुधावन करे । इस प्रकार के करणों में द्रुत, मध्य तथा विलम्बित के
वैचित्र्य से तथा बाहुओं के पर्याय से उक्त करणों की जब योजना हो तो उसमें
अनेक वर्तनाएँ अन्तर्निहित होती हैं । अतः करणों में होने वाली विशेषताओं
को अवश्य जान लेना चाहिए । नित्य कहने से यही बात यहाँ संकेतित की
गयी हैं क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य कोई इसका प्रयोजन यहाँ नहीं है ।
दशम अध्याय
( शारीराभिनय )
१. शारीराभिनय के क्रम में उरःकर्म बतलाये हैं जो पाँच हैं ।
२-३. आभुग्नउर :— इसमें वक्षः उन्नत या तान कर निष्क्रान्त, शुद्ध या
भुग्न अंस जिसमें रहें ऐसा रखा जाता है ।
४-५. इस वक्षःस्थल की योजना अतिशय हर्ष में भावण करने में भी
होती है [ द्र० ना० शा० संग्रह-४५६ ]
६-७. हिक्का = हिचकी लेना ।
११-१५. पार्श्व ( बाजू ) के पाँच कर्म तथा उनकी योजना दी गई है ।
१८. उदर के चौथे प्रभेद का प्रक्षिप्त पाठ के अनुसार ‘सम’ नाम है
तथा अन्य मत के अनुसार ‘रिक्त-पूर्ण’ भी एक प्रभेद है जिसकी योजना श्वास-
योग में की जाती है ।
२१-२६. कटि-कर्म के पाँचप्रभेद स्वरूप तथा उनकी योजना को मुनि
ने दिखलाया है जिसका है सभी पश्चाद् भावी नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के द्वारा
अनुसरण किया गया ।
२७-३२. कटिकर्म के निरूपण के पश्चात् मुनि ने ऊरु की पांच स्थितियाँ
वर्णित की तथा उनकी योजना भी ।
३३-३६. जंघा के विवरण के बाद मुनि ने जंघा के पाँच कर्म, स्वरूप
तथा उनकी योजना को बतलाया ।
४०-५४. पादकर्म का विवरण देते हुए मुनि ने इसके पांच प्रभेद
बतलाकर उनका स्वरूप तथा योजना भी दिखलाई तथा अन्त में ‘सूचीपाद’
का स्वरूप बतला कर उसकी योजना का निरूपण किया ।
५५-५७. नाभि, जंघा, उरु के करण रूप में दिखलाये गये कर्मों से
भिन्न पादकर्म होते हैं । कटि आदि की गतियाँ मण्डल भेद से निष्पन्न होती
है, अतः कटि आदि से पाद पर्यन्त कर्म को ही मिलाकर ‘चारी’ कही
जाएगी क्योंकि वह समान करण से निष्पन्न होती है । इस प्रकार अङ्ग के
विभिन्न प्रदेशों का विवरण इस अध्याय में देकर अभिनय के तत्त्वों को प्रस्तुत
कर अगले अध्याय में चारी रूप व्यायाम को देने के सूत्रपात के द्वारा अध्याय
समाप्ति को भी दिखलाया गया है ।
एकादश अध्याय
( चारीविधान )
१-२. दशम अध्याय की समाप्ति पर 'चारी व्यायाम लक्षण' पद कहा
गया था। यहाँ 'चारी' शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार कर इस शब्द की
व्याख्या उचित होगी। चर् धातु से औणादिक इन प्रत्यय से भिन्न 'इ' को
ङीप् कर चारी शब्द निष्पन्न होता है। चारी द्वारा आकाश तथा पृथ्वी पर
चलने का अभिनय किया जाता है अतः आकाश एवं भूमि की चारियाँ होती
हैं। 'व्यायाम' शब्द का अर्थ है 'व्यायच्छते' इति अर्थात् अनुगत होना।
इसमें परस्पर एक दूसरे से मिलती हैं। विधान शब्द का अर्थ है योजना।
अतः परस्पर योजना से होने वाली चारियाँ व्यायाम शब्द का अर्थ होने
से चारी ही व्यायाम है। ये चारियाँ किस से मिलती हैं? इस प्रश्न के
उत्तर में यही व्यवस्था है कि पूर्व चारी पर में मिलती है किन्तु पर-चारी
पूर्व में नहीं मिलती यह नियम हैं। यहाँ नियत स्थिति अर्थात् विधान या
प्रक्रिया के कारण हस्त या पाद में से कोई अङ्ग प्रधान तथा अन्य अप्रधान
हो जाता है अतः यहाँ प्रधानभूत अङ्ग के अनुरोध से अन्य अङ्ग प्रवर्तित
होते हैं। जैसे जब किसी अभिनय में हस्त प्रधान हो या किन्हीं गतियों के
अभिनय में पाद प्रधान हों तो उनके उपयोग में आनेवाली चारी प्रधानता
को प्राप्त करती है। ऐसी स्थिति में प्रधान चारी के सम्पन्न होने पर
पूर्वाचारी का आश्रयण परा चारी से किया जाता है। इस प्रकार परस्पर
नियत रहनेवाली चारियाँ व्यायाम हो जाती हैं। यह व्यायाम संक्षिप्त,
मध्यम तथा विस्तीर्ण भेद से तीन प्रकार का माना जाता है।
३. एक का अर्थ है एकाकी जिससे श्रोणीप्रदेश (कटि के पीछे का भाग)
के प्रचार का भी संकेत समझना चाहिये तथा आदि शब्द से कटि को लिया
जाता है। तब श्रोणी का स्पन्दन तथा जंघा का चलन प्रदर्शित किया जाता
है। द्विपाद शब्द में पाद शब्द से उसका प्रचार या गति समझना चाहिए।
यह करण दो पैरों के प्रचार से होता है तथा संक्षिप्त व्यायाम भी कहलाता
है जिसका अभिनयों में प्रयोग किया जाता है।
४. कारिका के 'करणानां' इस बहुवचन पद से तीन करण ग्राह्य समझन
चाहिए् क्योंकि तीन में बहुत्व अपेक्षित है। यदि यहाँ चार या पांच कारण
४१२ नाट्यशास्त्र
का सहयोग रखें तो फिर नियमन नहीं हो पाएगा तथा खण्डों से मण्डलों
का प्रविभाग भी नहीं बन पाएगा । आशय यही है कि चारी में एक पाद का,
करण में दो पादों का, खण्ड में छः पादों का इस प्रकार पादवृत्तियों से एक
के बाद बढ़नेवाले अभिनय बनते हैं, जिन्हें मध्यम व्यायाम समझना चाहिए ।
तीन या चार खण्डों से 'मण्डल' का आशय है कि केवल तीन या चार
खण्डों से ही मण्डल बनता हो ऐसा नहीं समझना चाहिए; क्योंकि पाँच, 'छः
या सात खण्डों से भी मण्डल बनाता है जिन्हें आगे कहा भी गया है ।
५. चारी से अनेक कार्य साधे जाते हैं। यथा—शस्त्र का फेंकना,
सुदर्शनादि चक्र का प्रक्षेप, कुन्त (भाले) का फेंकना, युद्ध में हनन तथा
प्रतिहनन के अभिनय आदि जिनमें चारी का ही उपयोग होता है ।
६. यहाँ 'यत्' शब्द से चारियों का परामर्श किया गया है जो नाट्य-
प्रदेश की विस्तीर्णता का संकेत करता है। जो अभिनय मस्तक तथा हस्त
जैसे अंगों द्वारा स्वतन्त्ररूप में प्रस्तुत किया जाता है पर इन सभी अङ्गों का
पूर्वापरभाव के साथ चारी के साथ भी प्रयोग किया जाता है तथा चारी
का भी इसी कारण पूर्वापरभाव से उपयुक्तता में ध्यान में रख कर (इनके
साथ) प्रयोग रखा जाता है ।
७. इस कारिका में चारी की योजना के प्रदेश दिखलाये गये हैं ।
इनमें नृत्त में करण तथा अङ्गहारों के अभिनयप्रदर्शन आदि में इनका योग
रहता है । जिसे कहा जा चुका है तथा आगे भी विषयानुसार बतलाया
जाएगा । युद्ध के विषय में इनकी योजना को न्याय के प्रसंग में आगे कहा
जाएगा तथा गति के विषय में इनके प्रयोगादि का विवरण गतिप्रचार
नामक १३ वे अध्याय में आगे दिया जाएगा । इस प्रकार तीन अध्यायों में
प्रतिपाद्य अर्थ को यहाँ तीन शब्दों (नृत्ते, युद्धे, गतौ) के द्वारा सूचित किया
गया है ।
८-१३. भूमि में या उस पर सम्पन्न होने से इन्हें 'भौमीचारी' कहते हैं ।
इसी प्रकार ऊपर या आकाश में चलने वालों की आकाशिकी चारी होगी ।
प्रभेद चारियाँ सोलह हैं । इसी प्रकार आकाशिकी चारी के भी सोलह
भौमी होते हैं । (क्रमशः विवरण आगे से आरम्भ होता है ।)
१४. समपादाचारी :—क्योंकि पादादि के समानकरण होने पर चलना
तो होगा ही, जो आगे या पीछे ऊपर या नीचे रहेगा तो ऐसी स्थिति में चारी
भी और समपादा भी समता के कारण कैसे होगी ? इसके उत्तर में यही
कहा जा सकता हैं कि जब अभिनेता किसी स्थान विशेष में पैरों को समान
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१३
रूप में रख कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जावे तो चलने से चारी होगी
और पादों की समानरूपता से यह 'समपादा' भी कहलाएगी । यहाँ योग्यता
अर्थात् स्थान के संश्रय के कारण ऐसा व्यवहार एवं नामकरण हुआ है ऐसा
समझना चाहिए ।
१५. स्थितावर्ता-चारी :—पैर के अगले भाग से संचार करने में भूमि
पर पैर को घिसट या घिस कर रखते हुए चलना होता है ऐसी चलने की
स्थिति अग्रतल संचर पाद की रखकर अभ्यन्तर मंडल बनावे अर्थात् द्वितीय
बाजू की जानु को स्वस्तिक आकार में रखे तथा जब स्वस्तिक रूप में जानु
संश्लिष्ट हो जाए तब दूसरी का उत्सारण किया जाए । एक के स्थान को
ऊपर खींच कर ले जाये या ऊपर अपनी ओर खींचें । यही उत्सारण है ।
१६. शकटास्या-चारी :—निषण्णाङ्ग अर्थात् शरीर के पूर्वीयाभाग को
प्रयत्न से धारण किये हुए । जिस प्रकार शकट असनीय अर्थात् क्षेप्य हो उसी
रूप में शरीर को लाना शकटास्या है ।
१७. अध्यर्धिकाचारी :—दाहिने पैर को एडी की ओर पीछे रखा
जाए तब उस दाहिने पैर की स्थिति उपसर्पण के समय आधी तिरछी
होती है जो आधे ताल से अधिक अन्तर पर रखी जाती है । यह करणों
की प्रधानता के कारण है तथा इस प्रक्रिया में वामचरण की स्थिति भी पृष्ठ
या पीछे लगी हुई रहती है ।
१८. चाषगति-चारी :—वैसे प्रायः सभी चारियों में दाहिने पैर का
अपसर्पण होता है । यहाँ एक ताल के परिमाण से दाहिने पैर को आगे
फैला कर उसी को दो ताल मात्रा में पीछे रखा जाता है । यहाँ बायें पैर
का दाहिने के साथ अपसर्पण होता है । थोड़ा उछालने पर दाहिना पैर बायें
से दूर हट कर फिर मिल जाता है । इस प्रकार भययुक्त अपसर्पण एवं
श्लिष्टतायुक्त गति रखने से इसका नाम चाष ( नीलकण्ठ पक्षी ) गति हो
गया है ।
१९. विच्च्यवा-चारी :—यहाँ एकवचन में प्रयुक्त पाद शब्द का अर्थ
दोनों पैरों के लिये समझना चाहिए ।
२०. एलकाक्रीड़िता-चारी :—इसमें एक बार उछलकर पुनः एक बार
उछाल लेना पड़ता है । जिसमें पाद, जंघा, सक्थि ( जानु का ऊपरी भाग )
तथा गुल्फ ( घुटने ) को साथ-साथ गतिशील बनाना होता है तथा यह पारी
पारी से उत्पलवन होता है । इसमें एलका ( बकरी ) की गति के समान
उछाल लेने के कारण इस चारी का 'एलकाक्रीडिता' नाम भी है ।
४१४ नाट्यशास्त्र
२१. बद्धा-चारी :-यहाँ ऊरुओं का वलन करना ही 'जंघास्वस्तिक' पद
का आशय है । जंघाओं के सम्यक् बन्धन हो जाने के कारण इसका 'बद्धा'
नामकरण किया गया है ।
२२. ऊरुद्वृत्ताचारी :-इसमें अग्रतलसंचर पाद की एडी जब दूसरे
पैर के पृष्ठभाग की ओर उन्मुख हो और जानुओं के झुकने से जंघा
आकुञ्चित होकर दूसरी जंघा के सम्मुख वलन से उद्वृत्ता की स्थिति लेले
तो 'ऊरुद्वृत्ता' होती है। क्योंकि इसमें ऊरुओं के ऊपर विवर्तन या वलनक्रिया
रखी जाती है। इसकी लज्जा या ईर्ष्या के भाव प्रकाशन में योजना रखी
जाती है । अन्य आचार्यों के मत में एडी को द्वितीय अग्रतलसंचर पाद के
बाहर की ओर रख कर इस चारी को प्रस्तुत किया जाता है ।
२३. अड्डिता-चारी :-अड्डधातु अतिक्रमण तथा हिंसा अर्थ में पठित
है इसमें इतच् प्रत्यय से अड्डिता शब्द निष्पन्न है। इसमें एक पाद सम-
स्थित और दूसरा तलसञ्चर की स्थिति में आगे और पीछे क्रमशः श्लिष्ट होता
है । इसमें पाद अपने स्थान से अतिक्रमण करता है अतः इसे 'अड्डिता'
कहते हैं ।
२४. उत्स्पन्दिता-चारी :-इसमें एक पैर की कनिष्ठिका अंगुली के
बाहरी भाग और दूसरे पैर के भीतरी भाग से निवर्तन होता है । वह पैर
का अपसारण रेचितपाद को अवधि कर करके रखा जाता है । चारी में
शोभाबृद्धि के लिये यह अपसारण रखा जाता है । यह क्रिया नदी के प्रत्यावर्तन
रूप स्पन्दित के तुल्य रहने से इसका उत्स्पन्दिता नाम है। जिसमें रेचक नृत्त-
हस्त रहता है ऐसा अन्य आचार्यों का मत है ।
२५. जनिता-चारी :-इसमें तलसञ्चरपाद से गमन किया जाता है ।
यह समस्त गतियों की जननी अर्थात् उत्पादिका होती है तथा इसी से गतियों
का आरम्भ किया जाता है । यही इसकी व्युत्पत्ति भी है। इसमें मुष्टिका-
कार हस्त का वक्षःस्थल पर विन्यास तथा अन्य हस्त का प्रसारण केवल इति-
कर्तव्यता को दिखलाने के लिये रखा गया है ।
२६. स्यन्दिता तथा अपस्यन्दिता-चारी :-इन दोनों चारियों का एक
साथ विवरण दिया गया है। इसमें समस्थित एवं निषण्ण ऊरू वाले दाहिने
पैर को पञ्च तालों के अन्तर से फैला दिया जाता है । इस फैलाने रूप धर्म के
कारण इसका नाम भी 'स्यन्दिता' हो गया है। इसी के विपर्यय या विपरीत
स्थिति से 'अपस्यन्दिता' चारी निर्मित हो जाती है। यहाँ प्रश्न होता है
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१५
कि स्यन्दिता का ही विपर्यय अपस्यन्दिता क्यों माना जाए, अपस्यन्दिता
विपर्यय स्यन्दिता क्यों नहीं है ? इसके उत्तर में यही समझना चाहिए कि
'अपस्यन्दिता' शब्द में लगाया गया 'अप उपसर्ग' ही इस को विपर्यय में
ला बैठाता है ।
२७. समोत्सारित-मत्तल्लीचारी :—इसमें परस्पर जंघाओं के वेध से
किये जाने वाले स्वस्तिक के बीच या जब एक तलसंचरपाद हो तब
दूसरा तलसंचर उसी समय होता है और दोनों ऐसे घूर्णमान या घूमते हुए
पादों का जो उपसर्पण है वही इस चारी को बनाता है । इस चारी में—
एक सम या अविकल रूप में उत्सारित तथा दूसरी मत्तल्ली अर्थात् मद से
विकल न होना या रक्षार्थ अन्यत्र पलायन करना—इस प्रकार की दो गतियां
रहती हैं । इसकी मध्यममद के अभिनय में योजना की जाती है ।
२८. मत्तल्लीचारी :—इसमें अग्रतलपाद भूमि में लगता या श्लिष्ट
रहता है । यहाँ पैर जंघा स्वस्तिक के योग से अर्ध त्र्यश्र ( आधा तिरछा )
होने से तथा पैरों के घूर्णन और अपसर्पण करने के कारण यह 'मत्तल्ली'
चारी होती है । इसकी प्रगाढ़मद में योजना रखी जाती है ।
२६. इन चारियों का प्रयोग नियुद्ध या बाहुयुद्ध या मल्लयुद्ध में तथा
इससे भी अधिक रूप में क्रमशः करण, अङ्गहार और नाट्य के प्रस्तुतीकरण
में रखा जाता है । आगे आकांशिकी चारी के क्रमशः लक्षण वर्णित हैं ।
३०. अतिक्रान्ताचारी :—इसमें कुञ्चितपाद ( १०।५३ ) को दूसरे
पैर के घुटने के क्षेत्र में रख आगे की ओर फैलाया जावे और चतुस्ताल की
दूरी तक ( पैर को ) ऊपर उठाकर भूमि पर गिराते हैं । गन्तव्य के अति-
क्रमण करने के कारण इसका 'अतिक्रान्ता' नामकरण है ।
३१. अपक्रान्ताचारी :—इसमें वद्धाचारी को पहिले सम्पादित कर फिर
पैर को ऊपर उठाकर बाजू में क्षिप्त या अपक्रमणदशा में रखते हैं । अपक्रमण
करने से इसे 'अपक्रान्ता' कहा गया है ।
३२. पार्श्वक्रान्ताचारी :—इसमें कुञ्चित पाद को अपनी बगल से ऊपर
की ओर ले जाकर भूमि पर एडी को गिराया जाता है । इसलिये कुञ्चितपाद
के बल से एडी का उद्घट्टित होना यहाँ सूचित होता है । अन्य आचार्य कहते
हैं कि द्वितीय पाद को उसके क्षेत्र तक उत्क्षिप्त रख कर उद्घट्टित कर भूमि
पर पटका जाता है यही 'पार्श्वक्रान्ता' है ।
३३. ऊर्ध्वजानुचारी :—यहाँ 'क्रमस्तब्ध' पद से पाद के उत्क्षेपण के
बाद उसे निश्चल करना ही 'स्तब्धता' होती है ।
४१६ नाट्यशास्त्र
३४. सूचीचारी :-जानु से ऊपर ऊरु तक जंघा को पूरी फैला कर
अग्रभाग से भूमि पर गिरावे । इस प्रकार यह 'सूची' के आकार की होने से
'सूची' कहलाती है।
३५. नूपुरपादिका-चारी :-यहाँ 'पृष्ठतः' पद का भाव है कि 'अंचित'-
पाद को पीछे की ओर एड़ी को छूते हुए अन्त तक ले जावे । बाजू में उस
'अग्रतल-संचर' पैर को पृथ्वी पर पटका जाए । ऐसा करने पर नूपुरों की
झनझन आवाज निकलेगी जिससे शीघ्रता प्रकट होगी तथा नूपुरों की योजना
भी । इसी आधार पर इसका नामकरण भी हुआ है ।
३६. दोलपादाचारी :-यहाँ 'उत्क्षिप्य' पद से आशय है कि कुञ्चित-
पाद को दक्षिणपाद के क्षेत्र तक बगल में ले जाए और फिर वहाँ दोला के
आकार में स्पन्दित कर बाद में उसे एड़ी की बाजू में पृथ्वी पर पटके । यह
'दोलपादा' का स्वरूपानुसारी नाम है ।
३७. आक्षिप्ताचारी :-यहाँ 'आक्षिप्त' पद से आशय है कि कुञ्चितपाद
को आगे तीन ताल के अन्तर में ऊपर उछाल कर अंचित के अर्धमण्डल आकार
में दूसरी बाजू में ले जावे और स्वस्तिक कर पृथ्वी पर पटके ।
३८. आविद्धा-चारी :-विश्लिष्ट जंघावाले स्वस्तिक बने कुञ्चितपाद
को फैलाया जाए और उसी 'आविद्ध' अर्थात् संश्लिष्ट उसी पाद को बाजू में
द्वितीय पार्ष्णि (एड़ी) के क्षेत्र में तदनुसार पटके ।
३६. उद्वृत्ताचारी :-यह चारी आविद्धा की शेषभूता मानी जाती
है । इसमें आवेष्टन अर्थात् दूसरे ऊरु के क्षेत्र की पार्ष्णि तक उछाल लेकर
'भ्रमरक' की तरह एक पाद को पृथ्वी पर पटकना होता है; और फिर दूसरे
पाद का इसी प्रकार ऊपर उद्वर्तन करना रहने से इसे 'उद्वृत्ता' (यथार्थ
नामा) कहते हैं ।
४०. विद्युद्भ्रान्ता-चारी :-'पृष्ठतः' अर्थात् पीछे की ओर ऊरु के मूल
में घुमावे किन्तु इसका आशय सही यह है कि बाजू के पीछे वलन कर मस्तक
को छू ले फिर इसी के अनुसार उस पैर को अगल बगल सभी ओर गोल
चक्कर में घुमा कर फैला दिया जाए ।
४१. अलाता-चारी :-इसमें पहिले पाद को को पीछे की ओर फैलाकर
फिर घुमा कर भीतर लिया जाए, इसके बाद द्वितीय ऊरु पर अभिमुख तल
कर उसे रखे तथा इस प्रकार करते हुए अपने पास वाली एड़ी के पास
उसे पटके । यह अलातचक्र की आकृति में आने से 'अलाता' है ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१७
४२. भुजङ्गत्रासिता-चारी :-कुञ्चितपाद को दूसरे ऊरु के क्षेत्र तक
ऊपर उठा कटि के बराबर ले जाकर जानु की ओर लौटा ले तथा नितम्ब
के सम्मुख तिकौनी या टेढ़ी एड़ी को उसी पर विवर्तित करे । इसके पश्चात्
बगल की जानु पर एक पैर को उत्तानतल में स्थापित करे । पैर के समीप
सर्प के आने पर भय से इधर उधर भागने वाले की तुलना से निर्मित यह
'चारी' नामानुरूप अपनी क्रिया के प्रदर्शन के कारण सार्थकनामा है ।
४३. हरिणप्लुताचारी :-अतिक्रान्ता चारी के प्रकरण में कथित
कुञ्चितपाद को उत्क्षिप्त कर (उछाल कर) उसे पृथिवी पर पटके । फिर दूसरी
जँघा के पृष्ठ भाग पर अञ्चित पैर रखे। इस प्रकार मृग की प्लुति (उछाल) के
तुल्य यह चारी रहती है। इसकी विदूषक की गति में योजना रखी जाती है ।
४४. दण्डपादा-चारी :-('नूपुरपाद' में कथित ) अञ्चितपाद को
दूसरे पैर की एड़ी पर ले जाकर शीघ्रता से फैलावे । इस प्रकार ऊरु, जानु
एवं जंघा की स्तब्धता से पैर के दण्डाकार स्थिति में आने के कारण इसे
'दण्डपादा' चारी कहा गया ।
४५. भ्रमरी-चारी :-अतिक्रान्ता चारी में कथित कुञ्चितपाद को ऊपर
कर सांप से डरे हुए की तरह तिरछी ऊरु को विवर्तित करे और फिर द्वितीय
पाद तल के घूमाने में त्रिक का भी एक घुमाव ले ले । इस प्रकार समग्र शरीर
के घुमाव से नेमि की तरह चक्कर लगाने के सदृश स्थिति रखने के कारण
इसका नाम 'भ्रमरी' है ।
४६. अब इनकी योजना को दिखलाते हैं कि इन चारियों में अङ्गों की
क्रिया का अभिनय सुन्दरतापूर्ण होना चाहिए और धनुष, वज्र आदि शस्त्रों के
छोड़ने में इनका विनियोग रखना होता है ।
४७. इन्हीं चारियों के विनियोग की व्यापक सीमा को दिखलाकर
शरीर की शोभा में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान बतलाते हैं—'अथंगौ' इत्यादि
के द्वारा । इसका आशय यही है कि इनमें कभी गति की प्रधानता रखी
जाती है तथा कभी हस्तों के व्यापार रूप अभिनय की और कभी दोनों की
भी । इनमें प्रथमपक्ष में हस्तों को पादविक्षेप के अनुसार रहने वाले तथा
पादविक्षेप के बाद व्यापृत रखना होता है । द्वितीय में हस्ताभिनय के अनुगत
एवं उनके पीछे पैरों की गति रखी जाती है तथा तृतीयपक्ष में दोनों की
प्रवृत्ति एवं व्यापार एक ही समय में विनियोग की अपेक्षा से रहेंगे । यहाँ
कारिकास्थ योग शब्द भी इसी तथ्य को प्रकट करता है ।
४८. उपाङ्ग = भ्रू, नेत्र आदि अवयव !
२७ ना० शा० द्वि०
४१८ नाट्यशास्त्र
४६. पाद क्रिया के समय यदि हस्ताभिनय भी हो तो पाद की गति
विश्रान्त हो जाती है अतः ऐसे समय हस्त की क्या दशा हो इस आशंका
के उत्तर में कहते हैं कि पादचारी की समाप्ति पर हस्त को कटिप्रदेश में
रखा जाता है ।
५०. पैरों को पृथ्वी पर रखने पर पादचारी के समान होने पर काय
का सन्निवेश बतलाने के लिये स्थानकों को बतलाना क्रम प्राप्त हो जाता है ।
‘स्थान’ शब्द भाव, अधिकरण या करण अर्थ में व्युत्पन्न है ( स्थीयन्ते इति
स्थानाति, तिष्ठन्त्येषु इति स्थानानि, तिष्ठन्त्येभिरिति स्थानानि ) । अतः
इसके अनुसार चारी के द्वारा कायसन्निवेश भी होता है अर्थात् चारियाँ प्रथम
गतिरूप होती हैं तथा बाद में जब स्थितिरूपा हो जाती हैं तो उन्हें स्थानक
या स्थान कहा जाता है ।
५१. छः स्थानकों के नाम दिखलाकर सर्व प्रथम वैष्णवस्थान का स्वरूप
दिखलाते हैं ।
५२-५४. वैष्णवस्थानः- पक्षः स्थित पद से अंगुलियों की बाजू में
[L
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१९
६५-६७. मण्डलस्थान :--घोड़ों तथा हाथियों के संचालन के समय
वैशाखस्थानक का उपयोग होता है उनसे भी स्थूल वाहन गरुड़ पक्षी आदि है
उसके निरूपण में मण्डलस्थान की योजना होती है ।
६७-७०. आलीढ़ स्थान :--आलीढ़ कहते हैं जिसमें चारों ओर से भूमि
का स्पर्श होता हो । सम्फेट का अर्थ है संघर्षपूर्ण दशा ।
७०-७२. प्रत्यालीढ़ स्थान :--इस स्थान में उत्तान तथा आकुञ्चित
पाद रहता है जो प्रसारण के विपरीत है । स्थानों से शस्त्र विमोक्षण का
विधान पूर्व में बतलाया गया है तथा इसी में सहायक होते हैं न्याय । अतः
न्यायों के अनुसार वृत्तियों के विभाग में स्थान अंगभूत हो जाते हैं यही यहाँ
समझाया है ।
७२-७६. हन्तव्य के कटि, पाद, वक्षःस्थल एवं शिर स्थानों पर अति-
क्रमण के लिये नाट्यशास्त्र में चार न्याय बतलाये गये हैं । अङ्गों के औचित्य
से न्याय का आश्रय लिया जाता है । न्यायों से प्रवृत्त होकर ही अंगों के स्वरूप
स्वाभाविक एवं उत्कृष्ट नियमन दर्शा सकते हैं । क्योंकि उन्हीं से क्रियायें
होती भी है अतः इसकी 'न्याय' आख्या इसी कारण सार्थक है ।
७६-८०. भारतन्याय :--परिवेष्टन करते हुए ले जाना यहाँ 'परिगम'
है । उद्वेष्टित = चारों ओर से उद्वेलित किया हुआ । अतः कलाई में उद्वेष्टन
करके शस्त्र का उद्बन्धन किया जाता है ।
८१-८२. सात्वतन्याय :--पृष्ठतः = शरीर के पिछले भाग या पीछे से ।
८२-८४. वार्षगण्यन्याय :--इसमें शस्त्र का घुमाना ऊपर ही से मस्तक
का एक चक्कर लगाते हुए कराते हैं ।
८४-८८. कैशिकन्याय :--इसमें शस्त्र को अन्त में मस्तक पर ले जाया
जाता है । समग्र युद्ध का अभिनय सौष्ठवपूर्ण आंगिक व्यापारों के द्वारा
सम्पन्न किया जाना चाहिए । युद्ध के प्रसंग में ( ऐसे युद्ध के समय ) छेदन
भेदन भी पात्रों के अङ्ग का हो सकता है । अतः इस विषय में यह बात ध्यान
में रखने की है कि रंगमञ्च या अभिनय के स्थल पर भेदन आदि नहीं होना
चाहिए । यहाँ ऐसी चेष्टाएँ रखी जाये कि प्रेक्षक गण को केवल युद्ध का भान
हो सके । ऐसे विषय या प्रसंग नाटक या प्रकरण में यदि रखे जायें तो युद्ध
को केवल संज्ञा ( इङ्गित या चेष्टाओं ) के द्वारा दिखलाया जाए । यही
यहां उचित माना गया है । यहाँ 'अथवा' पद के द्वारा व्यवस्थितविकल्प की
सूचना दी गयी है ।
८८-६०. सौष्ठव :--अङ्गों के प्रसंग में पूर्व में जिस सौष्ठव को कहा
४२० नाट्यशास्त्र
गया था उसकी अब परिकर सामग्री बतलाते हैं—'व्यायाम' इत्यादि से। यहाँ
व्यायाम पद का अर्थ अंग विषयक प्रशिक्षण एवं अभ्यास के उपयुक्त काल है
जिसके परिणाम स्वरूप द्रुत, मध्य एवं विलम्बित चच्चत्पुटादि ताल के अंग का
(यहाँ) पठन किया गया है। (उसका अनुगमन कर के ही शारीर चेष्टाओं
को युद्धादि प्रसंग में प्रदर्शित करना अभीष्ट है)।
६०-६१. सन्नगास्त्र = जिसका शरीर थक गया हो तथा विश्रान्ति ग्रहण
कर रहा हो। कूर्परांसशिरः = कूर्पर (कोहनी), अंस (कन्धे) तथा शिर—
ये सभी अंगों का प्राण्यङ्ग होने से यहाँ एकवद्भाव हुआ है।
६२-६३. चतुरस्रता :-- जिसके लिये सौष्ठव का विधान किया जाता
है। यहाँ कटिनाभिचरौ पद से आशय है कि कटि और नाभि पर हाथ क्रमशः
तथा एक साथ भी स्थित रखे जायें।
६३-६५. खड्ग युद्ध में जिन न्यायों को बतलाया वे ही धनुर्युद्ध में भी
होते हैं, अतः धनुर्
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४२१
से शरीर दृढ़ है वह सुडोल आकार वाला भी होगा ही तथा ऐसे व्यक्ति को
जिस कार्य में लगाया जाए उसमें उपयुक्त होने से नाट्य प्रयोग में सफलता
प्राप्त होती है । गात्रों में माधुर्य का अर्थ है उनका सुन्दर या सुडोल दिखलाई
देना ।
१०१-१०२. अङ्गक्रिया = अङ्ग-सिद्धि । अङ्गों के अनुसार प्राप्त चारी
की परम्परा से निर्मित स्वरूप वाले मण्डलों का विवरण अब दिया जा
सकता है, इस तथ्य को चारी के निरूपण के उपरान्त ही बतला कर चालू
अध्याय समाप्ति तथा अगले अध्याय में मण्डल के प्रतिपादन की बात को भी
दिखलाया गया है ।
:
The ही has: ह with ी. The top loop of ी curves to the right and down to a vertical line on the right.
Now look at Word 1 in दस मण्डल [?] है:
It has ह with ो! Wait, does it have a loop to the right?
Wait, it has a vertical line on the right, and an oblique stroke to the left top: that is ो!
Wait, does it say हो?
Wait, if it is हो, then हो है? Or ही है?
Wait, look at the top of that letter:
The curve goes to the right!
Wait, let me look at ही in line 5: बनता है वही 'मण्डल'.
In line 6: ( आगे भी ) इसी प्रकार.
In line 11: दिखलाया गया है ।
In line 17: इसी को 'आस्कन्दिता' भी कहते हैं ।
Look at ही in इतने ही (line 8): ह and ी.
Now look at the word before है in line 8:
Wait, could it be होते हैं? No, it's 2 letters: हो and है? Or ही and है?
Wait, look at हो in line 10: हो जाती है.
Notice
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १२ ४२३
६६-६७. परं चैव में 'च' पद का अर्थ 'अपि' लेना चाहिए । अर्थात्
इसके बाद भी मण्डलों का प्रयोग किया जाय । कैसे किया जाए का—उत्तर
है समचारी से । अर्थात् पारस्परिक योजनां से प्राप्त चारियों का ( औचित्य
या अपेक्षा के अनुसार ) यहाँ वहाँ सर्वत्र प्रयोग करना चाहिए ।
आचार्यात् — आचार्य की बुद्धि से प्रयोग किये जाए अपनी ऊहा से नहीं ।
६८. खण्डों का भी मण्डलों के साथ रहने से प्राधान्य दिखलाया गया
है । 'वाद्येन अनुगतानि' इससे यह बतलाया गया कि यहाँ चतुर्थ अध्याय
में नृत्त के उपयोगी विषयों में प्रतिपादित गति से विपरीत या भिन्न नाटकीय
गति में मण्डलों की प्रमुखता रखनी अभीष्ट है ।
त्रयोदश अध्याय
( गतिप्रचार )
१. यहाँ 'मण्डलकल्पनं' पद से जो चारी के संयोग या मिश्रण से मण्डल
निर्मित होते हों, उनके स्वरूप की कल्पना आचार्य के द्वारा नहीं बतलाने
पर भी स्वयं लक्षणों को देख कर अपनी बुद्धि से समझ लिया जा सकता
है। यहाँ एक प्रश्न फिर भी बना ही रहता है कि जब पिछले अध्याय में
चारी के संयोग से निर्मित मण्डलों को तो बतलाया परन्तु आचार्य ने उन
मंडलों की योजना या विधान क्यों नहीं बतलाया। इसके उत्तर में यही कहा
जा सकता है कि चारीमण्डल का प्रसंग चित्तवृत्ति रूप नहीं है कि उन्हें रस
एवं भाव की उपयोगिता में बतलाया जाए। अतः रस एवं भाव के अनुसार
की जाने वाली गतियों के विनियोग बतलाये गये हैं तथा इसी कारण मुनि
ने पृथक् से इस विषय पर (अलग से या स्वतन्त्र) एक अध्याय भी रखा है।
यह गति प्रकृति या पात्र के दिव्य, अदिव्य एवं दिव्यादिव्य रूप (और)
उसकी अवस्था और देशकाल की अपेक्षा को देख कर रखी जाती है। यह
गति प्रत्येक पुरुष की भिन्न-भिन्न होती है जिसे आगे बतलाया भी जाएगा।
अतः प्रथमतः उसकी प्रक्रिया दिखलायी गयी।
२-३. अभिनय के आरम्भ में नान्दी के उपक्रम के साथ प्रयोग के
उपक्रम में कैसी गति रखी जाए। यही 'तत्रोपवहनं' से आरम्भ किया गया।
उपवहन-विधि के उपरान्त मंच पर प्रविष्ट सूत्रधार तथा उनके सहयोगी,
नट, नटी (आदि) के साथ जो अभिनेय-विषयक संवाद हों उनके बाद
क्योंकि इस के पूर्व नान्दी हो चुकी रहती है। यहाँ यही तथ्य 'ध्रुवागीति'
के हो जाने के द्वारा सूचित किया गया है। 'ध्रुवागीति' देश, रस तथा
पात्र के अनुगत विषयों में उपनिबद्ध रहना चाहिए। पट या यवनिका के
हटाने के उपरान्त पात्र प्रवेश के समय भी उपोहन क्रिया की जाए। जिसके
बीच में नटी (पात्र) का प्रवेश अंगों के वलन क्रिया के सम्पादन के साथ
रखा जाए। यद्यपि स्त्रीपात्र का प्रवेश शरीर के स्वाभाविक वलन कर्म
के साथ ही होता है। अतः उसे शब्द से बतलाने की यद्यपि आवश्यकता नहीं
है फिर भी कोहल आदि आचार्यों के मत में यहाँ ऐसी गति विहित
या इष्ट है। इस समय शुष्काक्षर गान कर समुचित स्थान, दृष्टि एवं
तत्काल उपयुक्त मुखरागादि से युक्त हो कर पात्र को प्रवेश करना चाहिए
जिससे सामाजिकों को शीघ्र ही सम्बद्ध अर्थ या विषय की प्रतीति हो जाए।
इस समय गीत भी उत्तम रखा जाए जिससे सामाजिक या दर्शक उत्सुक
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२५
हो जाए। यहाँ 'यथामार्गरसोपेतं' के स्थान पर 'यथामार्गकलोपेतम्' पाठ भी
मिलता है। इसका अर्थ है कि मार्ग अर्थात् चित्र आदि में जो दो, चार, आठ
मात्राओं की कलाएँ होती हैं उनसे उपेत अर्थात् युक्त होना चाहिए।
४-५. विकृष्ट, त्र्यस्र एवं चतुरस्र इन तीन स्थानों में त्र्यस्र में वैष्णव
स्थान जिसमें एक पक्ष या बाजू समान या बराबर और दूसरा समुन्नत रहता
है। प्रसन्न—अर्थात् अपने प्रवेश के समय ही सन्न अर्थात् अचल। स्वस्थ
मयूर सदृश सुन्दर सिर जिसमें हो उसी प्रकार ग्रीवा प्रदेश रखना चाहिए।
६-७. यहाँ 'नाभिसंस्थ' पद से चतुरस्र का संकेत है। अतः नाभिस्थित
दक्षिण खटकामुखहस्त और कटिस्थित वाम अर्धचन्द्र हस्त (का प्रयोग)
अभीष्ट है यह यहाँ दिखलाया गया है।
८-१०. गति के बाद क्रमप्राप्त एवं उचित होने से स्थान (स्थिति)
को दिखलाने हेतु 'पादयोरन्तरम्' इत्यादि से पूर्व अध्याय ११।५२ में दर्शित
स्थानक को प्रस्तुत करने के बाद गति का उपक्षेप किया गया है। इसे देश
तथा काल को दिखलाने वाले लक्षणों के (जिन्हें इसी अध्याय में कह रहे हैं)
अनुरूप किया जाए। ताल-फैलाई गई अंगुलि और अंगूठे के बीच की लम्बाई
या प्रदेश हो वह ताल कहलाता है, जिसे बालिश्त कहते हैं। (अर्थात् एक
ताल = एक बालिश्त)। यह ताल अभिनेता के अपने हाथ के प्रमाण से रख
लेना चाहिए। यह गति की स्थिति या डग रखने की पृथ्वी पर की दूरी
(देश) चार, दो तथा एक ताल की होती है। यहाँ उत्तमादि प्रकृति के
अभिनय की अपेक्षा से क्रमशः ऐसी संख्या को लिया गया है। यह
विनियोजना उत्तम प्रकृति के पात्रों की चार ताल, मध्य पात्रों की दो ताल
तथा अधम पात्रों की एक ताल के प्रमाण पर की जाती है। इसे शोभाधायक
या नाट्यधर्मी प्रकार से मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उत्तमादि
पात्रों में क्रमशः तालों का ह्रास स्वभावतः होता है।
११. देश के नियम के पश्चात् इसमें समय का मान भी नियत होता है।
इसमें पैर को उठा कर रखने के समय में भी इसी प्रकार उत्तमप्रकृति के लिये
चार कलाएँ तथा इनसे आधी-आधी मध्यम एवं अधमों के लिये नियत हैं। पाँच
निमेष की एक मात्रा होती है, इस सामान्य लक्षण से यही सूचित होता है कि
सर्वत्र ध्रुवक के प्रमाणानुसार पैर को रखने में चार कलाएँ आवश्यक हैं।
कोहलाचार्य ने इस प्रसंग में उत्तमादि पात्रों के लिये द्विपदी आदि का भी
विधान बतलाया है जिसे विस्तारभय से यहाँ नहीं दिया जा रहा है। यहाँ
मध्यमध्य में स्थान; फिर उनमें भिन्न-भिन्न क्रियाएँ या चेष्टाएँ तथा उनमें भी
विश्राम की कल्पना के लिये विराम-स्वरूप मात्रा की कल्पना की गयी है।
इसी मात्रा की कल्पना के आधार पर चतुष्कला आदि का विधान रहता है
तथा यही तथ्य मुनि ने उपर्युक्त विवरण से सूचित भी किया है।
१२. यह समय के लय विषयक (मान का) नियम दिखलाने के लिये
कहा गया है। स्थित = (अर्थात्) विलम्बित लय। इसे प्रकृति आदि के
विभाग के अनुसार ठीक से विचार कर प्रयुक्त करे। यहाँ आदि पद से देश,
काल, अवस्था तथा रस को ध्यान में रखना भी अपेक्षित है। जैसे-धीरता के
कारण विलम्बित लय तथा इसके अभाव में कभी मध्य तथा कभी द्रुत लय का
होना। क्योंकि यह भी देखा गया है कि उत्तम जाति होने पर भी उसका
भाव अन्यथा रहता है अत यह प्रकृतिविभाजन है जात्यादि कृत विभाजन नहीं।
१३. लयत्रय का यह प्रयोग सत्व के कारण होता है। सत्व से आशय है
चित्तवृत्ति। अतएव संग्राम आदि के अवसर पर उत्तमपात्र की भी द्रुतलय
में गति रखी जाती है तथा शोकादि के अवसर पर अधमपात्र की भी
विलम्बित लय में गति रहती है।
१४. देश, काल आदि के नियम के अनुसार पात्रों के गतिगत विशेषरूप
या विचित्रता को दिखला कर अब विशिष्ट विवरण देने के भाव से मुनि
उनको बतला रहे हैं जिन्हें पूर्व में सामान्यरूप से कहा था।
१५. यहाँ 'तु' शब्द विशेषता के द्योतक रूप में प्रयुक्त है। अतः मन्थर
गति में चार ताल, स्वभावगति में तीन तथा दीप्तगति में पाँच ताल भी रखे
जा सकते हैं—(यही इस "तु" के द्वारा सूचित किया गया है)।
१६-१७. पार्श्वक्रान्तैः इत्यादि से कुञ्चितपाद में पार्श्वक्रान्ताचारी के
स्वरूप को दिखलाया गया है। (द्र० ना० शा० ११।३२) रंगकोण
अर्थात् प्रेक्षागृह के (रंगस्थल के) उत्तर-पूर्व कोण में तथा द्वितीयकोण
अर्थात् उत्तर-पश्चिम कोण में। तत परं=अन्य (शेष) दो कोणों में।
१८-१९. 'वामवेध' का अर्थ है पार्ष्णि क्षेत्र में एडी पर सूचीपाद का
निपात या प्रक्षेप करना। पञ्चपदी गमन स्वाभाविक गति में होता है। गति
की सिद्धि होने पर रंगकोणों में जाने के समय ब्रह्म स्थान का उल्लंघन नहीं
किया जाए यह ध्यान देने की बात है। मूल में 'पादानामेक विंशतिम्'
अर्थात् इक्कीस डग की जो बात कही है वह प्रत्येक कोण में पञ्चपदी गमन
करने पर (४ × ५ = २०) बीस ही होते हैं इक्कीस नहीं। परन्तु इसे
आचार्य की आज्ञा मान कर यहाँ यथाशक्य निर्वाह होगा संगति न बैठने से।