नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
( ना० शा० पृष्ठ १८ प्रस्तावना )
(७) स्वस्तिक स्थान (८) वर्धमानक स्थान (९) नद्यावर्त्त स्थान
(१०) संहत स्थान (११) परावृत्त स्थान (१२) ब्राह्म स्थान
( १६ )
भारतन्याय के अनुसार पात्र प्रवेश करते हुए बायें हाथ में खेटक तथा
दाहिने हाथ में शस्त्र लेकर रंगमञ्च पर परिक्रमा करता है। इसी प्रकार अन्य
न्यायों में भी थोड़े परिवर्तन के साथ शस्त्रों को लेकर ( नाट्य-प्रदर्शन में )
परिक्रमा की जाती है। भरतमुनि ने शस्त्रमोक्षण के इन अभिनयों ( के
सम्बन्ध ) में प्रयुक्त ( इन ) न्यायों के विषय में कुछ निषेध भी बतलाये हैं।
तदनुसार धनुष या वज्रादि के प्रहार या प्रयोग की स्थिति में वह संकेतमात्र
से छोड़ा जाए न कि उससे वास्तविक रक्तस्राव कराने वाला प्रहार हो
परन्तु यदि ऐसा आवश्यक ही हो तो फिर आहार्यविधि के अभिनय-विधान
का आवश्यकता के अनुसार अनुगमन किया जाए।
सौष्ठव—इस प्रकार जो नाट्य प्रयोग में चारी की योजना का
विधिवत् विधान दिखलाया गया परन्तु चारी के प्रयोग में 'अङ्ग सौष्ठव'
आवश्यक होता है, क्योंकि अङ्गसौष्ठव से ही नाट्य या नृत्य में शोभा का
संचार ( सम्भव ) होता है। जब कटि, कर्ण, स्कन्ध तथा मस्तक सम स्थिति
में और वक्षःस्थल उन्नत या उठा हुआ रखते हुए शरीर को व्यवस्थित करते
हैं तो यही 'सौष्ठव' कहलाता है। इसमें शरीर को लक्षणानुसारी क्रम में रखा
जाता है क्योंकि अङ्ग-सौष्ठव ही पात्रों के अभिनय को प्रभाव एवं समृद्धिशाली
बनाते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि नाट्यप्रयोग में चारी विधान का अतिशय
महत्व होता है, जिसके मूल में भरतमुनि की शास्त्रीय दृष्टि तो है ही साथ
में लौकिकता की धारा भी संयुक्त होकर चल रही है। इनमें सर्वत्र ही—
चाहे हस्तसञ्चार हो या शस्त्रप्रक्षेप या पाद ( प्रक्षेप या ) प्रचार एक
अनुगतता अवश्य विद्यमान रहती है। इसके अतिरिक्त रङ्गमञ्च पर किये गये
छेदन आदि के निषेध, अङ्गों के सौष्ठव पूर्ण विधान तथा व्यायामकर्म आदि
सभी नाट्यविधानों की प्रयोग में महत्त्वपूर्ण शृङ्खला रहती है जो भरतमुनि
की प्रयोगगत सूक्ष्म एवं व्यावहारिक दृष्टि की अभिव्यक्ति करती है।
मण्डलप्रचार—नाट्यशास्त्र का द्वादश-अध्याय 'मण्डलविधान' नामक
अध्याय है। यह बतलाया जा चुका है कि चारी द्वारा आङ्गिक अभिनय
सम्पन्न किया जाता है जो करण, खण्ड तथा मण्डल का आधार होता है।
इनमें एकपाद के प्रचार से 'चारी' दोनों पादों के प्रचार के द्वारा 'करण'
तथा करणों के योग मेल से 'खण्ड' तथा खण्डों के योग सें 'मण्डल' का निर्माण
होता है। चारियों के समूह से यह मण्डल निर्मित होता है। चारियों के
समान मण्डल को भी भौमिक तथा आकाशित वर्ग में विभाजित किया गया
( २० )
है। इनमें भौमिक तथा आकाशिक मण्डल के दस दस प्रभेद किये गये हैं
जो सब मिल कर मण्डलों के बीस प्रभेद बनाते हैं। इनका नामादि विवरण
इस प्रकार है—
भौमिकमण्डल— ( १ ) भ्रमर, ( २ ) आस्कन्दित, ( ३ ) आवर्त,
( ४ ) समोत्सारित, ( ५ ) एलकाक्रीडित, ( ६ ) अड्डित, ( ७ ) शकटास्य,
( ८ ) अध्यर्धक, ( ६ ) पिष्टकुट्ट तथा ( १० ) चाषगत ।
आकाशिक मण्डल— ( १ ) अतिक्रान्त, ( २ ) विचित्र, ( ३ ) ललित-
सञ्चर, ( ४ ) सूचीविद्ध, ( ५ ) दण्डपाद, ( ६ ) विहृत, ( ७ ) अलातक,
( ८ ) वामविद्ध, ( ६ ) ललित तथा ( १० ) क्रान्त ।
नाट्यशास्त्र में इनके स्वरूपादि का विवरण है। इन मण्डलों का युद्ध,
सञ्चरण तथा बाहुयुद्ध आदि में लीलापूर्ण अङ्ग सञ्चालन के साथ वाद्यों के
वादन के अनुगत प्रदर्शन रंगमञ्च पर प्रस्तुत किया जाता है ।
गतिप्रचार—नाट्यशास्त्र का तेरहवाँ अध्याय 'गतिप्रचार' अध्याय
है। आङ्गिक अभिनय के क्रम में पात्रों द्वारा प्रयोज्य विभिन्न अवस्था, भाव,
स्थान, आसन आदि के समय उनकी जो चाल या गति होती है वह भी
विभिन्नता लिये हुए रहती है तथा इसी विभिन्नता सम्पन्न गति से इन
पात्रों के स्थान, भाव, प्रचार आदि का विधान निश्चय किया जाता
है। यही विधान 'गति प्रचार' कहलाता है जिसमें पात्रों की अवस्था, काल,
स्थान आदि विविध सन्दर्भों में स्वरूपानुसार उनकी चाल या गति को
दिखलाया जाता है। इसका कारण यह है कि नाट्य प्रयोग में विविध पात्रों
की चाल उनकी प्रकृति तथा कार्य के अनुरूप बदलती हुई रखना आवश्यक
होता है तथा पात्र की अपनी चाल में भी कभी-कभी समय, अवस्था या
कारणवश ( संयोगवश भी ) भिन्नता आ जाती है। जिसका प्रभाव शरीर के
अङ्ग तथा उपाङ्गों पर ( विभिन्न रूप में ) पड़ता है तथा इनसे उनके पाद-
प्रचार या गति प्रभावित ( या परिचालित ) रहती है। अतएव गतिविधान
नाट्यप्रयोग की सिद्धि में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके अन्तर्गत पात्र
जब रङ्गमञ्च पर प्रवेश करे तभी से लेकर उसके निष्क्रमण तक की
प्रत्येक गति का विधान विभिन्न भूमिकाओं के प्रस्तुतीकरण की स्थिति में
अपना अतिशय ( महत्व एवं ) मूल्य रखती है ।
पात्रप्रवेश—नाट्यप्रयोग के आरम्भ में रङ्गमञ्च पर पात्र का प्रवेश
होता है। यह प्रवेश इस प्रकार होना चाहिए कि उससे प्रतिपाद्य
( २१ )
या साध्य रस के उदय का आरम्भ सामाजिकों में होने लगे। इसलिये ऐसे
समय भाण्डवाद्य के वादन के साथ-साथ मार्ग एवं रस से युक्त ध्रुवागान को
(पात्र प्रवेश-काल में) रखा जाता है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद¹ ने कोहल
आचार्य का इस सन्दर्भ में मत दिखलाते हुए बतलाया कि प्रवेशकाल के समय
नाट्यप्रयोग के अनुसार ध्रुवा या शुष्काक्षर गान करवाया जाए तथा पात्र को
उचित स्थान, दृष्टि, मुखराग आदि से संयुक्त रखते हुए रखा जाए, जिससे
सामाजिकों के अन्तःकरण में शीघ्र प्रतिपाद्य (मुख्य) रस के उदय का
आरम्भ होने लगे। इसमें उत्तम तथा मध्यम पात्रों का प्रवेश वैष्णवस्थान
द्वारा किया जाता है। उस समय उनका वक्षः, बाहु तथा मस्तक सम, उन्नत
तथा एक समान रखा जाता है, ग्रीवा मयूर सी उन्नत, सुन्दर तथा प्रसन्न,
दाहिना तथा बायाँ हाथ क्रमशः नाभि तथा कटि के पास अवस्थित रखते
हुए भूमिकानुसार उन्हें अन्तर (तथा समय) लेते हुए अपने डगों को रखना
चाहिए। इस प्रकार रङ्गमञ्च पर प्रविष्ट पात्र के चरण अपनी प्रकृति और
मानसी दशा के अनुरूप निश्चित दूरी पर समय के अनुसार रखे जाएँगे।
इसका कारण पात्रों की अपनी प्रकृति रहती हैं। उत्तमपात्रों की प्रकृति
गम्भीर होती है तथा अधम की चंचल या असंयत।
देवता तथा राजा जैसे उत्तमपात्रों के पादक्षेप का अन्तर चार ताल,
मध्यमपात्रों का दो ताल तथा स्त्री एवं नीच पात्रों का अन्तर एक ताल की
दूरी पर होता है। इसी प्रकार इनका समय भी दिखलाया गया है। यथा—
उत्तम पात्र के पाद क्षेप में चार कला, मध्यम में दो कला तथा अधम में
एक कला का समय लगना चाहिए। इसके अतिरिक्त इसे लय के अनुगत
भी रखा जाता हैं अतः उत्तमपात्रों का गति क्रम स्थित या विलम्बित लय
में, मध्यमपात्र का मध्यम लय में तथा अधम पात्रों का द्रुत लय में रखा
जाता है।
इस विवरण से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि जब गति का निर्धारण
ताल, लय तथा समय का आश्रय लेकर नियमानुसार रखा जाता है तो उसे
सत्व या मनोदशा के सन्दर्भ में भी रहना चाहिए। क्योंकि मनःस्थिति जब
असाधारण हो तो पात्रों की उपर्युक्त गति में प्रकृतिभेद से उसे रखा जाएगा
क्योंकि सत्व प्रकृति की अपेक्षा से आवश्यक रहता है। चरणों के अन्तर में
रखे गये काल, लय और गति के क्रम में प्रकृति की अपेक्षा से चित्तवृत्तियों की
१. द्रष्ट० अभि० भार० vol II पृ० १३७.
( २२ )
भी प्रमुखता रहती है। इसी कारण भयग्रस्तता तथा हर्ष की अवस्था में उत्तम
प्रकृति के पात्रों का पाद प्रचार या गति 'द्रुत' तथा क्षुधा, व्याधि एवं शोक
आदि की दशा में अधम प्रकृति के पात्रों का पाद प्रचार भी विलम्बित या
स्थित लय में रखा जाता है। अतएव पात्रों की प्रकृति के सन्दर्भ में उनकी
गति का स्वरूप चित्तवृत्ति या सत्व की अपेक्षा से निश्चित किया जाता है यह
स्पष्ट नियम दिखलाई देता है। परन्तु उत्तमपात्र की गति मध्यम पात्र में तथा
मध्यमपात्र की ( निर्धारित ) गति की योजना उत्तमपात्र में नहीं करना
चाहिए। इसका कारण यह है कि पात्रों की गति का निश्चय उनके गुण के
आधार पर किया जाता है, क्योंकि ऐसा करने से ही रस की स्थिति सम्भव
है। भरत का यह विधान लोकानुवर्तन की स्थिति एवं प्रवृत्ति की पुष्टि
करता है। इस सन्दर्भ में आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि जब भी
असामान्य मानसिक दशाओं के कारण गति के निश्चय में विपर्यय या अनियम
दिखलाई पड़ेगा फिर भी उसमें सत्व से अनुगत एक सूक्ष्म सूत्र के सदृश नियम
धारा का अनुगमन विद्यमान रहेगा ही; जिससे उत्तमपात्र की शोकादि में द्रुत
तथा अधम की विलम्बित कर दी जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भरता-
चार्य ने प्रत्येक गति का सत्व तथा रस के अनुरूप विस्तृत विधान ही इसके
सन्दर्भ में दिखलाया है।
रसगति—भरतमुनि ने प्रत्येक रस के अनुरूप गति का अतिसूक्ष्म
एवं प्रभावकारी विवरण के साथ रसों के नियम तथा गति को दिखलाया है।
संक्षेप में यहाँ उन्हें दिया जारहा है :—
श्रृंगार रस—इसमें पात्र की लेलित एवं कोमल गति रखी जाती है।
यहाँ चरण भी ताल लयाश्रित मन्द तथा स्वच्छन्द भाव से पृथ्वी पर रखे जाते
हैं। प्रच्छन्न-कामी पात्र चन्द्रज्योत्स्ना से प्रकाशित मार्ग में शब्दमात्र से
आशंकित एवं भीत होकर चुपचाप लड़खड़ाते चरणों से डग भरते हुए
चलता है तथा उस समय इसकी स्वच्छन्द या निर्भीक स्थिति नहीं होती है।
यहीं जब अन्धकार पूर्ण मार्ग पर चलता है तो इसे धूजते या लड़खड़ाते चरणों
में ठोकर खाते हुए रखा जाता है। हास्यरस में पात्र की गति विक्षिस रखी
जाती है। करुणरस में शिथिलगति में पात्र चलता है। इस गति की योजना
मरण के समय विशेष रूप से की जाती है। इसमें स्थित ( विलम्बित ) लय
में पाद प्रचार तथा अश्रुओं के प्रवाह से अवरुद्ध नयन रखें जाते हैं। यहाँ
उत्तमपात्र की गति धैर्य युक्त सहज अश्रु प्रवाह तथा निश्वास और ऊर्ध्व-
( २३ )
निरीक्षण के साथ रखी जाती है । इस समय पादप्रक्षेप या प्रचार ही सहज
होता है । शोकग्रस्त पात्र का वक्षःस्थल 'नत' रखा जाता है तथा गाढ़प्रहार
की स्थिति में शरीर को भुजा के सहारे टिका हुआ दर्शाया जाता है । रौद्ररस
में चण्डगति होती है । इस गति की योजना क्रोध में शत्रु का पीछा करने में
की जाती है । इसमें पैरों का अन्तर चार ताल का रखा जाता है । राक्षस
एवं दैत्य पात्रों में इसे स्वाभाविक गति के रूप में रखा जाता है, क्योंकि ऐसे
पात्र स्वभाव से ही रौद्र प्रकृति के होते हैं। इसमें पाद प्रचार विषम रहता
है । वीररस के प्रयोग में गौरवगति रहती है जो उत्तम या वीर प्रकृति के
पात्रों की सहज गति मानी जाती है। इसमें गति का क्रम द्रुत तथा इसी
कारण चरणविन्यास न्यूनकलाओं वाला रखा जाता है। भयानकरस में
गति भयत्रासित रखी जाती है। इसमें दोनों बाजुओं की ओर देखना,
धूजना, आँखों को खुली रखना, ओठों का सूख जाना आदि के साथ
स्खलितगति में पादसंचार रहता है। इसमें गति चूर्णपद में रहती है तथा
विकल तथा कापुरुष व्यक्ति की यह स्वाभाविक गति मानी गयी है ।
बीभत्सरस में सङ्कोचगति रहती है । इसमें हाथ पैर के पीछे रखे जाते हैं
तथा चरणविन्यास पास-पास या एक के पीछे एक या एक दूसरे के मध्य
में रखे जाते हैं । (तथा यह अनियन्त्रित स्वरूप में भी रहता है ) । अद्भुत-
रस में आश्चर्यगति रहती है । इसमें पैरों की गति लड़खड़ाते हुए तथा चारों
ओर घूमते हुए रहती है तथा पात्र मुग्धभाव में रहता है । शान्तरस में
स्थिरगति या अचंचलगति रखी जाती है, जो स्थितप्रज्ञ या शान्त पुरुष की
होती है । इसमें समपाद की स्थिति में पात्र अवस्थित रहता है ।
विविध पात्र गति—नाट्यशास्त्र में पात्रों के स्तर, दशा तथा प्रकृति
की विभिन्नता के आधार पर तथा उनके उत्तम, मध्यम एवं अधम श्रेणी के
विभाजन के द्वारा (उनकी) गति का विस्तार से निरूपण किया गया है ।
इसका कारण है—अभिनय में यथार्थता आकर प्रतिपाद्य रस में निर्बाध
आस्वाद्यमानता का उत्पन्न होना । भरत का यह विविध पात्रों की गति का
विवरण अति विस्तीर्ण है, जिसमें उत्तम आदि पात्रों में परिगणनीय नृप,
सचिव, यति, वणिक्, तपस्वी, वृद्ध एवं युवा, स्थूल तथा कृश, मत्त एवं
उन्मत्त तथा पंगु, वामन, कुब्ज एवं खञ्ज पुरुष के अतिरिक्त शकार, चेट,
विदूषक, कञ्चुकी तथा दास जैसे पात्रों की गतियाँ निरूपित हैं। यह गति
निरूपण नाट्य के प्रयोग में उपयोगी एवं प्रभावकारी तो है ही बड़ा ही
मौलिक भी है ।
( २४ )
इसके अतिरिक्त मुनि ने म्लेच्छ, शबर आदि प्रजातियों की प्रकृति एवं
स्थिति के अनुरूप गति निरूपण के साथ-साथ नाट्य में प्रयुज्यमान सिंह,
वानर, रीछ जैसे पशुओं तथा पक्षि एवं सर्प आदि प्राणियों की गति का भी
व्यवस्थित विवरण दिया है। इसके अतिरिक्त पुरुषपात्रों के समान ही स्त्री-
पात्रों की गति का भी विस्तार से विवरण है। सुकुमार प्रकृति के कारण
स्त्रियों की गति में कला, ताल एवं लय के प्रमाण को पुरुष की अपेक्षा आधा
रखा जाता है, तथा अवस्था भेद से भी युवती, मध्या, प्रौढ़ा तथा वृद्धा के भेद
से भी स्त्रीगति में अन्तर रहता है। जैसे बाला की गति में अधिक स्वच्छन्दता
रहनी चाहिए तथा सभी स्त्रियों की गति में लालित्य एवं विलास के साथ-
साथ सौष्ठव भी दिखना चाहिए। (ये) सभी पात्रों की गतियां उनकी प्रकृति,
चित्तवृत्ति, अवस्था, देश एवं काल के अनुरूप रखी जाती है। इन विवरणों
में जिन जातियों, पदार्थों ( या वस्तु ) का विधान न हो उन्हें लोकव्यवहार
एवं उनके स्वरूप को देख कर नाट्यप्रयोग में आचार्यबुद्धि से नियोजित
करना चाहिए।
भूमिका-विपर्यय—नाट्यप्रयोग की अपेक्षा या अन्य स्थितिवश इसके
अतिरिक्त भी पात्रों की भूमिका में परिवर्तन किया जा सकता है। मुनि ने
ऐसे उद्देश्यों की पूर्ति के लिये भूमिका विपर्यय का विधान दिया है।
इसमें ऐसे कार्य का उद्देश्य तथा विधान के साथ पर्याप्त व्यवस्थित विश्लेषण
( भी किया गया ) है कि पुरुष एवं स्त्रीपात्र अपने स्वभाव, स्थिति एवं
प्रकृति के विपरीत ऐसी भूमिका क्यों ग्रहण करते हैं। यह दो स्थितियों में
होता है—( १ ) आत्मस्वभाव या स्वरूप का परिवर्तन तथा ( २ )
परभाव या समय के अनुसार इष्ट स्वरूप का धारण या तद्भावगमन।
इस प्रकार स्त्रीपात्र वेष, कर्म, भाषा एवं गति से पुरुषों का तथा पुरुष
भी स्त्रीवेष तथा मृदुगति आदि से स्त्रीभाव का अभिनय सम्पन्न करता है।
यह भूमिकाविपर्यय सिद्धान्त अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। प्रथम तो
यह प्रयोग की दृष्टि से विलक्षणता लिये हुए है, क्योंकि इसमें अधिक नाट्य-
कौशल दिखलाना पड़ता है जो अतिशय अभ्यास तथा परिश्रम की अपेक्षा
रखता है। दूसरे इसका ऐतिहासिक महत्व भी कम मूल्यवान् नहीं है।
इससे यह स्पष्ट है कि भरतमुनि के समय तक नाट्यविज्ञान इतना विकसित
तथा समृद्ध हो चुका था, जिसमें मनोवैज्ञानिक स्तर पर चमत्कार की
उद्भावना के उद्देश्य के अतिरिक्त अन्य तात्कालिक व्यवस्था की पूर्ति के लिये
'भूमिकाविपर्यय' की योजना हो सकती थी। इसने संस्कृत नाट्यप्रयोग
( २५ )
को गति एवं सौन्दर्य प्रदान करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया यह
निर्विवाद है।
विमान आदि गति—नाट्यप्रदर्शन में कथावस्तु के अनुरोध से अनेक
दृश्यों का दिखलाना आवश्यक रहता है, किन्तु सामान्यतः ऐसे नाट्यप्रयोग
में विमान आदि प्रत्यक्ष दर्शाना संभव नहीं। ऐसी परिस्थिति में भरतमुनि ने
विमानगमन, रथारोहण, पर्वतारोहण, जलसन्तरण, आकाशगमन, अन्धकार-
यात्रा जैसे दृश्यों, पदार्थों एवं क्रियाओं को नाट्य में प्रस्तुत करने के लिये
कुछ प्रतीकात्मक अभिनयों तथा युक्तियों की परिकल्पना की है। इस प्रसंग में
की जाने वाली पात्रों की गतियों का निरूपण अतिशय स्पष्ट विवरण के साथ
किया गया है। निर्जीव पदार्थों एवं सजीव प्राणिपात्रों की रङ्गमञ्च पर
अवतारणा की यह पद्धति नाट्यप्रयोग के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण स्थिति
रखती है। देश, काल आदि भेद से प्रतीकात्मक अभिनय के तथा तदनुरूप
काव्यपाठ के द्वारा ऐसे दृश्यों को रूपायित करने का विधान रखा गया है
जो लोकानुसारी होता है। इस सन्दर्भ में आचार्य अभिनवगुप्तपाद
ने अनुकृतियों के प्रयोग करने की भी सहमति दी है। उनका मत है कि
अनुकृत प्रतिकृतियों तथा शोभाधायक पटचित्रों के द्वारा भी ऐसे दृश्यों को
उपस्थापित करना चाहिए। पतञ्जलिमुनि ने अपने व्याकरण महाभाष्य में
शोभाधायक चित्रपटों के धारण करने वाले शोभिकों का उल्लेख किया था
जो अभिनवगुप्त के विचारों का उत्स प्रतीत होता है। इस प्रकार नाट्यधर्मी
प्रतीकों तथा अभिनयों के द्वारा न केवल आन्तर चित्तवृत्तियों की किन्तु बाह्य
जगत् के स्वरूप एवं सौन्दर्य की अभिव्यक्ति सम्भव है यह भरतमुनि ने अपने
विवरणों से दिखलाया जो नाट्यार्थ ग्रहण करवाने में अतिशय मूल्यवान् है।
गति के अनुगत सङ्गीततत्त्व—विभिन्नपात्रों के रङ्गमञ्च पर होने वाले
गति प्रचार का (जो उनके प्रवेश से लेकर निष्क्रमण तक है) विवरण
इतनी उत्तमता के साथ अन्यत्र कहीं प्राप्त नहीं है। इनमें अभिनेता या पात्र
केवल एक निश्चित प्रमाणयुक्त गति से पादनिक्षेप करते हुए मञ्च पर आते ही
नहीं हैं किन्तु यहाँ उनकी गति को उपयुक्त संगीत का अनुगमन या संगत
भी करनी पड़ती है, विशेष कर वाद्य तथा कण्ठ संगीत की। वाद्यों में इनकी
संगत बासुरी तथा वीणा से होती थी तथा विभिन्न मृदङ्गवादन के विषय में
एक नियम था। ऐसे समय गायी जाने वाली ध्रुवाओं के लिये भी विधान
(या नियम) था जिनका प्रयोगादि के साथ स्वरूप विवरण नाट्यशास्त्र के
( २६ )
अध्याय ३२ में दिया गया है। उस समय का यह वाद्यवादन दर्शकों को
दिखलायी पड़ता था तथा आज के समय की तरह पाश्र्वसंगीत या पर्दे के
पीछे से यह कार्य नहीं किया जाता था।
जब यह कहा गया कि नाट्य एक कला है जो स्वयं यथार्थ नहीं है परन्तु
यथार्थ का अनुकरण है। अतः इस नाट्य में संगीत के अभिव्यञ्जक एवं
भावस्पर्शी कार्य को लगाना उसी के उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए रसों की
समृद्धि करना है। मुनि को यहाँ ऐसे प्रयोक्ता पात्र की अपेक्षा रही जो दर्शकों
के समक्ष आवें तथा वे जब तक अपना सम्भाषण या संवाद कथन आरम्भ न
करें या उसे समाप्त न करें। इसी कारण ऐसे समय मृदंग या बासुरी का
शीघ्र ही वादन आरम्भ किया जाता था और उसी के साथ पर्दे के हटते ही
पात्र रङ्गमञ्च पर प्रवेश करेगा तथा यह क्रम तब तक चलता रहता था जब
तक कि वह संवाद या सम्भाषण की स्थिति में न पहुँच पाए। इसी प्रकार
का क्रम उसके रङ्गमञ्च से निष्क्रमण के समय भी रहता था। अतः यही वह
समय था जब ध्रुवा गान हो। कण्ठ तथा वाद्य संगीत का यह चलने वाला
प्रयोगक्रम ( नृत्यगत ) अभिनेता एवं अभिनेत्रियों के पादविक्षेप तथा अभिनय
के साथ-साथ चलता था जो आज हमें किसी बैलेट या आपेरा नाट्य या
नृत्य की सूचना सा देता दिखाई देता हैं तथा नाटकीय संवाद के साथ चलने
वाले संगीत के कारण यह पुनः आपेरा के समीप आ जाता है। ये
विवरण या नाट्यप्रयोग के नियम भारत में प्राचीन काल में प्रस्तुत नाट्य-
विधान में प्राप्त हैं, जो आज भी विश्व कलासन्धान के महत्त्वपूर्ण स्रोत एवं
आधार बनने में समर्थ होकर अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
स्थानक या स्थान—नाट्यशास्त्र में गति विधान के प्रसंग में स्त्रियों
एवं पुरुषों के स्थानक तथा भूमिका विपर्यय का विचारपूर्वक निरूपण किया
गया है। इनमें पात्रों के सम्भाषण एवं गति के समय तीन प्रकार के स्थानक
होते हैं—(१) आयतस्थान, (२) अवहित्थ स्थान तथा (३) अश्वक्रान्तक
स्थान।
आयतस्थान—इसमें नारी का दाहिना पैर सम, बायाँ तिरछा होकर
एक ताल के अन्तर से उठा हुआ तथा बायीं ओर से कमर ऊपर उठी हुई
रहती है। नाट्यप्रयोग की दृष्टि से यह स्थान बड़ा महत्त्वपूर्ण माना जाता
है। इसके द्वारा आवाहन, विसर्जन, चिन्ता, पुष्पमोक्षण जैसी क्रियाओं तथा
कोप, गर्व, मान आदि स्त्रीजनोचित भावों का अभिनय किया जाता है।
( २७ )
**अवहित्थस्थान—**इसमें बायाँ पैर सम, दाहिना तिरछा तथा कटि का
बायाँ भाग उन्नत या उठा हुआ रहता है। इसके द्वारा सहजसम्भाषण, निश्चय,
वितर्क आदि क्रियाओं तथा लीला, विलास, विव्वोक आदि नारी सुलभ
सुकुमार भावों का अभिनय किया जाता है।
**अश्वक्रान्तकस्थान—**इसमें एक चरण उठा हुआ, दूसरा अग्रतलसंचर
स्थिति में झुका हुआ तथा सूची या आविद्ध चारी रहती है। इसके द्वारा
वृक्ष की टहनियों को छूने, पुष्प गुच्छकों को ग्रहण करने, अङ्गों से वस्त्र के
खिसकने आदि क्रियाओं का तथा लालित्यपूर्ण नाट्यार्थ के ग्रहण करने जैसे
अर्थों का अभिनय किया जाता है। इन स्थानकों का प्रदर्शन चेष्टाएँ तथा
चारी के आरम्भक क्षण तक ही रखा जाता है। ये स्त्री तथा पुरुष पात्रों के
द्वारा सामान्यतः नियमानुसार रखे जा सकते हैं।
नाट्यशास्त्र में स्थानक का विवरण अल्प है तथा इनकी स्थिति का स्वरूप
भी (इसी कारण) पूर्ण नहीं प्रतीत होता । परन्तु अभिनयदर्पण, सङ्गीतरत्नाकर
तथा नृत्यरत्नकोश आदि नाट्यसंगीत ग्रन्थों में स्थानों का विवरण विस्तार
से प्राप्त होता है। यह स्थानकों का विवरण इसी कारण यहाँ देना आवश्यक
है। स्थानों का प्रयोग भी विविध अभिनय तथा मुद्राओं के प्रस्तुत करने के
समय रखा जाता है, जहाँ एक नियत स्थिति में पात्र को खड़ा रहना होता
है। यही स्थिति 'स्थान' ( Pose ) कहलाती है।¹ ये स्थान ( आरम्भ में )
छः हैं—( १ ) वैष्णव, ( २ ) समपाद, ( ३ ) वैशाख, ( ४ ) मण्डल, ( ५ )
आलीढ तथा ( ६ ) प्रत्यालीढ़ । इन सभी स्थानों के अधिष्ठाता देवता भी
नियत है तथा इनका विवरण शास्त्र में मिलता है। तदनुसार यह क्रम इस
प्रकार है :—
**वैष्णव—**देवता विष्णु। आगे रखने का प्रमाण २ १/२ ताल के अन्तर
से, एक पैर ऊँचा तथा दूसरा तिरछा, जंघा ऊँची तथा एडी तिरछी रखी
जाती है ।
१. नाट्य के इस स्थानक विवरण की विस्तार से मीमांसा यहाँ सम्भव
नहीं है परन्तु इन विवरणों के आधार पर हमने कुछ रेखाचित्र लगा दिये हैं।
इन्हें नाट्यशास्त्र के अभिनयप्रयोग विवरण में उपयोगी तथा परम्परानुमोदित
मानकर आज भी दक्षिण भारत के कलाकार इन्हें प्रस्तुत करते रहे हैं
( अतः ये प्राचीन ही हैं )—सम्पादक ।
( २८ )
समपाद—देवता ब्रह्मा । दोनों पैरों का अन्तर का प्रमाण एक ताल
का तथा दोनों पैर घुटनों के साथ सहज मुड़े हुए ।
वैशाख—देवता कात्तिकेय । पैर एक दूसरे के पीछे तीन बल में लपेट
लिये हुए रख कर नमे हुए होकर खड़ा रहना ।
मण्डल—देवता इन्द्र । दोनों पैरों का यहाँ अन्तर तीन ताल तथा कटि
तथा पृष्ठ सीधी रखकर झुकते हुए खड़े रहना ।
आलीढ—तथा प्रत्यालीढ—दोनों के देव इन्द्र । मण्डल-स्थान में
दाहिने पैर को पांच ताल के अन्तर से आगे रखने पर आलीढ़ तथा इसके
विपरीत दाहिने पैर को सिकुड़ा कर बायें पैर को पाँच ताल के अन्तर से
आगे रखना प्रत्यालीढ है ।
उपर्युक्त छः स्थान पुरुषसंस्थान है तथा नाट्यशास्त्रानुमोदित हैं, परन्तु
शास्त्रीय ग्रन्थों में इनके अतिरिक्त अन्य स्थान भी प्राप्त होते हैं । 'सङ्गीत-
रत्नाकर' में इस सन्दर्भ में तेईस ( देशी ) स्थान दिखलाये गये हैं । जिनका
स्वरूप सहज बोध्य है। ये इस प्रकार हैं—( १ ) स्वस्तिक, ( २ ) वर्धमान,
( ३ ) नन्द्यावर्त, ( ४ ) संहज, ( ५ ) समपाद, ( ६ ) एकपाद,
( ७ ) पृष्ठोत्तानतल, ( ८ ) चतुरस्र, ( ६ ) पाष्णिंविद्ध, ( १० ) पार्ष्णि-
पार्श्वगत, ( ११ ) एकपार्श्वगत, ( १२ ) एकजानुगत, ( १३ ) परावृत्त,
( १४ ) समसूचि, ( १५ ) विषमसूचि, ( १६ ) खण्डसूचि, ( १७ ) ब्राह्म,
( १८ ) वैष्णव, ( १६ ) शैव, ( २० ) गरुड, ( २१ ) कूर्मासन,
( २२ ) नागबन्ध तथा ( २३ ) वृषभासन ।
इनमें समसूची, विषमसूची, खण्डसूची, गरुड, कूर्मासन, नागबन्ध तथा
वृषभासन ये आसन हैं तथा शेष स्थान हैं। इनमें स्थानकों के कुछ चित्र हमने
दिये भी हैं, जिनसे इनका स्वरूप स्पष्टतः समझा जा सके। इन स्थानकों
का ग्रन्थगतरूप स्वरूप इस प्रकार है :—
स्वस्तिक—दाहिने पैर को बायीं ओर तथा बायी ओर रखते हुए
दोनों पैरों की तिरछे करते हुए रखना ( Cross ) । ये सहजभाव में झुके हुए
और एक दूसरे को छूते हुए रखे जाएँ ।
वर्धमान—दोनों पैरों की एड़ी को एक दूसरे की ओर मुँह किये हुए
पास-पास रखकर दाहिने पैर की नोक दाहिनी ओर तथा बायें की बायीं
ओर रखते हुए खड़े रहना ।
नद्यावर्त—वर्धमान स्थिति में खड़े होकर दोनों पैरों का अन्तर छः से
बारह अंगुल रखना ।
( २६ )
संहत—दोनों पैरों को मिला कर रखते हुए उनके अंगूठे तथा टखने
को एक दूसरे से लगा कर खड़े हो जाना ।
समपाद—दोनों पैरों को एक बालिश्त के अन्तर पर समान रूप
में एडी के बल पर खड़े रहना । यह स्थिति वैष्णव-स्थान में आगे
बतलायी गयी है।
एकपाद—समपाद में एक पैर को ऊपर उठाना ।
पृष्ठोत्तान-तल—एक सीधे पैर के पीछे दूसरा पैर एड़ी को ऊँचा कर
पंजे ( के फण ) को ऊँचा करते हुए मोड़ कर रखना और एक पैर से उसे
पीछे ढकेलना ।
चतुरस्र—नद्यावर्त की स्थिति में पैरों का अन्तर ढ़ाई अंगुल के अन्तर
से रखना ।
पार्ष्णिबद्ध—एक पैर की एड़ी को दूसरे पैर के अंगूठे का स्पर्श
हो इस प्रकार खड़े रहना ।
पार्ष्णि-पार्श्वगत—बायाँ पैर सीधा रख दाहिने पैर की एड़ी बाँयीं
पैर की ओर रहे इस प्रकार आड़ी रख कर खड़े रहना ।
एकपार्श्वगत—उपर्युक्त स्थान में दाहिने पैर को उलटी रीति से
अर्थात् दाहिने पैर की एड़ी दाहिनी ओर रखकर खड़े होना ।
एकजानुगत—एक पैर को सीधा रख कर दूसरे पैर को एक बाजू
में चार अंगुल दूर टखने से सहज मोड़ के साथ रखना ।
परावृत्त—बाये पैर की एड़ी के सामने दाहिने पैर का अंगूठा तथा
दाहिने पैर की एड़ी के पास बायें पैर की कनिष्ठिका अंगुली को एक दूसरे
के साथ स्वस्तिक रखना ।
समसूचि—एड़ी तथा जंघा को जमीन से स्पर्श कर दोनों पैरों को
तिरछे तथा लम्बे ( क्रमशः ) करना ।
विषमसूची—समसूचि में एक पैर को पीछे लंबा करना अर्थात् एक
पैर आगे और दूसरा पीछे की ओर लम्बा कर स्थित होना।
खण्डसूची—नियमसूची की स्थिति में एक ( अर्थात् अगले ) पैर को
सिकुड़ा लेना ( तथा पिछले पैर को लम्बा रख कर बैठना । )
ब्राह्म—एक पैर से सीधे खड़े होकर पिछला पैर पीठ की ओर घुटनों
को मिला कर रखना ।
वैष्णव—इसे नाट्यशास्त्र में दिखलाया ही है ।
शैव—बायाँ पैर जमीन पर सीधा रख कर वाहिना पैर घुटने से ऊपर
( ३० )
ऊँचा कर तिरछा मोड़ते हुए ( आगे की ओर ) रखना । ( बैशाख स्थान में
तथा इस स्थान में अतिशय साम्य है )
गारुड—दायाँ बायाँ पैर उलटा कर ऐसे सिकुड़ाते हुए रखना जिसमें
दोनों एड़ियाँ जमीन का स्पर्श पंजे के अगले अंगूठों से करे ।
कूर्मासन—दाहिने पैर को आगे सिकुड़ा कर बैठे तथा पंजा सीधा
रखे जिससे एड़ी ऊपर रहे तथा बायाँ पैर खड़ा जमीन पर टिकाना ।
नागबन्ध—उपर्युक्त मुद्रा में बायें पैर की जंघा पर दाहिने को तिरछी
रख कर बैठना ।
वृषभासन—दोनों घुटने जमीन पर जुड़ा कर अन्तर से रखते हुए दोनों
पंजों के बल बैठना ।
उपर्युक्त स्थान तथा आसनों की करणों में योजना का विवरण मिलता
है । जैसे स्वस्तिककरण की स्वस्तिक, ऊर्ध्वस्वस्तिक, वक्षःस्वस्तिकं, पृष्ठ
स्वस्तिक जैसे स्वस्तिक करणों में योजना होती है । वर्धमानक ( इस ) स्थान
की तलपुष्पपुट, रेचित निकुट्टक, छिन्न तथा अन्य करणों में योजित होता है ।
संहत को समनख तथा लीन करणों में संयुक्त किया जा सकता है । नद्यावर्त
को अपविद्ध, अर्धरेचित, भुजङ्गतस्त, रेचित, जैसे करणों में संयोजित किया
जाता है । चतुरस्र की मण्डलस्वस्तिक, स्वस्तिकरेचित, कटिसम तथा उन्नत
जैसे करणों में योजित होता है । गरुड की कुञ्चित में योजना होती है । इसी
दिशा में अन्य स्थान की भी करणों में योजना हो सकती है यह ध्यान से देखने
पर स्पष्ट हो सकता है । नाट्यशास्त्र के किसी उत्तरकालभव पाठ या
कोहलादि प्रणीत स्थानक विवरण को लेकर ही सङ्गीतरत्नाकरादि¹ में इनका
विस्तार है जो नाट्यशास्त्र का ही है । क्योंकि अभिनयादि प्रयोग में आज भी
इनका उपयोग हो रहा है । अतः ये जो स्थान अतिरिक्त है वे भी नाट्यशास्त्र
के भरत प्रोक्त ही होना ( उचित ) लगता है, तथा इन्हें परम्परागत
नाट्याचार्यों की परम्परा में आज माना भी जाता है ( परन्तु इनका
प्रामाणिक संशोधनपूर्ण उत्तर अभी शेष है । जो भी हो इसपर हमने इसी
कारण प्रस्तुत संस्करण में कुछ ही ऐसे चित्र देकर विषय को रखा है । जिसे
आशा है प्रमाणादि के साथ हम आगे और भी संशोधित कर प्रस्तुत करने का
उद्योग करेंगे— (सम्पा०)
१. ये २३ देशी स्थानक जिनको संगी. रत्ना. में नर्त० पृ० ३२६-३३५
अडचार सं० में देखा जाए ।
( ३१ )
आसन एवं शयन विधान—नाट्यशास्त्र में पात्रों के देश, काल,
प्रकृति तथा चित्तवृत्ति आदि के अनुरूप उपयुक्त आसन तथा शयन विधान का
निरूपण किया गया है। यह विधान राजसभा तथा समाज में प्रचलित
व्यवहारों के आधार पर निर्धारित किया गया है। ये आसन स्वस्थ या
विश्रामदशा में, विचार, चिन्ता, शोक, मूर्च्छा, लज्जा, मद, ग्लानि, रोग
तथा निद्रा की अवस्था में विभिन्न स्वरूप वाले दिखलाये गये हैं। इसी
प्रकार प्रियाप्रसादन, धार्मिकविधि सम्पादन एवं देववन्दना आदि के समय
इनके विभिन्न स्वरूप रहते हैं। इन भावों के लिये विभिन्न शारीरिक
भङ्गिमाओं के तथा मुद्राओं के प्रयोग का भी भरतमुनि ने निर्देश किया है,
तदनुसार शोक की दशा के अभिनय में दोनों हाथों के सहारे चिबुक को रखा
जाता है, मस्तक गर्दन पर झुकाया जाता है तथा इन्द्रिय एवं मन की
निष्क्रियता दिखलाई जाती है। इसी प्रकार प्रिया के प्रसादन में दोनों घुटनों
को पृथ्वी पर रख कर नीचे मुख किये हुए रहते हैं तथा देववन्दना में भी
यही आसन रखा जाता है।
इस प्रकार पात्रों के उत्तम, मध्यम आदि सामाजिक आधारों पर अनेक
प्रकार के आसनों का विधान दिखलाया गया है। तदनुसार राजा एवं
महारानी के लिये सिंहासन, पुरोहित, अमात्य एवं उनकी पत्नियों के
लिये वेत्रासन, सेनापति एवं युवराज के लिये मुण्डासन, ब्राह्मणों के लिये
काष्ठासन, वैश्याओं के लिये मसूरक आसन तथा शेष स्त्रियों एवं सेवकों
आदि के लिये भूम्यासन का विधान बतलाया गया है।
शयन—इसी प्रकार शयनदशा में शरीर की स्थिति एवं भङ्गिमा
के आधार पर छः प्रकार के शयन का विवरण नाट्यशास्त्र में दिया गया
है। यह विधान अतिसङ्क्षिप्त है क्योंकि नाट्यप्रयोग में इसका उपयोग
अधिक नहीं होता। ये छः प्रकार हैं :—( १ ) आकुञ्चित, ( २ ) सम,
( ३ ) प्रसारित, ( ४ ) विवर्तित, ( ५ ) उद्वाहित तथा ( ६ ) नत ।
'आकुञ्चित' में समस्त अङ्ग सिकुड़े हुए तथा दोनों घुटने शयन से
सटे हुए रखते हैं। इसकी योजना ठण्ड से ठिठुरते हुए पात्र के लिये रखी
जाती है। 'सम' में मुँह ऊपर तथा दोनों हाथ शिथिल रहते हैं। इसे सोए
हुए व्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाता है। 'प्रसारित' में एक भुजा को
सिरहाना बना कर जंघाओं को फैला कर लेटा जाता है। सुख से या
निश्चिन्त होकर नींद लेने की दशा में इसकी योजना रहती है। विवर्तित'
में पात्र नीचा मुँह रख कर सोता है। शस्त्र से क्षत या मृत, उन्मत्त या
( ३२ )
मद्य पान कर मस्त पड़े हुए पात्र की दशा बतलाने में इसका प्रयोग किया
जाता है । 'उद्वाहित' में पात्र अपने मस्तक को हाथ या कलाई पर रख कर
सोता है । इसकी योजना लीला या स्वामी के आने आदि में रखी जाती
है । 'नत' में जंघाएँ फैला कर तथा दोनों हाथों को ढीले रखते हुए शयन
करते हैं । इसकी योजना आलस्य, श्रम तथा थकावट की स्थिति में की
जाती है ।
इस प्रकार नाट्यशास्त्र में गतिविधान के अन्तर्गत हस्त-पाद-प्रचार,
आसन एवं शयन की विधियों का सभी पक्षों को ध्यान में रख कर
यथाशक्य पूर्ण विवरण दिया गया है । ( इसके अतिरिक्त ) मुनि ने इतने
विस्तीर्ण इस विषय पर विवरण देकर भी-जो कि सूक्ष्म तथा प्रयोगात्मकता
से सम्पन्न है—नाट्यार्थ की अपेक्षा होने पर अन्य विधियों की भी स्वतन्त्रता
पूर्वक परिकल्पना करने की छूट नाट्याचार्यों को दे दीं है तथा नाट्यप्रयोग
के सभी उपादेय तत्त्वों को इस क्रम में व्यापकता के साम्य संगृहीत किया है
जो अपने आप में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है, यह निस्सन्दग्ध है ।
परिशेष—( विचार एवं विवरण )
अङ्गभङ्ग—नाट्यशास्त्र में आङ्गिक अभिनय के अन्तर्गत शरीर के द्वारा
होनेवाली क्रियाओं एवं करणों, स्थानकों आदि शरीर रचनाओं ( Postures )
तथा नृत्य में होने वाले विविध अङ्ग परिचालनों का विवरण दिया है किन्तु ये
रचेगये है अङ्गभङ्ग या शरीर के मरोड़ने की क्रियाओं के आधार पर ही ।
अतः अङ्गभङ्ग की सुन्दरता पर नृत्यादि अभिनय की सुन्दरता से प्रस्तुति
निर्भर करती है तथा इसी कारण नृत्यादि में 'अङ्गभङ्ग' का भी अपना स्वतन्त्र
महत्व है ही ।
नाट्यशास्त्र में ऐसे 'अङ्गभङ्ग' का पृथक् से उल्लेख तथा विवरण नहीं
दिया गया है परन्तु शरीर की सुन्दरता भङ्गिमाओं के प्रसङ्ग में इसका विवरण
अभिनय में आवश्यक एवं अपेक्षित अवश्य है क्योंकि अङ्गसौष्ठव का निखार
ही अङ्गभङ्ग से आता है । अन्य शास्त्रीयग्रन्थों में इस विषय का विवरण
मिलता है तदनुसार अङ्गभङ्ग के चार प्रभेद होते हैं । ये हैं:—( १ ) अभङ्ग,
( २ ) समभङ्ग, ( ३ ) त्रिभङ्ग तथा ( ४ ) अतिभङ्ग ।
अभङ्ग—शरीर की सम एवं स्वाभाविक दशा में यह 'भङ्ग' सौष्ठवपूर्ण
भाव लिये हुए होता है। इसमें शरीर बिना किसी मरोड़ या मोड़ के पूर्ण
सीधे भाव में खड़ा रखा जाता है । इस स्थिति को प्राचीन शिल्प में श्रीविष्णु
( ३३ )
की सीधी खड़ी प्रतिमा में देखा जा सकता है। इसे अभङ्ग या अन्य विद्वान
'सहजभङ्ग' भी कहते हैं।
समभङ्ग—सहज भाव की स्थिति एवं सौन्दर्य पूर्ण भङ्गिमा में शरीर
को एक ओर किञ्चित् झुकाना 'समभङ्ग' होता है। इसमें सम्पूर्ण शरीर को
अन्यूनानतिरिक्त समान मुद्रा में एक ओर थोड़ा तिरछा रखते हुए खड़ा रखा
जाता है। इसे 'समभङ्ग' भी इसी कारण कहते हैं कि इसमें तिरछापन एक
समान स्थिति में रहता है। नाट्य में समभङ्ग का प्रचुर प्रयोग रहता है
और शिल्प में इस स्थिति में अवस्थित अनेक प्रतिमाएँ देखी जा सकती है।
त्रिभङ्ग—मुख, शरीर तथा पाद इन तीनों को मरोड़ने या तिरछा करते
हुए खड़े रहना 'त्रिभङ्ग' कहलाता है। शरीर की ऐसी दशा अति सामान्य
होने के कारण प्राचीन शिल्पादि आकृतियों में यह प्रचुर मात्रा में मिलती है
विशेषकर श्रीकृष्ण की बाँसुरीवादन करती हुई प्रतिमा 'त्रिभङ्ग' का उत्तम
निदर्शन है।
अतिभङ्ग—शरीर को अतिशय (या अधिक मात्रा में) मरोड़ते हुए
ओजपूर्ण एवं उग्रभाव में खड़ा रहना 'अतिभङ्ग' कहलाता है। इसकी योजना
'ताण्डव' जैसे नृत्य में रहती ही है तथा इसका निदर्शन 'नटराज' की प्रतिमा
है; जिसमें हस्त, पाद, कटि तथा ग्रीवा अतिशय भङ्गिमा के साथ भङ्गत्व के
ओज भरे पाद प्रचार को लिये हुए दिखलाई पड़ती है।
अभिनय में 'सौष्ठव' का स्थान—यदि आङ्गिक क्रियाकलापों के
शास्त्रानुकूल प्रस्तुतीकरण को एक 'कला' कहा जाए तो इसका आधार-
स्तम्भ मानना पड़ेगा 'सौष्ठव' को, जिस पर नृत्य का समग्र प्रासाद खड़ा
किया जाता है। इसी कारण अङ्गभङ्ग का आधार भी अङ्गसौष्ठव ही है जो
लावण्य एवं सौन्दर्य का आधायक है भी। अङ्गों की सप्राणता के बिना
नृत्य में अपेक्षित स्वरूप दिया जाना सम्भव नहीं रहता तथा बिना शरीर
सन्तुलन के आङ्गिक क्रियाएँ बेडोल हो जाती हैं। अतएव जैसे गायन के
लिये उत्तम कण्ठ की अनिवार्यता होती है इसी तरह नृत्य के लिये सप्रमाण
शरीर की भी। अङ्गसौष्ठव नाट्यशास्त्र में वर्णित सौष्ठव ही है, जो नृत्य में
अपेक्षित बाह्य स्वरूप को सुन्दर बनाता है परन्तु इसके साथ प्रस्तोता का
आन्तरिक भावसौन्दर्य भी यहाँ कार्य करता है; जिसके बिना बाह्य प्रदर्शन
भी मनोरम पद्धति में व्यक्त नहीं किया जा सकता। हृदय में सौन्दर्य का
सुप्त भाव यदि पहिले से विद्यमान रहेगा तो अभ्यास से कलाकार की सुप्त
३ ना० भू० द्वि०
( ३४ )
कला अवश्य जाग्रत हो जाएगी। इसी जाग्रति के लिये कलाकार को प्रशिक्षण
देने का प्रावधान है भी।
रङ्गमञ्च की कक्ष्या-परिधि—नाट्यशास्त्र के चतुर्दशअध्याय में नाट्य-
मण्डप पर प्रस्तुत दृश्यविधान का विवरण है। इस विवरण का एक अंश
रङ्गमञ्च के स्वरूप एवं साजसज्जा को दिखलाते हुए नाट्यशास्त्र के द्वितीय
अध्याय में दिया जा चुका था, किन्तु नाटकीय इतिवृत्त के अनुरोध पर शेष
तत्त्वों का इसी अध्याय में विवेचन हुआ है।
इतिवृत्त के अनुरोध पर रङ्गमञ्च पर अनेक दृश्यों की योजना करनी
पड़ती है। भरत मुनि ने ऐसे दृश्यों को प्रस्तुत करने के लिये अनेक उपयोगी
विधियाँ बतलाईं जिससे दृश्यविधान अधिकाधिक यथार्थ या लोकानुरूपता-
शाली बन सके।
दृश्यविधान की विधियों का आहार्याभिनय के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में
विचार हुआ है जिसका कुछ और विचार उसी प्रसङ्ग में नाट्यशास्त्र की प्रस्तुत
इसी व्याख्या के तृतीय भाग में किया जा रहा है। इसी के लिये कक्ष्याविभाग
की महत्त्वपूर्ण प्रथा ( रूढि ) की ( जिसमें प्रतीकात्मक नाट्यप्रयोगविधान
है ) उद्भावना की गयी थी; यह थी दृश्यविधान में रंगमञ्च पर स्थापित
कक्ष्याविभाग पद्धति। कक्ष्याविभाग का यह प्रयोग परम्परा तथा कल्पना
पर आधृत रख कर किया गया है। कक्ष्याविभाग का सामान्यतः आशय
यही है कि कथानक के अनुरूप रंगमञ्च पर स्थान या देश की कल्पना करना
जो नाट्यधर्मी रूढ़ियों आदि पर आश्रित रखते हुए दिखलाई जाए। भरत के
द्वारा किये गये ऐसे कक्ष्याविभाग निरूपण का उद्देश्य यही है कि नाट्यप्रयोग
अधिकाधिक प्रकृत एवं अनुरूपता पर आधारित हो सके, क्योंकि अनुरूपता
ही यथार्थ के समीप नाट्यविधान को लाने में सक्षम होती है।
इन कक्ष्याओं का विभाजन रंगमञ्च पर इस प्रकार कर लिया जाता
था कि एक विभाग से दूसरे विभाग पर आ जाने पर समझा जाता था कि
पात्र एक स्थान या देश से दूसरे में प्रवेश कर रहा है। मुनि ने कक्ष्या-
विभाग के अन्तर्गत आभ्यन्तर, बाह्य तथा मध्यम भाग की रङ्गमञ्च पर
ही परिकल्पना की तथा रंगमञ्च की परिधि में चलने से ही इनके विभाग
सूचित हो जाते थे। ये कक्ष्यायँ या इनके स्थान कितनी दूर पर निर्दिष्ट
हो—इसका विनिश्चय पात्रों के परिक्रमण की संख्या या स्थिति से होता
था। यदि दूर का स्थान निर्दिष्ट करना हो तो पात्र देर तक परिक्रमण
( ३५ )
करता था तथा समीप की स्थिति में थोड़ा परिक्रमण होता था। इनमें
रङ्गमञ्च का मुख भाग रङ्गपीठ होता है तथा यही आभ्यन्तर भाग कहलाता
है जहाँ पात्र नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करते हैं। इनमें नेपथ्यगृह से लगी हुई कक्ष्या
आभ्यन्तर-कक्ष्या, रंगपीठ से लगी कक्ष्या बाह्य-कक्षा तथा इन दोनों की
मध्यवर्ती कक्ष्या मध्यम होती थी। ये कक्ष्यायें रङ्गमंच के दोनों ओर होती
थीं, ये ही बाहर से आड़ या पक्ष (पखवाई) का भी कार्य सम्पन्न करती
थी तथा इन्हीं से पार्श्व की ओर आगम एवं निर्गम होता था और इन्हीं
कक्ष्याओं में विभिन्न दृश्यों की अवतारणा कर ली जाती थी। इस कक्ष्या-
विभाग की परिधि में (जो पात्र के विशेष भाग में स्थित होने से जानी
जाए तथा जहाँ दृश्य निरूपण कथावस्तु के कारण इष्ट हो तो वहीं पर)
ऐसे सभी प्रदेश, नगर, वन, पर्वत आदि आ जाते हैं जो प्रस्तुत दृश्य में
प्रदर्शित होने चाहिए थे। इस प्रकार ये सभी प्रदेश-फिर चाहे वे अन्दर,
बाहर, मध्य, दूर या समीपवर्ती प्रदेश हों—कथावस्तु के कारण परस्पर
सम्बद्ध हो जाते थे। इन कक्ष्या विभागों की विधि या रूढ़ि के अनुसार
जो पात्र रंगमंच पर प्रथम प्रवेश करें वे आभ्यन्तरपात्र मञ्च के अन्तः
स्थान (गृह, प्रासाद) में स्थित रहते हैं तथा आभ्यन्तर प्रकृति कहलाते
हैं। इसके बाद जो पात्र रंगमञ्च पर प्रवेश करते हैं वे बाह्य होते हैं तथा जिस
मार्ग से वे प्रवेश करेंगे वह भाग मध्यम कहलाता है, क्योंकि इसी से वे
अन्दर प्रवेश करते हैं। रंगमंच के आभ्यन्तर भाग से जो पात्र इन पूर्व
प्रविष्ट पात्रों को देखने या मिलने के लिए आए वह अपनी बात दाहिनी
ओर (दक्षिण दिशा की ओर) होकर कहते हैं।
यहाँ रङ्गमञ्च पर दिशा का भो संकेत रखा गया है, इसका आधार है
नेपथ्यगृह तथा वाद्ययन्त्रों के लिये निर्मित द्वार का मुख; क्योंकि यह मुख
जिस ओर रहेगा उसे नाट्यप्रदर्शन के विधानानुसार पूर्व दिशा मानी
जाती है। इसी पूर्वद्वार से पात्रों का प्रवेश या आवागमन भी किया
जाता है, अतः जो पात्र इन निर्दिष्ट द्वारों में से जिस द्वार से निकलता है
उसे उसी द्वार से प्रवेश करना होता है। बाह्य पात्र का प्रवेश तथा निर्गम
एक ही द्वार से होता है। आभ्यन्तरपात्र भी कार्यवश यदि बाह्यपात्र के
साथ निकलता है तो जिस द्वार से बाह्यपात्र आया था उसी द्वार से
निकलेगा। कोई पात्र एकाकी या किसी अन्य पात्र के साथ प्रवेश करता है
तो उसे निर्दिष्ट द्वार से ही प्रवेश करना होता है। किसी कार्यवश बाहर
( ३६ )
निकल जाने पर यदि वही पात्र पुनः लौटे तो वह उसी मार्ग तथा द्वार से
प्रवेश करता है जिससे वह बाहर गया था । पात्रों के प्रवेश के समय अन्य
कक्ष्या की सूचना के लिये रंगमञ्च पर एक या अनेक बार आवश्यकतानुसार
परिक्रमा करने से दूसरी कक्ष्या सूचित हो जाती है । यदि समानस्थिति के
पात्र हों तो साथ-साथ तथा अधम पात्र से युक्त रहने पर उनसे घिरे हुए
चलने वाले नृपपात्र के प्रवेश की स्थिति में प्रतीहारी का उसके आगे चलना
बतलाया जाए । इसके अतिरिक्त प्रेक्षागृह के बाहर खुले स्थान या रंगमञ्च
पर नाट्य-प्रयोग की दशा में वाद्ययन्त्रों की ओर पीठ कर प्रयोक्ता या पात्र
जिस दिशा में मुख रख कर खड़े होते हों उसे भी रूढ़ि के अनुसार पूर्वदिशा
मानकर कार्य सम्पन्न किया जाता है ।
इसी प्रकार इसी कक्ष्याविभाग में दूरी या निकटता के देश का संकेत
विधान भी रखा गया है । पात्र की दूर या निकट प्रदेश की यात्रा का भान
उसके अधिक चलने या घूमने की गति से दूर का प्रदेश तथा कम चलने से
मध्यम व्यवधान वाले अथवा निकट प्रदेश को दिखलाया जाता है । यह क्रम
यद्यपि नाट्यविधान के अन्तर्गत रहता है किन्तु यह नियम लोकपरम्परा से
प्रभावित नियम है । लोकव्यवहार में अधिक दूरी की यात्रा करने में अधिक
चरणसंचार तथा कम दूरी में कम चरणसंचार रहता है यहीं इस नियम का
आधार था यह स्पष्ट प्रतीत होता है ।
दिव्यपात्रों का कक्षावस्तु की अपेक्षा के अनुसार नगर, वन, पर्वत,
सागर, वर्ष, द्वीप आदि सभी प्रदेशों पर आकाश, विमान या अपने से
उद्भावित माया के द्वारा पहुँचना बतलाया जाता है; क्योंकि दिव्य पात्रों की
शक्ति असीम होती है । पात्रों का संचार प्रयोजनवश यदि प्रच्छन्नस्वरूप में
रखा जाए तो उसको पृथ्वी पर ही बतलाया जाए क्योंकि यहाँ वे मनुष्य रूप
में दिखलाई दे सकते हैं । दिव्य तथा दिव्यादिव्य पात्र जम्बूद्वीप आदि सभी
वर्षों में अपनी इच्छानुसार आ जा सकते हैं परन्तु पात्र केवल भारतवर्ष में
घूमने वाले ही रखना चाहिये । यदि किसी पात्र का कार्यवश दूर देश में
प्रस्थान बतलाना ही हो तो अङ्क को वहीं समाप्त करते हुए दूसरे अङ्क के
आरम्भ में प्रवेशक के द्वारा यह दिखलाना चाहिए । इस प्रकार पात्रों की
अपनी स्थिति, सामर्थ्य तथा पहुँच के साथ-साथ प्रयोग के अनुसार कक्ष्या-
विभाग में प्रदेश दिखलाये जाते हैं ।
इसी प्रसंग में भरतमुनि ने दिव्यजातियों के निवास भूत विशिष्ट पर्वत
( ३७ )
तथा प्रदेशों का भी उल्लेख किया है ( जिनका विवरण नाट्यशास्त्र में
यथास्थान प्राप्य है) । नियमवश इन पात्रों का निवास इन्हीं प्रदेशों पर
दिखलाना चाहिए। तदनुसार यक्ष, गृह्यक तथा कुबेर के अनुचरों के लिए
शुभ्रकूट या कैलास, गन्धर्व एवं अप्सराओं के लिये हेमकूट, वासुकी, तक्षक
तथा अन्य नागों के लिये निषध, तैंतीस कोटि देवताओं के लिये महामेरु,
ब्रह्मर्षि एवं सिद्धों के लिये वैदूर्यमणिरञ्जित नीलाचल तथा दैत्य, दानव एवं
पितरों के लिये श्वेतपर्वत पर आवास दिखलाना चाहिए। इस पर आचार्य
अभिनवगुप्तपाद का मत है कि कथावस्तु से सम्बद्ध स्थानों के रहने पर ही
प्रसंगानुसार कक्ष्याविभाग की परिकल्पना से इनका प्रदर्शन करना चाहिए।
तथा यह प्रदर्शन कक्ष्याविधान के द्वारा रंगमञ्च पर अवस्थित एक भाग पर
(काल्पनिकता के साथ) प्रस्तुत करना चाहिए। इन पात्रों के कार्य, भाव
एवं चेष्टाएँ मानवीय रहनी चाहिए तथा यहाँ देवताओं की दृष्टि अनिमेष
नहीं होती। क्योंकि नाट्यप्रदर्शन में सभी भाव दृष्टि पर टिके रहते हैं।
भाव सभी दृष्टि द्वारा ही सर्वप्रथम अभिव्यक्त होकर बाद में अङ्गावयवों से
अभिनीत होते हैं। यह कक्ष्याविभागगत सभी विधान नाट्यधर्मी प्रथा की
रूढ़ि से सम्पन्न होता है तथा इन्हीं नाट्यरूढ़ियों के आधिक्य के कारण
प्राचीन संस्कृत रूपक में आधुनिक नाटकों की तरह दृश्यों का स्पष्ट विभाजन
जैसा प्रावधान नहीं दिखलाई देता है। यहाँ तो पात्र अपनी उदात्त
काव्यशैली में नाटकीय घटना की स्थिति की कल्पना दर्शकों में जागृत कर
देता है, क्योंकि जब प्रेक्षक रसज्ञ हो तो उन्हें नाटकीय सौन्दर्यबोध के लिये
अतिरिक्त या अधिक अपेक्षित ही नहीं था। यह सही है कि नाट्य का
उपयोगी अङ्ग कक्ष्याविधान है जिसका नाट्यप्रदर्शन के लिये उपयोग
अनिवार्य है। इसी कारण नाटकादि में इसका विधान रखा गया है। यह
नाट्यप्रयोग का विषय होने के साथ-साथ आवश्यक भी है केवल कल्पनामात्र
नहीं है। यह विधान भी सिद्धान्त तथा स्वरूप की सीमाओं में आबद्ध है
तथा इससे अति व्यापक अपेक्षाएँ नहीं रखी जा सकती।
प्रवृत्ति—नाट्यप्रयोग को रसानुग्राहक स्वरूप प्रदान करने के लिए
‘प्रवृत्ति’ का विधान है। प्रवृत्ति शब्द अपनी व्युत्पत्ति के (प्र + √वृत् +
क्तिन्) साथ-साथ अनेक अर्थ प्रकट करता है। यह बुद्धि तथा कर्मेन्द्रिय की
चेष्टाएँ, शरीर के लीला विलास आदि व्यापार, उनके हाव हेला आदि
विकार तथा आलाप एवं विलाप आदि वाग् व्यापार, मनुष्य की पाप-पुण्य
वृत्ति आदि ये सभी प्रवृत्ति के अर्थ है। प्रवृत्ति का यहाँ नाट्यप्रयोग के सन्दर्भ