नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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अध्याय ३२ में दिया गया है। उस समय का यह वाद्यवादन दर्शकों को
दिखलायी पड़ता था तथा आज के समय की तरह पाश्र्वसंगीत या पर्दे के
पीछे से यह कार्य नहीं किया जाता था।
जब यह कहा गया कि नाट्य एक कला है जो स्वयं यथार्थ नहीं है परन्तु
यथार्थ का अनुकरण है। अतः इस नाट्य में संगीत के अभिव्यञ्जक एवं
भावस्पर्शी कार्य को लगाना उसी के उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए रसों की
समृद्धि करना है। मुनि को यहाँ ऐसे प्रयोक्ता पात्र की अपेक्षा रही जो दर्शकों
के समक्ष आवें तथा वे जब तक अपना सम्भाषण या संवाद कथन आरम्भ न
करें या उसे समाप्त न करें। इसी कारण ऐसे समय मृदंग या बासुरी का
शीघ्र ही वादन आरम्भ किया जाता था और उसी के साथ पर्दे के हटते ही
पात्र रङ्गमञ्च पर प्रवेश करेगा तथा यह क्रम तब तक चलता रहता था जब
तक कि वह संवाद या सम्भाषण की स्थिति में न पहुँच पाए। इसी प्रकार
का क्रम उसके रङ्गमञ्च से निष्क्रमण के समय भी रहता था। अतः यही वह
समय था जब ध्रुवा गान हो। कण्ठ तथा वाद्य संगीत का यह चलने वाला
प्रयोगक्रम ( नृत्यगत ) अभिनेता एवं अभिनेत्रियों के पादविक्षेप तथा अभिनय
के साथ-साथ चलता था जो आज हमें किसी बैलेट या आपेरा नाट्य या
नृत्य की सूचना सा देता दिखाई देता हैं तथा नाटकीय संवाद के साथ चलने
वाले संगीत के कारण यह पुनः आपेरा के समीप आ जाता है। ये
विवरण या नाट्यप्रयोग के नियम भारत में प्राचीन काल में प्रस्तुत नाट्य-
विधान में प्राप्त हैं, जो आज भी विश्व कलासन्धान के महत्त्वपूर्ण स्रोत एवं
आधार बनने में समर्थ होकर अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
स्थानक या स्थान—नाट्यशास्त्र में गति विधान के प्रसंग में स्त्रियों
एवं पुरुषों के स्थानक तथा भूमिका विपर्यय का विचारपूर्वक निरूपण किया
गया है। इनमें पात्रों के सम्भाषण एवं गति के समय तीन प्रकार के स्थानक
होते हैं—(१) आयतस्थान, (२) अवहित्थ स्थान तथा (३) अश्वक्रान्तक
स्थान।
आयतस्थान—इसमें नारी का दाहिना पैर सम, बायाँ तिरछा होकर
एक ताल के अन्तर से उठा हुआ तथा बायीं ओर से कमर ऊपर उठी हुई
रहती है। नाट्यप्रयोग की दृष्टि से यह स्थान बड़ा महत्त्वपूर्ण माना जाता
है। इसके द्वारा आवाहन, विसर्जन, चिन्ता, पुष्पमोक्षण जैसी क्रियाओं तथा
कोप, गर्व, मान आदि स्त्रीजनोचित भावों का अभिनय किया जाता है।