नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६ )
संहत—दोनों पैरों को मिला कर रखते हुए उनके अंगूठे तथा टखने
को एक दूसरे से लगा कर खड़े हो जाना ।
समपाद—दोनों पैरों को एक बालिश्त के अन्तर पर समान रूप
में एडी के बल पर खड़े रहना । यह स्थिति वैष्णव-स्थान में आगे
बतलायी गयी है।
एकपाद—समपाद में एक पैर को ऊपर उठाना ।
पृष्ठोत्तान-तल—एक सीधे पैर के पीछे दूसरा पैर एड़ी को ऊँचा कर
पंजे ( के फण ) को ऊँचा करते हुए मोड़ कर रखना और एक पैर से उसे
पीछे ढकेलना ।
चतुरस्र—नद्यावर्त की स्थिति में पैरों का अन्तर ढ़ाई अंगुल के अन्तर
से रखना ।
पार्ष्णिबद्ध—एक पैर की एड़ी को दूसरे पैर के अंगूठे का स्पर्श
हो इस प्रकार खड़े रहना ।
पार्ष्णि-पार्श्वगत—बायाँ पैर सीधा रख दाहिने पैर की एड़ी बाँयीं
पैर की ओर रहे इस प्रकार आड़ी रख कर खड़े रहना ।
एकपार्श्वगत—उपर्युक्त स्थान में दाहिने पैर को उलटी रीति से
अर्थात् दाहिने पैर की एड़ी दाहिनी ओर रखकर खड़े होना ।
एकजानुगत—एक पैर को सीधा रख कर दूसरे पैर को एक बाजू
में चार अंगुल दूर टखने से सहज मोड़ के साथ रखना ।
परावृत्त—बाये पैर की एड़ी के सामने दाहिने पैर का अंगूठा तथा
दाहिने पैर की एड़ी के पास बायें पैर की कनिष्ठिका अंगुली को एक दूसरे
के साथ स्वस्तिक रखना ।
समसूचि—एड़ी तथा जंघा को जमीन से स्पर्श कर दोनों पैरों को
तिरछे तथा लम्बे ( क्रमशः ) करना ।
विषमसूची—समसूचि में एक पैर को पीछे लंबा करना अर्थात् एक
पैर आगे और दूसरा पीछे की ओर लम्बा कर स्थित होना।
खण्डसूची—नियमसूची की स्थिति में एक ( अर्थात् अगले ) पैर को
सिकुड़ा लेना ( तथा पिछले पैर को लम्बा रख कर बैठना । )
ब्राह्म—एक पैर से सीधे खड़े होकर पिछला पैर पीठ की ओर घुटनों
को मिला कर रखना ।
वैष्णव—इसे नाट्यशास्त्र में दिखलाया ही है ।
शैव—बायाँ पैर जमीन पर सीधा रख कर वाहिना पैर घुटने से ऊपर