नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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है। इनमें भौमिक तथा आकाशिक मण्डल के दस दस प्रभेद किये गये हैं
जो सब मिल कर मण्डलों के बीस प्रभेद बनाते हैं। इनका नामादि विवरण
इस प्रकार है—
भौमिकमण्डल— ( १ ) भ्रमर, ( २ ) आस्कन्दित, ( ३ ) आवर्त,
( ४ ) समोत्सारित, ( ५ ) एलकाक्रीडित, ( ६ ) अड्डित, ( ७ ) शकटास्य,
( ८ ) अध्यर्धक, ( ६ ) पिष्टकुट्ट तथा ( १० ) चाषगत ।
आकाशिक मण्डल— ( १ ) अतिक्रान्त, ( २ ) विचित्र, ( ३ ) ललित-
सञ्चर, ( ४ ) सूचीविद्ध, ( ५ ) दण्डपाद, ( ६ ) विहृत, ( ७ ) अलातक,
( ८ ) वामविद्ध, ( ६ ) ललित तथा ( १० ) क्रान्त ।
नाट्यशास्त्र में इनके स्वरूपादि का विवरण है। इन मण्डलों का युद्ध,
सञ्चरण तथा बाहुयुद्ध आदि में लीलापूर्ण अङ्ग सञ्चालन के साथ वाद्यों के
वादन के अनुगत प्रदर्शन रंगमञ्च पर प्रस्तुत किया जाता है ।
गतिप्रचार—नाट्यशास्त्र का तेरहवाँ अध्याय 'गतिप्रचार' अध्याय
है। आङ्गिक अभिनय के क्रम में पात्रों द्वारा प्रयोज्य विभिन्न अवस्था, भाव,
स्थान, आसन आदि के समय उनकी जो चाल या गति होती है वह भी
विभिन्नता लिये हुए रहती है तथा इसी विभिन्नता सम्पन्न गति से इन
पात्रों के स्थान, भाव, प्रचार आदि का विधान निश्चय किया जाता
है। यही विधान 'गति प्रचार' कहलाता है जिसमें पात्रों की अवस्था, काल,
स्थान आदि विविध सन्दर्भों में स्वरूपानुसार उनकी चाल या गति को
दिखलाया जाता है। इसका कारण यह है कि नाट्य प्रयोग में विविध पात्रों
की चाल उनकी प्रकृति तथा कार्य के अनुरूप बदलती हुई रखना आवश्यक
होता है तथा पात्र की अपनी चाल में भी कभी-कभी समय, अवस्था या
कारणवश ( संयोगवश भी ) भिन्नता आ जाती है। जिसका प्रभाव शरीर के
अङ्ग तथा उपाङ्गों पर ( विभिन्न रूप में ) पड़ता है तथा इनसे उनके पाद-
प्रचार या गति प्रभावित ( या परिचालित ) रहती है। अतएव गतिविधान
नाट्यप्रयोग की सिद्धि में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके अन्तर्गत पात्र
जब रङ्गमञ्च पर प्रवेश करे तभी से लेकर उसके निष्क्रमण तक की
प्रत्येक गति का विधान विभिन्न भूमिकाओं के प्रस्तुतीकरण की स्थिति में
अपना अतिशय ( महत्व एवं ) मूल्य रखती है ।
पात्रप्रवेश—नाट्यप्रयोग के आरम्भ में रङ्गमञ्च पर पात्र का प्रवेश
होता है। यह प्रवेश इस प्रकार होना चाहिए कि उससे प्रतिपाद्य