नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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को गति एवं सौन्दर्य प्रदान करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया यह
निर्विवाद है।
विमान आदि गति—नाट्यप्रदर्शन में कथावस्तु के अनुरोध से अनेक
दृश्यों का दिखलाना आवश्यक रहता है, किन्तु सामान्यतः ऐसे नाट्यप्रयोग
में विमान आदि प्रत्यक्ष दर्शाना संभव नहीं। ऐसी परिस्थिति में भरतमुनि ने
विमानगमन, रथारोहण, पर्वतारोहण, जलसन्तरण, आकाशगमन, अन्धकार-
यात्रा जैसे दृश्यों, पदार्थों एवं क्रियाओं को नाट्य में प्रस्तुत करने के लिये
कुछ प्रतीकात्मक अभिनयों तथा युक्तियों की परिकल्पना की है। इस प्रसंग में
की जाने वाली पात्रों की गतियों का निरूपण अतिशय स्पष्ट विवरण के साथ
किया गया है। निर्जीव पदार्थों एवं सजीव प्राणिपात्रों की रङ्गमञ्च पर
अवतारणा की यह पद्धति नाट्यप्रयोग के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण स्थिति
रखती है। देश, काल आदि भेद से प्रतीकात्मक अभिनय के तथा तदनुरूप
काव्यपाठ के द्वारा ऐसे दृश्यों को रूपायित करने का विधान रखा गया है
जो लोकानुसारी होता है। इस सन्दर्भ में आचार्य अभिनवगुप्तपाद
ने अनुकृतियों के प्रयोग करने की भी सहमति दी है। उनका मत है कि
अनुकृत प्रतिकृतियों तथा शोभाधायक पटचित्रों के द्वारा भी ऐसे दृश्यों को
उपस्थापित करना चाहिए। पतञ्जलिमुनि ने अपने व्याकरण महाभाष्य में
शोभाधायक चित्रपटों के धारण करने वाले शोभिकों का उल्लेख किया था
जो अभिनवगुप्त के विचारों का उत्स प्रतीत होता है। इस प्रकार नाट्यधर्मी
प्रतीकों तथा अभिनयों के द्वारा न केवल आन्तर चित्तवृत्तियों की किन्तु बाह्य
जगत् के स्वरूप एवं सौन्दर्य की अभिव्यक्ति सम्भव है यह भरतमुनि ने अपने
विवरणों से दिखलाया जो नाट्यार्थ ग्रहण करवाने में अतिशय मूल्यवान् है।
गति के अनुगत सङ्गीततत्त्व—विभिन्नपात्रों के रङ्गमञ्च पर होने वाले
गति प्रचार का (जो उनके प्रवेश से लेकर निष्क्रमण तक है) विवरण
इतनी उत्तमता के साथ अन्यत्र कहीं प्राप्त नहीं है। इनमें अभिनेता या पात्र
केवल एक निश्चित प्रमाणयुक्त गति से पादनिक्षेप करते हुए मञ्च पर आते ही
नहीं हैं किन्तु यहाँ उनकी गति को उपयुक्त संगीत का अनुगमन या संगत
भी करनी पड़ती है, विशेष कर वाद्य तथा कण्ठ संगीत की। वाद्यों में इनकी
संगत बासुरी तथा वीणा से होती थी तथा विभिन्न मृदङ्गवादन के विषय में
एक नियम था। ऐसे समय गायी जाने वाली ध्रुवाओं के लिये भी विधान
(या नियम) था जिनका प्रयोगादि के साथ स्वरूप विवरण नाट्यशास्त्र के