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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 668 में से

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तथा प्रदेशों का भी उल्लेख किया है ( जिनका विवरण नाट्यशास्त्र में
यथास्थान प्राप्य है) । नियमवश इन पात्रों का निवास इन्हीं प्रदेशों पर
दिखलाना चाहिए। तदनुसार यक्ष, गृह्यक तथा कुबेर के अनुचरों के लिए
शुभ्रकूट या कैलास, गन्धर्व एवं अप्सराओं के लिये हेमकूट, वासुकी, तक्षक
तथा अन्य नागों के लिये निषध, तैंतीस कोटि देवताओं के लिये महामेरु,
ब्रह्मर्षि एवं सिद्धों के लिये वैदूर्यमणिरञ्जित नीलाचल तथा दैत्य, दानव एवं
पितरों के लिये श्वेतपर्वत पर आवास दिखलाना चाहिए। इस पर आचार्य
अभिनवगुप्तपाद का मत है कि कथावस्तु से सम्बद्ध स्थानों के रहने पर ही
प्रसंगानुसार कक्ष्याविभाग की परिकल्पना से इनका प्रदर्शन करना चाहिए।
तथा यह प्रदर्शन कक्ष्याविधान के द्वारा रंगमञ्च पर अवस्थित एक भाग पर
(काल्पनिकता के साथ) प्रस्तुत करना चाहिए। इन पात्रों के कार्य, भाव
एवं चेष्टाएँ मानवीय रहनी चाहिए तथा यहाँ देवताओं की दृष्टि अनिमेष
नहीं होती। क्योंकि नाट्यप्रदर्शन में सभी भाव दृष्टि पर टिके रहते हैं।
भाव सभी दृष्टि द्वारा ही सर्वप्रथम अभिव्यक्त होकर बाद में अङ्गावयवों से
अभिनीत होते हैं। यह कक्ष्याविभागगत सभी विधान नाट्यधर्मी प्रथा की
रूढ़ि से सम्पन्न होता है तथा इन्हीं नाट्यरूढ़ियों के आधिक्य के कारण
प्राचीन संस्कृत रूपक में आधुनिक नाटकों की तरह दृश्यों का स्पष्ट विभाजन
जैसा प्रावधान नहीं दिखलाई देता है। यहाँ तो पात्र अपनी उदात्त
काव्यशैली में नाटकीय घटना की स्थिति की कल्पना दर्शकों में जागृत कर
देता है, क्योंकि जब प्रेक्षक रसज्ञ हो तो उन्हें नाटकीय सौन्दर्यबोध के लिये
अतिरिक्त या अधिक अपेक्षित ही नहीं था। यह सही है कि नाट्य का
उपयोगी अङ्ग कक्ष्याविधान है जिसका नाट्यप्रदर्शन के लिये उपयोग
अनिवार्य है। इसी कारण नाटकादि में इसका विधान रखा गया है। यह
नाट्यप्रयोग का विषय होने के साथ-साथ आवश्यक भी है केवल कल्पनामात्र
नहीं है। यह विधान भी सिद्धान्त तथा स्वरूप की सीमाओं में आबद्ध है
तथा इससे अति व्यापक अपेक्षाएँ नहीं रखी जा सकती।
प्रवृत्ति—नाट्यप्रयोग को रसानुग्राहक स्वरूप प्रदान करने के लिए
‘प्रवृत्ति’ का विधान है। प्रवृत्ति शब्द अपनी व्युत्पत्ति के (प्र + √वृत् +
क्तिन्) साथ-साथ अनेक अर्थ प्रकट करता है। यह बुद्धि तथा कर्मेन्द्रिय की
चेष्टाएँ, शरीर के लीला विलास आदि व्यापार, उनके हाव हेला आदि
विकार तथा आलाप एवं विलाप आदि वाग् व्यापार, मनुष्य की पाप-पुण्य
वृत्ति आदि ये सभी प्रवृत्ति के अर्थ है। प्रवृत्ति का यहाँ नाट्यप्रयोग के सन्दर्भ