नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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की सीधी खड़ी प्रतिमा में देखा जा सकता है। इसे अभङ्ग या अन्य विद्वान
'सहजभङ्ग' भी कहते हैं।
समभङ्ग—सहज भाव की स्थिति एवं सौन्दर्य पूर्ण भङ्गिमा में शरीर
को एक ओर किञ्चित् झुकाना 'समभङ्ग' होता है। इसमें सम्पूर्ण शरीर को
अन्यूनानतिरिक्त समान मुद्रा में एक ओर थोड़ा तिरछा रखते हुए खड़ा रखा
जाता है। इसे 'समभङ्ग' भी इसी कारण कहते हैं कि इसमें तिरछापन एक
समान स्थिति में रहता है। नाट्य में समभङ्ग का प्रचुर प्रयोग रहता है
और शिल्प में इस स्थिति में अवस्थित अनेक प्रतिमाएँ देखी जा सकती है।
त्रिभङ्ग—मुख, शरीर तथा पाद इन तीनों को मरोड़ने या तिरछा करते
हुए खड़े रहना 'त्रिभङ्ग' कहलाता है। शरीर की ऐसी दशा अति सामान्य
होने के कारण प्राचीन शिल्पादि आकृतियों में यह प्रचुर मात्रा में मिलती है
विशेषकर श्रीकृष्ण की बाँसुरीवादन करती हुई प्रतिमा 'त्रिभङ्ग' का उत्तम
निदर्शन है।
अतिभङ्ग—शरीर को अतिशय (या अधिक मात्रा में) मरोड़ते हुए
ओजपूर्ण एवं उग्रभाव में खड़ा रहना 'अतिभङ्ग' कहलाता है। इसकी योजना
'ताण्डव' जैसे नृत्य में रहती ही है तथा इसका निदर्शन 'नटराज' की प्रतिमा
है; जिसमें हस्त, पाद, कटि तथा ग्रीवा अतिशय भङ्गिमा के साथ भङ्गत्व के
ओज भरे पाद प्रचार को लिये हुए दिखलाई पड़ती है।
अभिनय में 'सौष्ठव' का स्थान—यदि आङ्गिक क्रियाकलापों के
शास्त्रानुकूल प्रस्तुतीकरण को एक 'कला' कहा जाए तो इसका आधार-
स्तम्भ मानना पड़ेगा 'सौष्ठव' को, जिस पर नृत्य का समग्र प्रासाद खड़ा
किया जाता है। इसी कारण अङ्गभङ्ग का आधार भी अङ्गसौष्ठव ही है जो
लावण्य एवं सौन्दर्य का आधायक है भी। अङ्गों की सप्राणता के बिना
नृत्य में अपेक्षित स्वरूप दिया जाना सम्भव नहीं रहता तथा बिना शरीर
सन्तुलन के आङ्गिक क्रियाएँ बेडोल हो जाती हैं। अतएव जैसे गायन के
लिये उत्तम कण्ठ की अनिवार्यता होती है इसी तरह नृत्य के लिये सप्रमाण
शरीर की भी। अङ्गसौष्ठव नाट्यशास्त्र में वर्णित सौष्ठव ही है, जो नृत्य में
अपेक्षित बाह्य स्वरूप को सुन्दर बनाता है परन्तु इसके साथ प्रस्तोता का
आन्तरिक भावसौन्दर्य भी यहाँ कार्य करता है; जिसके बिना बाह्य प्रदर्शन
भी मनोरम पद्धति में व्यक्त नहीं किया जा सकता। हृदय में सौन्दर्य का
सुप्त भाव यदि पहिले से विद्यमान रहेगा तो अभ्यास से कलाकार की सुप्त
३ ना० भू० द्वि०