नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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भी प्रमुखता रहती है। इसी कारण भयग्रस्तता तथा हर्ष की अवस्था में उत्तम
प्रकृति के पात्रों का पाद प्रचार या गति 'द्रुत' तथा क्षुधा, व्याधि एवं शोक
आदि की दशा में अधम प्रकृति के पात्रों का पाद प्रचार भी विलम्बित या
स्थित लय में रखा जाता है। अतएव पात्रों की प्रकृति के सन्दर्भ में उनकी
गति का स्वरूप चित्तवृत्ति या सत्व की अपेक्षा से निश्चित किया जाता है यह
स्पष्ट नियम दिखलाई देता है। परन्तु उत्तमपात्र की गति मध्यम पात्र में तथा
मध्यमपात्र की ( निर्धारित ) गति की योजना उत्तमपात्र में नहीं करना
चाहिए। इसका कारण यह है कि पात्रों की गति का निश्चय उनके गुण के
आधार पर किया जाता है, क्योंकि ऐसा करने से ही रस की स्थिति सम्भव
है। भरत का यह विधान लोकानुवर्तन की स्थिति एवं प्रवृत्ति की पुष्टि
करता है। इस सन्दर्भ में आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि जब भी
असामान्य मानसिक दशाओं के कारण गति के निश्चय में विपर्यय या अनियम
दिखलाई पड़ेगा फिर भी उसमें सत्व से अनुगत एक सूक्ष्म सूत्र के सदृश नियम
धारा का अनुगमन विद्यमान रहेगा ही; जिससे उत्तमपात्र की शोकादि में द्रुत
तथा अधम की विलम्बित कर दी जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भरता-
चार्य ने प्रत्येक गति का सत्व तथा रस के अनुरूप विस्तृत विधान ही इसके
सन्दर्भ में दिखलाया है।
रसगति—भरतमुनि ने प्रत्येक रस के अनुरूप गति का अतिसूक्ष्म
एवं प्रभावकारी विवरण के साथ रसों के नियम तथा गति को दिखलाया है।
संक्षेप में यहाँ उन्हें दिया जारहा है :—
श्रृंगार रस—इसमें पात्र की लेलित एवं कोमल गति रखी जाती है।
यहाँ चरण भी ताल लयाश्रित मन्द तथा स्वच्छन्द भाव से पृथ्वी पर रखे जाते
हैं। प्रच्छन्न-कामी पात्र चन्द्रज्योत्स्ना से प्रकाशित मार्ग में शब्दमात्र से
आशंकित एवं भीत होकर चुपचाप लड़खड़ाते चरणों से डग भरते हुए
चलता है तथा उस समय इसकी स्वच्छन्द या निर्भीक स्थिति नहीं होती है।
यहीं जब अन्धकार पूर्ण मार्ग पर चलता है तो इसे धूजते या लड़खड़ाते चरणों
में ठोकर खाते हुए रखा जाता है। हास्यरस में पात्र की गति विक्षिस रखी
जाती है। करुणरस में शिथिलगति में पात्र चलता है। इस गति की योजना
मरण के समय विशेष रूप से की जाती है। इसमें स्थित ( विलम्बित ) लय
में पाद प्रचार तथा अश्रुओं के प्रवाह से अवरुद्ध नयन रखें जाते हैं। यहाँ
उत्तमपात्र की गति धैर्य युक्त सहज अश्रु प्रवाह तथा निश्वास और ऊर्ध्व-