नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ )
समपाद—देवता ब्रह्मा । दोनों पैरों का अन्तर का प्रमाण एक ताल
का तथा दोनों पैर घुटनों के साथ सहज मुड़े हुए ।
वैशाख—देवता कात्तिकेय । पैर एक दूसरे के पीछे तीन बल में लपेट
लिये हुए रख कर नमे हुए होकर खड़ा रहना ।
मण्डल—देवता इन्द्र । दोनों पैरों का यहाँ अन्तर तीन ताल तथा कटि
तथा पृष्ठ सीधी रखकर झुकते हुए खड़े रहना ।
आलीढ—तथा प्रत्यालीढ—दोनों के देव इन्द्र । मण्डल-स्थान में
दाहिने पैर को पांच ताल के अन्तर से आगे रखने पर आलीढ़ तथा इसके
विपरीत दाहिने पैर को सिकुड़ा कर बायें पैर को पाँच ताल के अन्तर से
आगे रखना प्रत्यालीढ है ।
उपर्युक्त छः स्थान पुरुषसंस्थान है तथा नाट्यशास्त्रानुमोदित हैं, परन्तु
शास्त्रीय ग्रन्थों में इनके अतिरिक्त अन्य स्थान भी प्राप्त होते हैं । 'सङ्गीत-
रत्नाकर' में इस सन्दर्भ में तेईस ( देशी ) स्थान दिखलाये गये हैं । जिनका
स्वरूप सहज बोध्य है। ये इस प्रकार हैं—( १ ) स्वस्तिक, ( २ ) वर्धमान,
( ३ ) नन्द्यावर्त, ( ४ ) संहज, ( ५ ) समपाद, ( ६ ) एकपाद,
( ७ ) पृष्ठोत्तानतल, ( ८ ) चतुरस्र, ( ६ ) पाष्णिंविद्ध, ( १० ) पार्ष्णि-
पार्श्वगत, ( ११ ) एकपार्श्वगत, ( १२ ) एकजानुगत, ( १३ ) परावृत्त,
( १४ ) समसूचि, ( १५ ) विषमसूचि, ( १६ ) खण्डसूचि, ( १७ ) ब्राह्म,
( १८ ) वैष्णव, ( १६ ) शैव, ( २० ) गरुड, ( २१ ) कूर्मासन,
( २२ ) नागबन्ध तथा ( २३ ) वृषभासन ।
इनमें समसूची, विषमसूची, खण्डसूची, गरुड, कूर्मासन, नागबन्ध तथा
वृषभासन ये आसन हैं तथा शेष स्थान हैं। इनमें स्थानकों के कुछ चित्र हमने
दिये भी हैं, जिनसे इनका स्वरूप स्पष्टतः समझा जा सके। इन स्थानकों
का ग्रन्थगतरूप स्वरूप इस प्रकार है :—
स्वस्तिक—दाहिने पैर को बायीं ओर तथा बायी ओर रखते हुए
दोनों पैरों की तिरछे करते हुए रखना ( Cross ) । ये सहजभाव में झुके हुए
और एक दूसरे को छूते हुए रखे जाएँ ।
वर्धमान—दोनों पैरों की एड़ी को एक दूसरे की ओर मुँह किये हुए
पास-पास रखकर दाहिने पैर की नोक दाहिनी ओर तथा बायें की बायीं
ओर रखते हुए खड़े रहना ।
नद्यावर्त—वर्धमान स्थिति में खड़े होकर दोनों पैरों का अन्तर छः से
बारह अंगुल रखना ।