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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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( ३० )
ऊँचा कर तिरछा मोड़ते हुए ( आगे की ओर ) रखना । ( बैशाख स्थान में
तथा इस स्थान में अतिशय साम्य है )
गारुड—दायाँ बायाँ पैर उलटा कर ऐसे सिकुड़ाते हुए रखना जिसमें
दोनों एड़ियाँ जमीन का स्पर्श पंजे के अगले अंगूठों से करे ।
कूर्मासन—दाहिने पैर को आगे सिकुड़ा कर बैठे तथा पंजा सीधा
रखे जिससे एड़ी ऊपर रहे तथा बायाँ पैर खड़ा जमीन पर टिकाना ।
नागबन्ध—उपर्युक्त मुद्रा में बायें पैर की जंघा पर दाहिने को तिरछी
रख कर बैठना ।
वृषभासन—दोनों घुटने जमीन पर जुड़ा कर अन्तर से रखते हुए दोनों
पंजों के बल बैठना ।
उपर्युक्त स्थान तथा आसनों की करणों में योजना का विवरण मिलता
है । जैसे स्वस्तिककरण की स्वस्तिक, ऊर्ध्वस्वस्तिक, वक्षःस्वस्तिकं, पृष्ठ
स्वस्तिक जैसे स्वस्तिक करणों में योजना होती है । वर्धमानक ( इस ) स्थान
की तलपुष्पपुट, रेचित निकुट्टक, छिन्न तथा अन्य करणों में योजित होता है ।
संहत को समनख तथा लीन करणों में संयुक्त किया जा सकता है । नद्यावर्त
को अपविद्ध, अर्धरेचित, भुजङ्गतस्त, रेचित, जैसे करणों में संयोजित किया
जाता है । चतुरस्र की मण्डलस्वस्तिक, स्वस्तिकरेचित, कटिसम तथा उन्नत
जैसे करणों में योजित होता है । गरुड की कुञ्चित में योजना होती है । इसी
दिशा में अन्य स्थान की भी करणों में योजना हो सकती है यह ध्यान से देखने
पर स्पष्ट हो सकता है । नाट्यशास्त्र के किसी उत्तरकालभव पाठ या
कोहलादि प्रणीत स्थानक विवरण को लेकर ही सङ्गीतरत्नाकरादि¹ में इनका
विस्तार है जो नाट्यशास्त्र का ही है । क्योंकि अभिनयादि प्रयोग में आज भी
इनका उपयोग हो रहा है । अतः ये जो स्थान अतिरिक्त है वे भी नाट्यशास्त्र
के भरत प्रोक्त ही होना ( उचित ) लगता है, तथा इन्हें परम्परागत
नाट्याचार्यों की परम्परा में आज माना भी जाता है ( परन्तु इनका
प्रामाणिक संशोधनपूर्ण उत्तर अभी शेष है । जो भी हो इसपर हमने इसी
कारण प्रस्तुत संस्करण में कुछ ही ऐसे चित्र देकर विषय को रखा है । जिसे
आशा है प्रमाणादि के साथ हम आगे और भी संशोधित कर प्रस्तुत करने का
उद्योग करेंगे— (सम्पा०)
१. ये २३ देशी स्थानक जिनको संगी. रत्ना. में नर्त० पृ० ३२६-३३५
अडचार सं० में देखा जाए ।