नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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आसन एवं शयन विधान—नाट्यशास्त्र में पात्रों के देश, काल,
प्रकृति तथा चित्तवृत्ति आदि के अनुरूप उपयुक्त आसन तथा शयन विधान का
निरूपण किया गया है। यह विधान राजसभा तथा समाज में प्रचलित
व्यवहारों के आधार पर निर्धारित किया गया है। ये आसन स्वस्थ या
विश्रामदशा में, विचार, चिन्ता, शोक, मूर्च्छा, लज्जा, मद, ग्लानि, रोग
तथा निद्रा की अवस्था में विभिन्न स्वरूप वाले दिखलाये गये हैं। इसी
प्रकार प्रियाप्रसादन, धार्मिकविधि सम्पादन एवं देववन्दना आदि के समय
इनके विभिन्न स्वरूप रहते हैं। इन भावों के लिये विभिन्न शारीरिक
भङ्गिमाओं के तथा मुद्राओं के प्रयोग का भी भरतमुनि ने निर्देश किया है,
तदनुसार शोक की दशा के अभिनय में दोनों हाथों के सहारे चिबुक को रखा
जाता है, मस्तक गर्दन पर झुकाया जाता है तथा इन्द्रिय एवं मन की
निष्क्रियता दिखलाई जाती है। इसी प्रकार प्रिया के प्रसादन में दोनों घुटनों
को पृथ्वी पर रख कर नीचे मुख किये हुए रहते हैं तथा देववन्दना में भी
यही आसन रखा जाता है।
इस प्रकार पात्रों के उत्तम, मध्यम आदि सामाजिक आधारों पर अनेक
प्रकार के आसनों का विधान दिखलाया गया है। तदनुसार राजा एवं
महारानी के लिये सिंहासन, पुरोहित, अमात्य एवं उनकी पत्नियों के
लिये वेत्रासन, सेनापति एवं युवराज के लिये मुण्डासन, ब्राह्मणों के लिये
काष्ठासन, वैश्याओं के लिये मसूरक आसन तथा शेष स्त्रियों एवं सेवकों
आदि के लिये भूम्यासन का विधान बतलाया गया है।
शयन—इसी प्रकार शयनदशा में शरीर की स्थिति एवं भङ्गिमा
के आधार पर छः प्रकार के शयन का विवरण नाट्यशास्त्र में दिया गया
है। यह विधान अतिसङ्क्षिप्त है क्योंकि नाट्यप्रयोग में इसका उपयोग
अधिक नहीं होता। ये छः प्रकार हैं :—( १ ) आकुञ्चित, ( २ ) सम,
( ३ ) प्रसारित, ( ४ ) विवर्तित, ( ५ ) उद्वाहित तथा ( ६ ) नत ।
'आकुञ्चित' में समस्त अङ्ग सिकुड़े हुए तथा दोनों घुटने शयन से
सटे हुए रखते हैं। इसकी योजना ठण्ड से ठिठुरते हुए पात्र के लिये रखी
जाती है। 'सम' में मुँह ऊपर तथा दोनों हाथ शिथिल रहते हैं। इसे सोए
हुए व्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाता है। 'प्रसारित' में एक भुजा को
सिरहाना बना कर जंघाओं को फैला कर लेटा जाता है। सुख से या
निश्चिन्त होकर नींद लेने की दशा में इसकी योजना रहती है। विवर्तित'
में पात्र नीचा मुँह रख कर सोता है। शस्त्र से क्षत या मृत, उन्मत्त या