नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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करता था तथा समीप की स्थिति में थोड़ा परिक्रमण होता था। इनमें
रङ्गमञ्च का मुख भाग रङ्गपीठ होता है तथा यही आभ्यन्तर भाग कहलाता
है जहाँ पात्र नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करते हैं। इनमें नेपथ्यगृह से लगी हुई कक्ष्या
आभ्यन्तर-कक्ष्या, रंगपीठ से लगी कक्ष्या बाह्य-कक्षा तथा इन दोनों की
मध्यवर्ती कक्ष्या मध्यम होती थी। ये कक्ष्यायें रङ्गमंच के दोनों ओर होती
थीं, ये ही बाहर से आड़ या पक्ष (पखवाई) का भी कार्य सम्पन्न करती
थी तथा इन्हीं से पार्श्व की ओर आगम एवं निर्गम होता था और इन्हीं
कक्ष्याओं में विभिन्न दृश्यों की अवतारणा कर ली जाती थी। इस कक्ष्या-
विभाग की परिधि में (जो पात्र के विशेष भाग में स्थित होने से जानी
जाए तथा जहाँ दृश्य निरूपण कथावस्तु के कारण इष्ट हो तो वहीं पर)
ऐसे सभी प्रदेश, नगर, वन, पर्वत आदि आ जाते हैं जो प्रस्तुत दृश्य में
प्रदर्शित होने चाहिए थे। इस प्रकार ये सभी प्रदेश-फिर चाहे वे अन्दर,
बाहर, मध्य, दूर या समीपवर्ती प्रदेश हों—कथावस्तु के कारण परस्पर
सम्बद्ध हो जाते थे। इन कक्ष्या विभागों की विधि या रूढ़ि के अनुसार
जो पात्र रंगमंच पर प्रथम प्रवेश करें वे आभ्यन्तरपात्र मञ्च के अन्तः
स्थान (गृह, प्रासाद) में स्थित रहते हैं तथा आभ्यन्तर प्रकृति कहलाते
हैं। इसके बाद जो पात्र रंगमञ्च पर प्रवेश करते हैं वे बाह्य होते हैं तथा जिस
मार्ग से वे प्रवेश करेंगे वह भाग मध्यम कहलाता है, क्योंकि इसी से वे
अन्दर प्रवेश करते हैं। रंगमंच के आभ्यन्तर भाग से जो पात्र इन पूर्व
प्रविष्ट पात्रों को देखने या मिलने के लिए आए वह अपनी बात दाहिनी
ओर (दक्षिण दिशा की ओर) होकर कहते हैं।
यहाँ रङ्गमञ्च पर दिशा का भो संकेत रखा गया है, इसका आधार है
नेपथ्यगृह तथा वाद्ययन्त्रों के लिये निर्मित द्वार का मुख; क्योंकि यह मुख
जिस ओर रहेगा उसे नाट्यप्रदर्शन के विधानानुसार पूर्व दिशा मानी
जाती है। इसी पूर्वद्वार से पात्रों का प्रवेश या आवागमन भी किया
जाता है, अतः जो पात्र इन निर्दिष्ट द्वारों में से जिस द्वार से निकलता है
उसे उसी द्वार से प्रवेश करना होता है। बाह्य पात्र का प्रवेश तथा निर्गम
एक ही द्वार से होता है। आभ्यन्तरपात्र भी कार्यवश यदि बाह्यपात्र के
साथ निकलता है तो जिस द्वार से बाह्यपात्र आया था उसी द्वार से
निकलेगा। कोई पात्र एकाकी या किसी अन्य पात्र के साथ प्रवेश करता है
तो उसे निर्दिष्ट द्वार से ही प्रवेश करना होता है। किसी कार्यवश बाहर