नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें( २३ )
निरीक्षण के साथ रखी जाती है । इस समय पादप्रक्षेप या प्रचार ही सहज
होता है । शोकग्रस्त पात्र का वक्षःस्थल 'नत' रखा जाता है तथा गाढ़प्रहार
की स्थिति में शरीर को भुजा के सहारे टिका हुआ दर्शाया जाता है । रौद्ररस
में चण्डगति होती है । इस गति की योजना क्रोध में शत्रु का पीछा करने में
की जाती है । इसमें पैरों का अन्तर चार ताल का रखा जाता है । राक्षस
एवं दैत्य पात्रों में इसे स्वाभाविक गति के रूप में रखा जाता है, क्योंकि ऐसे
पात्र स्वभाव से ही रौद्र प्रकृति के होते हैं। इसमें पाद प्रचार विषम रहता
है । वीररस के प्रयोग में गौरवगति रहती है जो उत्तम या वीर प्रकृति के
पात्रों की सहज गति मानी जाती है। इसमें गति का क्रम द्रुत तथा इसी
कारण चरणविन्यास न्यूनकलाओं वाला रखा जाता है। भयानकरस में
गति भयत्रासित रखी जाती है। इसमें दोनों बाजुओं की ओर देखना,
धूजना, आँखों को खुली रखना, ओठों का सूख जाना आदि के साथ
स्खलितगति में पादसंचार रहता है। इसमें गति चूर्णपद में रहती है तथा
विकल तथा कापुरुष व्यक्ति की यह स्वाभाविक गति मानी गयी है ।
बीभत्सरस में सङ्कोचगति रहती है । इसमें हाथ पैर के पीछे रखे जाते हैं
तथा चरणविन्यास पास-पास या एक के पीछे एक या एक दूसरे के मध्य
में रखे जाते हैं । (तथा यह अनियन्त्रित स्वरूप में भी रहता है ) । अद्भुत-
रस में आश्चर्यगति रहती है । इसमें पैरों की गति लड़खड़ाते हुए तथा चारों
ओर घूमते हुए रहती है तथा पात्र मुग्धभाव में रहता है । शान्तरस में
स्थिरगति या अचंचलगति रखी जाती है, जो स्थितप्रज्ञ या शान्त पुरुष की
होती है । इसमें समपाद की स्थिति में पात्र अवस्थित रहता है ।
विविध पात्र गति—नाट्यशास्त्र में पात्रों के स्तर, दशा तथा प्रकृति
की विभिन्नता के आधार पर तथा उनके उत्तम, मध्यम एवं अधम श्रेणी के
विभाजन के द्वारा (उनकी) गति का विस्तार से निरूपण किया गया है ।
इसका कारण है—अभिनय में यथार्थता आकर प्रतिपाद्य रस में निर्बाध
आस्वाद्यमानता का उत्पन्न होना । भरत का यह विविध पात्रों की गति का
विवरण अति विस्तीर्ण है, जिसमें उत्तम आदि पात्रों में परिगणनीय नृप,
सचिव, यति, वणिक्, तपस्वी, वृद्ध एवं युवा, स्थूल तथा कृश, मत्त एवं
उन्मत्त तथा पंगु, वामन, कुब्ज एवं खञ्ज पुरुष के अतिरिक्त शकार, चेट,
विदूषक, कञ्चुकी तथा दास जैसे पात्रों की गतियाँ निरूपित हैं। यह गति
निरूपण नाट्य के प्रयोग में उपयोगी एवं प्रभावकारी तो है ही बड़ा ही
मौलिक भी है ।