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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 668 में से

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( २१ )
या साध्य रस के उदय का आरम्भ सामाजिकों में होने लगे। इसलिये ऐसे
समय भाण्डवाद्य के वादन के साथ-साथ मार्ग एवं रस से युक्त ध्रुवागान को
(पात्र प्रवेश-काल में) रखा जाता है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद¹ ने कोहल
आचार्य का इस सन्दर्भ में मत दिखलाते हुए बतलाया कि प्रवेशकाल के समय
नाट्यप्रयोग के अनुसार ध्रुवा या शुष्काक्षर गान करवाया जाए तथा पात्र को
उचित स्थान, दृष्टि, मुखराग आदि से संयुक्त रखते हुए रखा जाए, जिससे
सामाजिकों के अन्तःकरण में शीघ्र प्रतिपाद्य (मुख्य) रस के उदय का
आरम्भ होने लगे। इसमें उत्तम तथा मध्यम पात्रों का प्रवेश वैष्णवस्थान
द्वारा किया जाता है। उस समय उनका वक्षः, बाहु तथा मस्तक सम, उन्नत
तथा एक समान रखा जाता है, ग्रीवा मयूर सी उन्नत, सुन्दर तथा प्रसन्न,
दाहिना तथा बायाँ हाथ क्रमशः नाभि तथा कटि के पास अवस्थित रखते
हुए भूमिकानुसार उन्हें अन्तर (तथा समय) लेते हुए अपने डगों को रखना
चाहिए। इस प्रकार रङ्गमञ्च पर प्रविष्ट पात्र के चरण अपनी प्रकृति और
मानसी दशा के अनुरूप निश्चित दूरी पर समय के अनुसार रखे जाएँगे।
इसका कारण पात्रों की अपनी प्रकृति रहती हैं। उत्तमपात्रों की प्रकृति
गम्भीर होती है तथा अधम की चंचल या असंयत।
देवता तथा राजा जैसे उत्तमपात्रों के पादक्षेप का अन्तर चार ताल,
मध्यमपात्रों का दो ताल तथा स्त्री एवं नीच पात्रों का अन्तर एक ताल की
दूरी पर होता है। इसी प्रकार इनका समय भी दिखलाया गया है। यथा—
उत्तम पात्र के पाद क्षेप में चार कला, मध्यम में दो कला तथा अधम में
एक कला का समय लगना चाहिए। इसके अतिरिक्त इसे लय के अनुगत
भी रखा जाता हैं अतः उत्तमपात्रों का गति क्रम स्थित या विलम्बित लय
में, मध्यमपात्र का मध्यम लय में तथा अधम पात्रों का द्रुत लय में रखा
जाता है।
इस विवरण से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि जब गति का निर्धारण
ताल, लय तथा समय का आश्रय लेकर नियमानुसार रखा जाता है तो उसे
सत्व या मनोदशा के सन्दर्भ में भी रहना चाहिए। क्योंकि मनःस्थिति जब
असाधारण हो तो पात्रों की उपर्युक्त गति में प्रकृतिभेद से उसे रखा जाएगा
क्योंकि सत्व प्रकृति की अपेक्षा से आवश्यक रहता है। चरणों के अन्तर में
रखे गये काल, लय और गति के क्रम में प्रकृति की अपेक्षा से चित्तवृत्तियों की
१. द्रष्ट० अभि० भार० vol II पृ० १३७.