नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३४ )
कला अवश्य जाग्रत हो जाएगी। इसी जाग्रति के लिये कलाकार को प्रशिक्षण
देने का प्रावधान है भी।
रङ्गमञ्च की कक्ष्या-परिधि—नाट्यशास्त्र के चतुर्दशअध्याय में नाट्य-
मण्डप पर प्रस्तुत दृश्यविधान का विवरण है। इस विवरण का एक अंश
रङ्गमञ्च के स्वरूप एवं साजसज्जा को दिखलाते हुए नाट्यशास्त्र के द्वितीय
अध्याय में दिया जा चुका था, किन्तु नाटकीय इतिवृत्त के अनुरोध पर शेष
तत्त्वों का इसी अध्याय में विवेचन हुआ है।
इतिवृत्त के अनुरोध पर रङ्गमञ्च पर अनेक दृश्यों की योजना करनी
पड़ती है। भरत मुनि ने ऐसे दृश्यों को प्रस्तुत करने के लिये अनेक उपयोगी
विधियाँ बतलाईं जिससे दृश्यविधान अधिकाधिक यथार्थ या लोकानुरूपता-
शाली बन सके।
दृश्यविधान की विधियों का आहार्याभिनय के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में
विचार हुआ है जिसका कुछ और विचार उसी प्रसङ्ग में नाट्यशास्त्र की प्रस्तुत
इसी व्याख्या के तृतीय भाग में किया जा रहा है। इसी के लिये कक्ष्याविभाग
की महत्त्वपूर्ण प्रथा ( रूढि ) की ( जिसमें प्रतीकात्मक नाट्यप्रयोगविधान
है ) उद्भावना की गयी थी; यह थी दृश्यविधान में रंगमञ्च पर स्थापित
कक्ष्याविभाग पद्धति। कक्ष्याविभाग का यह प्रयोग परम्परा तथा कल्पना
पर आधृत रख कर किया गया है। कक्ष्याविभाग का सामान्यतः आशय
यही है कि कथानक के अनुरूप रंगमञ्च पर स्थान या देश की कल्पना करना
जो नाट्यधर्मी रूढ़ियों आदि पर आश्रित रखते हुए दिखलाई जाए। भरत के
द्वारा किये गये ऐसे कक्ष्याविभाग निरूपण का उद्देश्य यही है कि नाट्यप्रयोग
अधिकाधिक प्रकृत एवं अनुरूपता पर आधारित हो सके, क्योंकि अनुरूपता
ही यथार्थ के समीप नाट्यविधान को लाने में सक्षम होती है।
इन कक्ष्याओं का विभाजन रंगमञ्च पर इस प्रकार कर लिया जाता
था कि एक विभाग से दूसरे विभाग पर आ जाने पर समझा जाता था कि
पात्र एक स्थान या देश से दूसरे में प्रवेश कर रहा है। मुनि ने कक्ष्या-
विभाग के अन्तर्गत आभ्यन्तर, बाह्य तथा मध्यम भाग की रङ्गमञ्च पर
ही परिकल्पना की तथा रंगमञ्च की परिधि में चलने से ही इनके विभाग
सूचित हो जाते थे। ये कक्ष्यायँ या इनके स्थान कितनी दूर पर निर्दिष्ट
हो—इसका विनिश्चय पात्रों के परिक्रमण की संख्या या स्थिति से होता
था। यदि दूर का स्थान निर्दिष्ट करना हो तो पात्र देर तक परिक्रमण