नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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इसके अतिरिक्त मुनि ने म्लेच्छ, शबर आदि प्रजातियों की प्रकृति एवं
स्थिति के अनुरूप गति निरूपण के साथ-साथ नाट्य में प्रयुज्यमान सिंह,
वानर, रीछ जैसे पशुओं तथा पक्षि एवं सर्प आदि प्राणियों की गति का भी
व्यवस्थित विवरण दिया है। इसके अतिरिक्त पुरुषपात्रों के समान ही स्त्री-
पात्रों की गति का भी विस्तार से विवरण है। सुकुमार प्रकृति के कारण
स्त्रियों की गति में कला, ताल एवं लय के प्रमाण को पुरुष की अपेक्षा आधा
रखा जाता है, तथा अवस्था भेद से भी युवती, मध्या, प्रौढ़ा तथा वृद्धा के भेद
से भी स्त्रीगति में अन्तर रहता है। जैसे बाला की गति में अधिक स्वच्छन्दता
रहनी चाहिए तथा सभी स्त्रियों की गति में लालित्य एवं विलास के साथ-
साथ सौष्ठव भी दिखना चाहिए। (ये) सभी पात्रों की गतियां उनकी प्रकृति,
चित्तवृत्ति, अवस्था, देश एवं काल के अनुरूप रखी जाती है। इन विवरणों
में जिन जातियों, पदार्थों ( या वस्तु ) का विधान न हो उन्हें लोकव्यवहार
एवं उनके स्वरूप को देख कर नाट्यप्रयोग में आचार्यबुद्धि से नियोजित
करना चाहिए।
भूमिका-विपर्यय—नाट्यप्रयोग की अपेक्षा या अन्य स्थितिवश इसके
अतिरिक्त भी पात्रों की भूमिका में परिवर्तन किया जा सकता है। मुनि ने
ऐसे उद्देश्यों की पूर्ति के लिये भूमिका विपर्यय का विधान दिया है।
इसमें ऐसे कार्य का उद्देश्य तथा विधान के साथ पर्याप्त व्यवस्थित विश्लेषण
( भी किया गया ) है कि पुरुष एवं स्त्रीपात्र अपने स्वभाव, स्थिति एवं
प्रकृति के विपरीत ऐसी भूमिका क्यों ग्रहण करते हैं। यह दो स्थितियों में
होता है—( १ ) आत्मस्वभाव या स्वरूप का परिवर्तन तथा ( २ )
परभाव या समय के अनुसार इष्ट स्वरूप का धारण या तद्भावगमन।
इस प्रकार स्त्रीपात्र वेष, कर्म, भाषा एवं गति से पुरुषों का तथा पुरुष
भी स्त्रीवेष तथा मृदुगति आदि से स्त्रीभाव का अभिनय सम्पन्न करता है।
यह भूमिकाविपर्यय सिद्धान्त अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। प्रथम तो
यह प्रयोग की दृष्टि से विलक्षणता लिये हुए है, क्योंकि इसमें अधिक नाट्य-
कौशल दिखलाना पड़ता है जो अतिशय अभ्यास तथा परिश्रम की अपेक्षा
रखता है। दूसरे इसका ऐतिहासिक महत्व भी कम मूल्यवान् नहीं है।
इससे यह स्पष्ट है कि भरतमुनि के समय तक नाट्यविज्ञान इतना विकसित
तथा समृद्ध हो चुका था, जिसमें मनोवैज्ञानिक स्तर पर चमत्कार की
उद्भावना के उद्देश्य के अतिरिक्त अन्य तात्कालिक व्यवस्था की पूर्ति के लिये
'भूमिकाविपर्यय' की योजना हो सकती थी। इसने संस्कृत नाट्यप्रयोग