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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 668 में से

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( २७ )
**अवहित्थस्थान—**इसमें बायाँ पैर सम, दाहिना तिरछा तथा कटि का
बायाँ भाग उन्नत या उठा हुआ रहता है। इसके द्वारा सहजसम्भाषण, निश्चय,
वितर्क आदि क्रियाओं तथा लीला, विलास, विव्वोक आदि नारी सुलभ
सुकुमार भावों का अभिनय किया जाता है।
**अश्वक्रान्तकस्थान—**इसमें एक चरण उठा हुआ, दूसरा अग्रतलसंचर
स्थिति में झुका हुआ तथा सूची या आविद्ध चारी रहती है। इसके द्वारा
वृक्ष की टहनियों को छूने, पुष्प गुच्छकों को ग्रहण करने, अङ्गों से वस्त्र के
खिसकने आदि क्रियाओं का तथा लालित्यपूर्ण नाट्यार्थ के ग्रहण करने जैसे
अर्थों का अभिनय किया जाता है। इन स्थानकों का प्रदर्शन चेष्टाएँ तथा
चारी के आरम्भक क्षण तक ही रखा जाता है। ये स्त्री तथा पुरुष पात्रों के
द्वारा सामान्यतः नियमानुसार रखे जा सकते हैं।
नाट्यशास्त्र में स्थानक का विवरण अल्प है तथा इनकी स्थिति का स्वरूप
भी (इसी कारण) पूर्ण नहीं प्रतीत होता । परन्तु अभिनयदर्पण, सङ्गीतरत्नाकर
तथा नृत्यरत्नकोश आदि नाट्यसंगीत ग्रन्थों में स्थानों का विवरण विस्तार
से प्राप्त होता है। यह स्थानकों का विवरण इसी कारण यहाँ देना आवश्यक
है। स्थानों का प्रयोग भी विविध अभिनय तथा मुद्राओं के प्रस्तुत करने के
समय रखा जाता है, जहाँ एक नियत स्थिति में पात्र को खड़ा रहना होता
है। यही स्थिति 'स्थान' ( Pose ) कहलाती है।¹ ये स्थान ( आरम्भ में )
छः हैं—( १ ) वैष्णव, ( २ ) समपाद, ( ३ ) वैशाख, ( ४ ) मण्डल, ( ५ )
आलीढ तथा ( ६ ) प्रत्यालीढ़ । इन सभी स्थानों के अधिष्ठाता देवता भी
नियत है तथा इनका विवरण शास्त्र में मिलता है। तदनुसार यह क्रम इस
प्रकार है :—
**वैष्णव—**देवता विष्णु। आगे रखने का प्रमाण २ १/२ ताल के अन्तर
से, एक पैर ऊँचा तथा दूसरा तिरछा, जंघा ऊँची तथा एडी तिरछी रखी
जाती है ।
१. नाट्य के इस स्थानक विवरण की विस्तार से मीमांसा यहाँ सम्भव
नहीं है परन्तु इन विवरणों के आधार पर हमने कुछ रेखाचित्र लगा दिये हैं।
इन्हें नाट्यशास्त्र के अभिनयप्रयोग विवरण में उपयोगी तथा परम्परानुमोदित
मानकर आज भी दक्षिण भारत के कलाकार इन्हें प्रस्तुत करते रहे हैं
( अतः ये प्राचीन ही हैं )—सम्पादक ।