नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 47, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३६ )
निकल जाने पर यदि वही पात्र पुनः लौटे तो वह उसी मार्ग तथा द्वार से
प्रवेश करता है जिससे वह बाहर गया था । पात्रों के प्रवेश के समय अन्य
कक्ष्या की सूचना के लिये रंगमञ्च पर एक या अनेक बार आवश्यकतानुसार
परिक्रमा करने से दूसरी कक्ष्या सूचित हो जाती है । यदि समानस्थिति के
पात्र हों तो साथ-साथ तथा अधम पात्र से युक्त रहने पर उनसे घिरे हुए
चलने वाले नृपपात्र के प्रवेश की स्थिति में प्रतीहारी का उसके आगे चलना
बतलाया जाए । इसके अतिरिक्त प्रेक्षागृह के बाहर खुले स्थान या रंगमञ्च
पर नाट्य-प्रयोग की दशा में वाद्ययन्त्रों की ओर पीठ कर प्रयोक्ता या पात्र
जिस दिशा में मुख रख कर खड़े होते हों उसे भी रूढ़ि के अनुसार पूर्वदिशा
मानकर कार्य सम्पन्न किया जाता है ।
इसी प्रकार इसी कक्ष्याविभाग में दूरी या निकटता के देश का संकेत
विधान भी रखा गया है । पात्र की दूर या निकट प्रदेश की यात्रा का भान
उसके अधिक चलने या घूमने की गति से दूर का प्रदेश तथा कम चलने से
मध्यम व्यवधान वाले अथवा निकट प्रदेश को दिखलाया जाता है । यह क्रम
यद्यपि नाट्यविधान के अन्तर्गत रहता है किन्तु यह नियम लोकपरम्परा से
प्रभावित नियम है । लोकव्यवहार में अधिक दूरी की यात्रा करने में अधिक
चरणसंचार तथा कम दूरी में कम चरणसंचार रहता है यहीं इस नियम का
आधार था यह स्पष्ट प्रतीत होता है ।
दिव्यपात्रों का कक्षावस्तु की अपेक्षा के अनुसार नगर, वन, पर्वत,
सागर, वर्ष, द्वीप आदि सभी प्रदेशों पर आकाश, विमान या अपने से
उद्भावित माया के द्वारा पहुँचना बतलाया जाता है; क्योंकि दिव्य पात्रों की
शक्ति असीम होती है । पात्रों का संचार प्रयोजनवश यदि प्रच्छन्नस्वरूप में
रखा जाए तो उसको पृथ्वी पर ही बतलाया जाए क्योंकि यहाँ वे मनुष्य रूप
में दिखलाई दे सकते हैं । दिव्य तथा दिव्यादिव्य पात्र जम्बूद्वीप आदि सभी
वर्षों में अपनी इच्छानुसार आ जा सकते हैं परन्तु पात्र केवल भारतवर्ष में
घूमने वाले ही रखना चाहिये । यदि किसी पात्र का कार्यवश दूर देश में
प्रस्थान बतलाना ही हो तो अङ्क को वहीं समाप्त करते हुए दूसरे अङ्क के
आरम्भ में प्रवेशक के द्वारा यह दिखलाना चाहिए । इस प्रकार पात्रों की
अपनी स्थिति, सामर्थ्य तथा पहुँच के साथ-साथ प्रयोग के अनुसार कक्ष्या-
विभाग में प्रदेश दिखलाये जाते हैं ।
इसी प्रसंग में भरतमुनि ने दिव्यजातियों के निवास भूत विशिष्ट पर्वत