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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 668 में से

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पृष्ठ 124

अष्टमोऽध्यायः १३
ऐसी क्रूर-दृष्टि जिसमें पुतलियाँ रूखी, लाल तथा घूमने वाली
हों, पलकें स्थिर हों तथा भ्रुकुटी टेढ़ी हों तो ऐसी दृष्टि 'रौद्री' कहलाती
है। इसका प्रयोग रौद्ररस में किया जाए ॥ ४९ ॥
दीप्ता विकसिता क्षुब्धा गम्भीरा समतारका।
उत्फुल्लमध्या दृष्टस्तु वीरा वीररसाश्रया ॥ ५० ॥
जो दृष्टि चमकीली, फैली हुई, क्षुब्ध गम्भीर हो, पुतलियाँ बीच में
स्थित हों तथा जिसका मध्यभाग खिला हुआ हो तो (यह) 'वीरा'
दृष्टि कहलाती है। इसे वीर रस में प्रयुक्त किया जाता है ॥ ५० ॥
निकुञ्चितपुटापाङ्गा घूर्णोपप्लुततारका।
संश्लिष्ट१स्थिरपद्मा च बीभत्सा दृष्टिरिष्यते ॥ ५१ ॥
जिसमें पलकों से नेत्रों के कोने ढंक लिये गए हों, पुतलियाँ घुमाव के
कारण दबी (उपप्लुत) या विघ्नित हों और बरौनियाँ एक दूसरे से मिली
हुई और स्थिर हों तो (यह) 'बीभत्सा' दृष्टि कहलाती है