नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः १९
त्रासोद्वृत्तपुटा या तु तथो¹त्कम्पिततारका ।
सन्त्रासोत्फुल्लमध्या च त्रस्ता दृष्टिरुदाहृता ॥ ८० ॥
त्रास के कारण ( जिसमें ) पलकें उठी हुई हों, पुतलियाँ ऊपर की
ओर घूमती रहती हों तथा जिसका खिला हुआ मध्य भाग रहे तो उस
दृष्टि को 'त्रस्ता' कहते हैं ॥ ८० ॥
आघू²र्णमानमध्या या क्षामान्ताञ्चितलोचना ।
दृष्टिर्विकसितापाङ्गा मदिरा तरुणे मदे ॥ ८१ ॥
जिसमें दृष्टि का मध्य भाग घूमने वाला, (आँखों के) कोने पतले और
आखें झुकी हुई रहें और आँखों की नोकें पूर्ण फैली हुई हों तो उसे 'मदिरा'
दृष्टि जानो । इस प्रकार की दृष्टि 'तरुणमद' में रखी जाती है ॥ ८१ ॥
किञ्चिदाकुञ्चितपुटा किञ्चिद्वे³ल्लुलिततारका ।
अनवस्थितसञ्चारा दृष्टिर्मध्यमदे भवेत् ॥ ८२ ॥
'मध्यमद' में इसी दृष्टि में पलकें थोड़ी सिकुड़ी हुई रहती हैं एवं
पुतलियाँ और बरौनियाँ क्रमहीन दशा में (थोड़ी) हिलती रहती हैं ॥८२॥
सनिमेषाऽनिमेषा च किञ्चिद्दर्शिततारका ।
अधोभागचरी दृष्टिरधमे तु मदे स्मृता ॥ ८३ ॥
'अधममद' में इसी दृष्टि में या तो पलकें गिरने लगती हैं या एकदम
रुक जाती हैं, पुतलियाँ थोड़ी मात्रा में देखने लगती है और नीचे की ओर
घूमती रहती है ॥ ८३ ॥
इत्येवं लक्षिता ह्येषा षट्त्रिंशद्दृष्टयो मया ।
रस⁴जा भावजाश्चासां विनियोगं निबोधत ॥ ८४ ॥
इस प्रकार मैंने इन छत्तीस प्रकार की दृष्टियों के लक्षण बतलाये जो
रस तथा भावों की अभिव्यंजक हैं। अब मैं इनकी योजना ( या विधान )
बतलाता हूँ ॥ ८४ ॥
रसजास्तु रसेष्वेव स्थायिषु स्थायिदृष्टयः ।
शृणुत⁵ व्यभिचारिण्यः सञ्चारिषु यथास्थिताः⁶ ॥ ८५ ॥
इनमें रसदृष्टियों की रसों में योजना की जाती है तथा स्थायी-भाव-
दृष्टियों की स्थायी-भावों में । ( जो कि बतला दी गई है अतएव ) अब
१. त्रासादुत्फुल्ल—क०; त्रासोत्कम्पित—ग० ।
२. व्याघूर्णमान—ग० । ३. ह्यनवस्थिततारका—ख—ग० ।
४. सहजा—क० । ५. शृणुध्वं—ग० । ६. यथा हि ताः—ग० ।