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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 668 में से

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३० नाट्यशास्त्रम्
नीचले ओठ का फड़कना ( या नीचे झुकना ) 'विवर्तन', ओठ का
धूजना 'कम्पन', ओठ का बाहर निकलना 'विसर्ग', ओठ का अन्दर ले
जाना 'विनिगूहन', ओठ का दाँतों से दबाना 'सन्दष्टक' तथा ओंठ को
बाहर की ओर ऊँचा करना 'समुद्गक' कहलाता है । ये अधरोष्ठ के लक्षण
हैं । अब इनकी योजना सुनिये ॥ १३९-१४१ ॥
योजना—
असूयावेदनावज्ञा¹द्धास्यादिषु विवर्तनम् ॥ १४२ ॥
कम्पनं वेद²नाशीतभयरोषजवादिषु ।
स्त्रीणां विलासे बिब्बोके विसर्गो र³ञ्जने तथा ॥ १४३ ॥
विनिगूहनमायासे सन्दष्टं क्रोधकर्म⁴सु ।
समुद्गस्त्वनुकम्पायां चुम्बने चाभिनन्दने ॥ १४४ ॥
असूया, वेदना, लज्जा, अनादर तथा हास्य आदि में 'विवर्तन' की,
वेदना, शीत, भय, क्रोध, वेग आदि में 'कम्पन' की; स्त्रियों के विलास,
बिब्बोक तथा रंजन में 'विसर्ग' की; ( श्रम तथा ) आयास में 'विनिगूहन'
की, क्रोध के कार्य आदि में 'सन्दष्टक' की तथा अनुकम्पा, अभिनन्दन और
चुम्बन में 'समुद्गक' की योजना करनी चाहिए ॥ १४२-१४४ ॥
चिबुक कर्म—( लक्षण )—
इत्योष्ठकर्माण्युक्तानि चिबुकस्य निबोधत ।
कुट्टनं खण्डनं छिन्नं चुक्कितं ⁶लेहितं समम् ॥ १४५ ॥
दष्टञ्च दन्तक्रियया चिबुकन्त्विह लक्ष्यते ।
कुट्टनं दन्तसङ्घर्षः सम्फोटः खण्डनं मुहुः ॥ १४६ ॥
छिन्नन्तु गाढ़संश्लेषश्चुक्कितं⁷ दूरविय्युतिः ।
लेहनं जिह्वया लेहः किञ्चिच्छ्लेषः समं भवेत् ॥ १४७ ॥
दन्तैर्दष्टेऽधरे दष्टमित्येषां विनियोजनम् ।
१. वेदनालज्जालस्यादिषु—ख–ग० ।
२. वेपनं शीतज्वररोगजयादिषु—ग० ।
३. विसर्ग सुरते स्मृतः—ख० । ४. क्रोधकर्मणि—ग० ।
५. चिकितं—ख; चुक्षितं—ग० । ६. लेहनं—ख–ग० ।
७. चिकितं—ख; चुक्षितं—ग० । ८. किञ्चिच्चेष्टः—ख–ग० ।