नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः ९१
दृष्टियों के प्रकार—
कान्ता भयानका हास्या करुणा चाद्भुता तथा ।
रौद्री वीरा च बीभत्सा विज्ञेया रसदृष्टयः ॥ ३८ ॥
रस की अभिव्यक्ति करने वाली ये दृष्टियाँ हैं—कान्ता, भयानका,
हास्या, करुणा, अद्भुता, रौद्री, वीरा तथा बीभत्सा (इन्हें रसदृष्टियाँ
कहते हैं) ॥ ३८ ॥
स्निग्धा हृष्टा च दीना च क्रुद्धा दृप्ता¹ भयान्विता ।
जुगुप्सिता विस्मिता च स्थायिभावेषु दृष्टयः ॥ ३९ ॥
स्थायि भावों में प्रयुक्त होने वाली दृष्टियाँ हैं—स्निग्धा, हृष्टा, दीना,
दृप्ता, भयान्विता, जुगुप्सिता तथा विस्मिता ॥ ३६ ॥
शून्या च मलिना चैव श्रान्ता लज्जान्विता तथा ।
ग्लाना च शङ्किता चैव विषण्णा मुकुला तथा ॥ ४० ॥
कुञ्चिता चाभितप्ता² च जिह्मा सल्ललिता तथा ।
वितर्किताऽर्धमुकुला विभ्रान्ता विप्लुता तथा ॥ ४१ ॥
आकेकरा विकोशा च त्रस्ता³ च मदिरा तथा ।
षट्त्रिंशद् दृष्टयो ह्येता नामतोऽभिहिता मया⁴ ॥ ४२ ॥
संचारी भावों में उपयोगी दृष्टियाँ ये हैं :—शून्या, मलिना, श्रान्ता,
लज्जान्विता, ग्लाना, शंकिता, विषण्णा, मुकुला, कुंचिता, अभितप्ता, जिह्मा,
ललिता, वितर्किता, अर्धमुकुला, विभ्रान्ता, विप्लुता, आकेकरा, विकोशा,
त्रस्ता तथा मदिरा । इस प्रकार सभी मिलाकर ये दृष्टियाँ ३६ हो जाती
हैं, जिनके मैंने नाम यहाँ बतलाए हैं ॥ ४०-४२ ॥
अस्य दृष्टिविधानस्य नानाभावरसाश्रयम् ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि यथाकर्मप्रयोगतः ॥ ४३ ॥
अब मैं इन दृष्टियों के अनेक रस तथा भावों के आश्रित (अभिव्यंजक)
कर्म तथा प्रयोगों के अनुसार लक्षण बतलाता हूँ ॥ ४३ ॥
रसाभिव्यंजक दृष्टियाँ (लक्षण एवं प्रयोग)—
हर्षप्रसादजनिता⁵ कान्तात्यर्थं समन्मथा ।
सभ्रूक्षेपकटाक्षा च शृङ्गारे दृष्टिरिष्यते ॥ ४४ ॥
जब अतिशय स्नेह (राग) में आविष्ट व्यक्ति भौंहें और कटाक्षपूर्ण
१. दम्भा—ख० । २. साभिमाना—ख०, ग० । ३. त्रस्ताथ—ग० ।
४. स्तासु नाट्यं प्रतिष्ठितम्—क०। ५. जनितकोपामर्ष—ख० ।