नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 132, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंमधुर गन्ध तथा स्पर्श से होने वाले आनन्द में 'अर्धमुकुला' की और
आवेग, संभ्रम तथा विश्रम में 'विभ्रान्ता' दृष्टि की योजना की जाए ॥९१॥
विप्लुता चापलो^१न्माददुःखार्त्तिमरणादिषु ।
आकेकरा दुरालोके विच्छेदेप्रो^२क्षितेषु च ॥ ९२ ॥
चपलता, उन्माद, दुःख, मानसिक व्यथा तथा मरण आदि में
'विप्लुता' की, दूरी के कारण न दिखलाई देने वाले पदार्थ, वियोग तथा
प्रोक्षण से संस्कृत वस्तु में 'आकेकरा' दृष्टि की योजना करना चाहिए ॥९२॥
विबोधगर्वामर्षौग्र्यमतिषु स्याद् विको^३शिता ।
त्रस्ता त्रासे भवेद्दृष्टिः मदिरा च मदेष्विति ॥ ९३ ॥
विबोध, मति, गर्व, अमर्ष, उग्रता तथा मति में 'विकोशिता' (दृष्टि)
की त्रास में 'त्रस्ता' की तथा मद में 'मदिरा' दृष्टि की योजना करनी
चाहिए ॥ ९३ ॥
षट्त्रिंशद्दृष्टयो ह्येता यथावत् समुदाहृताः ।
रसजानां तु दृष्टीनां भावजानां तथैव च ॥ ९४ ॥
तारापुटभ्रुवां कर्म गदतो मे निबोधत ।
इस प्रकार मैंने इन छत्तीस प्रकार की दृष्टियों का उचित प्रकार से
वर्णन कर दिया। अब रस तथा भाव में होने वाले पुतलियों, पलकों तथा
भौंहों के कार्य बतलाता हूँ ॥ ९४-९५ ॥
पुतलियों के कार्य (तारा-कर्म)—
भ्रमणं वलनं पातश्चलनं सम्प्रवेशनम् ॥ ९५ ॥
विवर्त्तनं समुद्वृत्तं निष्क्रामः प्राकृतं तथा ।
ए^४तानि नवकर्माणि ताराकर्म द्विजोत्तमाः ॥ ९६ ॥
पुतलियों के नव कार्य होते हैं—(१) भ्रमण (२) वलन (३)
पात (४) चलन (५) सम्प्रवेशन (६) विवर्तन (७) समुद्वृत्त (८)
निष्क्राम तथा (९) प्राकृत ॥ ९५-९६ ॥
शृणुध्वं लक्षणं तावत् साम्प्रतं प्रीतितः स्फुटम् ।
पुटा^५न्तर्मण्डलावृत्तिस्तारयोर्भ्रमणं स्मृतम् ॥ ९७ ॥
१. च चलोन्माद—क०, चापलो—ख० । २. विच्छेदे प्रेक्षितेषु—ख, ग० ।
३. द्विकासिता—ख० । ४. पद्यार्धमेतत् ख–ग–पुस्तकयोर्नास्ति ।
५. पर्यन्तमण्डला—क०, पर्यस्तं—ग० ।