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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 668 में से

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पृष्ठ 138

अष्टमोऽध्यायः २७
[ स्त्रीपुरुषयोश्च संल्लापे नानावस्थान्तरात्मके । ]
मोट्टायिते कुट्टमिते तथा च किलकिञ्चिते ।
निकुञ्चितञ्च कर्तव्यं नृत्ते योज्यन्तु रेचितम् ॥ १२६ ॥
अनाविद्धेषु भावेषु कुर्यात्¹ स्वाभाविकं तथा ।
इत्येवं तु भ्रुवोः प्रोक्तं² नासाकर्म निबोधत ॥ १२७ ॥
( अनेक अवस्थाओं तथा भावों से पूर्ण स्त्री तथा पुरुषों के संलापों में
तथा ) मोट्टायित, कुट्टमित और किलकिंचित में 'कुंचित' का प्रयोग करना
चाहिए। नृत में 'रेचित' का तथा अन्य सामान्य भावों में 'सहज' का
प्रयोग करना चाहिए । इस प्रकार मैंने 'भ्रुकुटी' का कर्म बतलाया । अब मैं
नासिका का कर्म बतलाता हूँ ॥ १२६-१२७ ॥
नासा-कर्म ( लक्षण ) :—
नता मन्दा विकृष्टा च सोच्छ्वासाथ विकूणिता ।
स्वाभाविका चेति बुधैः षड्विधा नासिका स्मृता ॥ १२८ ॥
नता मुहुः श्लिष्टपुटा मन्दा तु निभृता स्मृता ।
विकृष्टा फुल्लितपुटा सोच्छ्वासाकृष्टमारुता ॥ १२९ ॥
विकूणिता सङ्कुचिता समा स्वाभाविकी स्मृता ।
नासिका लक्षणं ह्येतद्विनियोगं निबोधत ॥ १३० ॥
ये नासाकर्म छः प्रकार का होता है—( १ ) नता ( २ ) मन्दा ( ३ )
विकृष्टा ( ४ ) सोच्छ्वासा ( ५ ) विकूणिता तथा ( ६ ) स्वाभाविका ।
बार-बार यदि नासापुट मिलते हों ( चपटे हो जाएँ ) तो 'नता', यदि
नासापुट स्थिर हों तो 'मन्दा', यदि नासापुट फूले हों तो 'विकृष्टा', सांस
नासापुटों में खींचा जाए तो 'सोच्छ्वासा' यदि नासापुट सिकुड़े हों तो
'विकूणिता' तथा सहज भाव में नासापुट रहने पर 'समा' दशा होती है ।
मैंने ये नासिका के लक्षण बतलाए अब मैं इनकी योजना बतलाता
हूँ ॥ १२८-१३० ॥
१. विद्यात्—ख-ग० । २. प्रोक्ता—ख-ग० ।
३. विघूर्णिता—ख० ग० । ४. विकृष्टोत्फुल्लित—ख-ग० ।
५. विघूर्णिता—ख-ग० । ६. स्वाभाविका—ख-ग० ।