नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः २९
कपोल कर्म के छः प्रकार हैं:—यथा—(१) क्षाम, (२) फुल्ल,
(३) पूर्ण, (४) कम्पित, (५) कुंचित तथा (६) सम । अब मैं इनके
लक्षणों को बतलाता हूँ ।
अवनत या बैठे हुए कपोल हों तो 'क्षाम', फूले या भरे हुए कपोल
'विकसित', उन्नत या ऊँचे उठे हुए कपोल 'पूर्ण', कम्पित या धूजते हुए
कपोल 'कम्पित', सिकुड़े हुए कपोल 'कुंचित' तथा स्वाभाविक दशा में स्थित
कपोल 'सम' कहलाते हैं ॥ १३४-१३६ ॥
योजना—
गण्डयोर्लक्षणं प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ।
क्षामं दुःखेषु कर्तव्यं प्रहर्षे फुल्लमेव च ॥ १३७ ॥
१पूर्णमुत्साहगर्वेषु रोषहर्षेषु कम्पितम् ।
कुञ्चितञ्च सरोमाञ्चं २स्पर्शं शीते भये ज्वरे ॥ १३८ ॥
प्राकृतं शेषभावेषु गण्डकर्म भवेदिति ।
इस प्रकार मैने कपोलों के लक्षण वर्णन किये अब मैं इनकी योजना
बतलाता हूँ । दुःख में 'क्षाम' की, हर्ष में 'फुल्ल' की, उत्साह तथा गर्व में
'पूर्ण' की, रोष तथा हर्ष में 'कम्पित' की, रोमांच, स्पर्श, शीत, भय तथा
ज्वर में 'कुंचित' की तथा शेषभावों में 'सम' कपोल की योजना करनी
चाहिए ॥ १३७-१३८ ॥
अधरोष्ठ कर्म-लक्षण—
विवर्त्तनं कम्पनञ्च विसर्गो विनिगूहनम् ॥ १३९ ॥
सन्दष्टकं समुद्गञ्च षट्कर्माण्यधरस्य तु ।
विकू॑णनं विवर्त्तस्तु वेपनं कम्पनं स्मृतम् ॥ १४० ॥
विनिष्कामो विसर्गस्तु प्रवेशो विनिगूहनम् ।
सन्दष्टकं द्विजैर्दष्टं समुद्गः सहितोद्गतिः ॥ १४१ ॥
इत्योष्ठलक्षणं प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ।
अधरोष्ठ कर्म के छः प्रकार हैं—(१) विवर्तन, (२) कंपन, (३)
विसर्ग, (४) विनिगूहन, (५) सन्दष्टक तथा (६) समुद्गक ।
१. घूर्ण—क० । २. कम्पे—ख० ।
३. विवर्त्तने—ग० । ४. विधूर्णनं—ख० ।
५. सन्दष्टको द्विजैर्दष्टः—ख-ग० । ६. समुद्गः सहजोन्नतिः—क० ।