नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ नाट्यशास्त्रम्
पुतलियाँ स्थिर हों तो आनन्द-जन्य अश्रुओं से पूर्ण ऐसी दृष्टि 'स्निग्धा'
कहलाती है। इसका 'रति' नामक स्थायी भाव में प्रयोग करना चाहिए ॥
चला हसितगर्भा च विशत्तोरानिमेषिणी ।
किञ्चिदाकुञ्चिता हृष्टा दृष्टिर्हासे प्रकीर्तिता ॥ ५४ ॥
जिसमें दृष्टि घूमने वाली (चंचल) हो, पलकें थोड़ी सी लगती हुई
रहें और जिसकी पुतलियाँ पूर्णरूप से देखने योग्य न रह गई हों, पलक
गिरती न हों तथा वे थोड़ी सिकुड़ी हुई हो तो ऐसी 'हृष्टा' दृष्टि कहलाती
है। यह 'हास' नामक स्थायीभाव में प्रयुक्त होती है ॥ ५४ ॥
अर्धस्रस्तोत्तरपुटा ३किञ्चित्संरब्धतारका ।
मन्दसञ्चारिणी दीना सा शोके दृष्टिरिष्यते ॥ ५५ ॥
जिस (दृष्टि) में ऊपरी पलक थोड़ी झुकी रहें, पुतलियाँ (थोड़ी)
रुकी (ढंकी) हुई रहें और जिसका हलन-चलन मन्द गति से हो रहा हो तो
उसे 'दीना' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'शोक' स्थायीभाव में किया जाए ॥
रूक्षा स्थिरोद्वृत्तपुटा निष्पन्दोद्वृत्ततारका ।
कुटिलैर्भ्रुकुटी दृष्टिः क्रुद्धा क्रोधे विधीयते ॥ ५६ ॥
जो दृष्टि रूखी हो जिसमें पलकें ऊपर की ओर तथा गतिहीन हो पुत-
लियाँ ऊपर की ओर घूमने वाली तथा स्थिर हों और भ्रुकुटी टेढ़ी हो तो
उसे 'क्रुद्धा' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'क्रोध' स्थायीभाव में किया जाए ॥
संस्थिते तारके यस्याः स्थिराँ विकसिता तथा ।
सत्त्वमुद्गिरती दृप्ता दृष्टिरुत्साहसम्भवा ॥ ५७ ॥
जिस दृष्टि में आंखे स्थिर और पूरी तरह फैली हो, पुतलियाँ स्तब्ध
हों तथा जिससे सत्व प्रकट हो रहा तो उसे 'दृप्ता' दृष्टि जानो। इसका
प्रयोग 'उत्साह' स्थायी भाव में किया जाए ॥ ५७ ॥
विस्फारितोभयपुटा भयकम्पिततारका ।
निष्क्रान्तमध्या दृष्टिस्तु भयभावे भयान्विता ॥ ५८ ॥
जिसमें आँखों की पुट पूरी तरह फैली हों, पुतलियाँ भय से काँप रही
१. विशत्ताराभिलाषिणी—ख०; विश्वतारानिमेषिणी—ग० ।
२. अर्धस्रस्तो—ख०; ईषत्तस्रस्तो—ग० ।
३. रुद्धतारा जलाविला—क–ख० ।
४. रुच्यते—क० । ५. कुटिला—ग० । ६. स्थिता—ग०