सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

२६ नाट्यशास्त्रम्
इनके लक्षण इस प्रकार हैं—भ्रुकुटियों का एक साथ या क्रमशः ऊपर
चढ़ाना 'उत्क्षेप', इसी क्रम से ( उनका ) नीचे उतारता 'पातन', भ्रुकुटी
के ( दोनों ) मूलों को एक साथ ऊपर चढ़ाना 'भ्रुकुटी', दोनों भ्रुकुटियों
की थोड़े हलन चलन के द्वारा मधुरता तथा विस्तार को 'चतुर', भ्रुकुटियों
का क्रमशः धीरे धीरे या ( दोनों को ) एक साथ पास पास झुकाना (लाना)
'कुंचित', एक भ्रुकुटी को लालित्य पूर्ण ढंग से ऊपर की ओर उठाना
'रेचित' तथा भ्रुकुटियों का अपनी स्वाभाविक दशा में होने वाला कर्म
'सहज' कहलाता है ॥ ११८-१२१ ॥
भ्रुकुटी-कर्म की ( अभिनय ) योजना—
अथैषां सम्प्रवक्ष्यामि रसभावप्रयोजनम् ।
कोपे वितर्के हेलायां लीलादौ सहजे तथा ॥ १२२ ॥
दर्शने श्रवणे चैव भ्रू वमेकां समुत्क्षिपेत् ।
उत्क्षेपो विस्मये हर्षे रोषे चैव द्वयोरपि ॥ १२३ ॥
असूयिते जुगुप्सायां हासे घ्राणे च पातनम् ।
क्रोधस्थानेषु दीप्तेषु योजयेद् भ्रुकुटीं बुधः ॥ १२४ ॥
शृङ्गारे ललिते सौम्ये सुखस्पर्शे प्रबोधने ।
एवं विधेषु भावेषु चतुरन्तु प्रयोजयेत् ॥ १२५ ॥
अब मैं इनकी रस तथा भावों में योजना बतलाता हूँ :—
क्रोध, वितर्क, हेला, लीला, सहज अवलोकन तथा श्रवण की दशा में
एक भ्रुकुटी को ऊपर की ओर उठाकर तथा विस्मय, हर्ष और रोष की दशा
में दोनों भ्रुकुटी को ऊपर उठाकर 'उत्क्षेप' की योजना की जाए । असूया,
जुगुप्सा, हास तथा सुगन्धित पदार्थ के सूंघने की दशा में 'पातन' की
योजना होती है। क्रोध के विषय तथा दीप्त प्रदेश में 'भ्रुकुटी' की योजना
होती है। शृङ्गार, ललित, सौम्य वस्तु तथा स्पर्श और प्रबोध ( जागना )
भाव में तथा इसी प्रकार के अन्य भावों में 'चतुर' की योजना
की जाए ॥ १२२-१२५ ॥
१. उत्क्षेते—ग० । २. असूयितजुगुप्सायां—ख०; आसूयित—ग० ।
३. स्पर्शे च चतुरं भवेत्—ख—ग ।
४. पद्यार्धमेतत् ख-ग-पुस्तकयोर्नास्ति ।