नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ नाट्यशास्त्रम्
वलनं गमनं त्र्यश्रं पातनं स्रस्तता तथा।
चलनं कम्पनं ज्ञेयः प्रवेशोऽन्तः प्रवेशनम् ॥ ९८ ॥
विवर्तनं कटाक्षस्तु समुद्वृत्तं समुन्नतिः ।
निष्कामो निर्गमः प्रोक्तः प्राकृतन्तु स्वभावजम् ॥ ९९ ॥
हे मुनियों, पुतलियों के कार्य के ये ९ प्रकार हैं। अब प्रीति पूर्वक
इनके स्फुट लक्षण सुनिये—
पलकों में पुतलियों के गोल घुमाव को 'भ्रमण,' पुतली को तिरछा ले
जाना 'वलन' पुतली का ऊपर से (सीधा) नीचे आना 'पात,' पुतली का
दोनों ओर बराबर घूमना (हिलना) 'चलन,' पुतली का अन्दर खिंचना
या जाना 'सम्प्रवेशन,' एक कोने में पुतली ले जाकर कटाक्षपूर्ण देखना
'विवर्तन,' पुतलियों का फैलाव लेते हुए ऊपर की ओर उठना 'समुद्वृत्त,'
बाहर की ओर पुतलियों का धकेलना 'निष्काम' तथा पुतलियों का अपनी
स्वाभाविक अवस्था में रहना 'प्राकृत' (कर्म) कहलाता है ॥ ९७-९९)
ताराकर्म की अभिनय योजना—
अथै²षां रसभावेषु विनियोगं निबोधत ।
भ्रमणं वल³नोद्वृत्ते निष्कामो वीररौद्रयोः ॥ १०० ॥
निष्क्रामणं सं⁴वलनं कर्त्तव्यं हि भयानके ।
हास्यबीभत्सयोश्चापि प्रवेशनमिहेष्यते ॥ १०१ ॥
पातनं करुणे कार्यं निष्क्रामणमथाद्भुते ।
प्राकृतं शेषभावेषु शृङ्गारे च विवर्त्तितम् ॥ १०२ ॥
स्वभावसिद्धमेवैतत् कर्म लोकक्रियाश्रयम् ।
एवं रसे⁵षु भावेषु ताराकर्माणि योजयेत् ॥ १०३ ॥
अब मैं इनकी रस तथा भावों में की जानेवाली योजना बतलाता हूँ—
भ्रमण, वलन, उद्भृत तथा निष्काम की वीर तथा रौद्र रस में, निष्काम तथा
वलन की भयानक रस में, प्रवेशन की हास्य तथा बीभत्स में, पातन की करुण
में, निष्काम की अद्भुत में, प्राकृत की अवशिष्ट भावों में तथा शृङ्गार रस
में विवर्तित की योजना की जाए । ये पुतलियों के स्वाभाविक तथा लोक-
१. चलनं—ख-ग० । २ तथैषां—ग० । ३. चलनो—ग० ।
४. सचलनं—क०, सञ्चलनं—ख०, संवलनं-ग० ।
५. सर्वेषु—ग० ।