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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 668 में से

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पृष्ठ 129

१८ नाट्यशास्त्रम्
वितर्कोद्धर्तितपुटा तथैवोत्फुल्लतारका ।
अधोभागंविचारा च दृष्टिरेषा वितर्किता ॥ ७४ ॥
जिसमें अटकल ( या तर्क ) के कारण पलकें उपर उठी हुई हों और
पुतलियां खिली हुई तथा नीचे की ओर हिलने वाली हों तो उसे
‘वितर्किता’ दृष्टि जानो ॥ ७४ ॥
अर्धव्याकोशपक्ष्मा च ह्लादार्धमुकुलैः पुटैः ।
स्मृतार्धमुकुला दृष्टिः किञ्चिल्लुलिततारका ॥ ७५ ॥
जिसमें बरौनियां आधी खिली हों ( या खुली हों ), पलकें भी आधी
खिली (या खुली) हुई हों तथा पुतलियाँ (जिसमें) पूर्ण रूप में खिली हुई एवं
नीचे की ओर घूमती हुई रहती हों तो उसे ‘अर्धमुकुला’ दृष्टि जानो ॥७५॥
विभ्रान्ततारका या तु विभ्रान्तपुटदर्शना ।
विस्तीर्णोत्फुल्लनेत्रौ च विभ्रान्ता दृष्टिरिष्यते ॥ ७६ ॥
जिसमें पुतलियाँ तथा पलकें घूमती हुई रहें और आंखें पूर्ण रूप से
खिली तथा फैली हुई हों तो उसे ‘विभ्रान्ता’ दृष्टि जानो ॥ ७६ ॥
पुटौ प्रस्फुरितौ र्यस्या निष्टब्धौ पतितौ पुनः ।
विप्लुतोद्वृत्ततारा च दृष्टिरेषा तु विप्लुता ॥ ७७ ॥
( पहिले ) जिसमें ( दोनों ) पलकें धूजें और फिर स्थिर हो जाएं तथा
पुतलियाँ विघ्न के कारण ऊपर की ओर फड़कती रहें तो उसे ‘विप्लुता’
दृष्टि जानो ॥ ७७ ॥
आकुञ्चितपुटापाङ्गा सङ्गतार्धनिमेषिणी ।
मुहुर्व्यावृत्ततारा च दृष्टिराकेकरा स्मृता ॥ ७८ ॥
जिसमें पलकें और आँखों के कोने थोड़े सिकुड़े हुए, एक दूसरे से मिले
हुए और आधे खुले हुए हों और पुतलियाँ बार बार गोल घुमाव लेते हुए
रहती हों तो उसे ‘आकेकरा’ दृष्टि जानो ॥ ७८ ॥
विकोशितोभयपुटा प्रोत्फुल्ला चानिमेषिणी ।
अनवस्थिततारा च विकोशा दृष्टिरिष्यते ॥ ७९ ॥
जिसमें दोनों पलकें फैली हुई, खिली हुई तथा न गिरने वाली हों और
पुतलियाँ अव्यवस्थितगतिशील हों तो उसे ‘विकोशा’ दृष्टि जानो ॥७९॥
१. अधोमुख विरा च—क०, अधोगत—ख० ग० । २. दृष्टिरिष्टा—ग० ।
३. तारा—ग० । ४. अनवस्थिततारा च विभ्रान्ताकुलदर्शना—क—ख० ।
५. नयना—क,-मध्या—ख० । ६. यस्य—क० । ७. रुच्यते—ग० ।