नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः १७
कोने न खुलते और न बन्द होते हों और पुतलियां कुछ स्थिर हों तो
उसे ‘विषादिनी’ दृष्टि जानो ॥ ६८ ॥
स्फुरदाश्लिष्टपक्ष्मार्धा मुकुलोर्ध्वपुटाञ्चिता ।
सुखोन्मीलिततारा^२ च मुकुला दृष्टिरिष्यते ॥ ६९ ॥
जिसमें बरौनियां कुछ कुछ धूजती तथा ( परस्पर ) मिली हुई रहें,
ऊपरी पलकें कलियों जैसी अधखुली हों तथा पुतलियां हर्ष के कारण फैली
हों ( या खिली हों ) तो उसे ‘मुकुला’ दृष्टि जानो ॥ ६९ ॥
या निकुञ्चित^३पक्ष्माग्रा पुटैराकुञ्चितैस्तथा ।
सं^४न्निकुञ्चिततारा च कुञ्चिता दृष्टिरिष्यते ॥ ७० ॥
सिकुड़ी पलकों के कारण जिसकी बरौनियों की नोके झुकी हुई हों और
पुतलियाँ भी (इसी कारण) जिसमें सिकुड़ी हुई रहें तो उसे ‘कुञ्चिता’ दृष्टि
जानो ॥ ७० ॥
मन्दायमानतारा या पुटैः प्रचलितैस्तथा ।
सन्तापोपप्लुता दृष्टिरभितप्ता तु सव्यथा ॥ ७१ ॥
पलकों के हिलने से जिसमें पुतलियां धीरे धीरे घूमती रहती हों तथा
( इस प्रकार ) जो अतिशय दुर्गति और विघ्न को स्वतः प्रदर्शित करती
हो तो ऐसी दृष्टि को ‘अभितप्ता’ जानो ॥ ७१ ॥
लम्बिता कुञ्चितपुटा शनैस्तिर्यङ्^५निरीक्षणैः ।
गूढा^६ऽचकिततारा च जिह्मा दृष्टिरुदाहृता ॥ ७२ ॥
जिसमें पलकें झुकी तथा थोड़ी सिकुड़ी हुई हों, तिरछी चितवन हो,
पुतलियां गूढ़ हों तथा दृष्टि भी ( जिसके कारण गूढ़ हो ) तो उसे
‘जिह्मा’ दृष्टि जानो ॥ ७२ ॥
मधुरा कुञ्चितान्ता च सभ्रूक्षेपा^७ च सस्मिता ।
समन्मथविकारा च दृष्टिः सा^८ ललिता स्मृता ॥ ७३ ॥
जिसका अवलोकन कार्य मधुरता लिये हो, पलकों के कोने सिकुड़े हुए
हों और जो ( दृष्टि ) खिलती हुई भौंहो की हलन चलन द्वारा कामजन्य
विकारों को अभिव्यक्त करने वाली हो तो उसे ‘ललिता’ दृष्टि जानो ॥७३॥
१. स्फुरिताश्लिष्ट—ग० । २. सुखामीलित-क; सुखी मीलित—ख० ।
३. आनिकुञ्चित क, —ख० । ४. सन्नाकुञ्चित—क० ।
५. निरीक्षणी—ख० । ६. निगूढ़ा गूढ़तारा च क०—ख० ।
७. क्षेपाथ—ग० । ८. च—ख० ।
२ ना० शा० द्वि०