नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः १५
हों और जो बीच के स्थान से थोड़ी हटकर रखी जाए तो वह 'भयान्विता'
दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'भय' नामक स्थायी भाव में किया जाए ॥५८॥
सङ्कोचितपुटाध्यामा दृष्टिर्मीलिततारका।
लक्ष्योद्देशात् समुद्विग्ना जुगुप्सायां जुगुप्सिता ॥ ५९ ॥
जिसमें पलकें सिकुड़ी और परस्पर न मिलती हों, पुतलियाँ घूमती हों
और वे (दृष्टि में आने वाले) लक्ष्य से लौटने वाली रखी जाए तो उसे
'जुगुप्सिता' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'जुगुप्सा' स्थायी भाव में किया जाए ॥
भृशमुद्वृत्ततारात्र नैष्ठोभयपुटाञ्चिता ।
समा विकसिता दृष्टिर्विस्मिता विस्मये स्मृता ॥ ६० ॥
जो बराबर खुली (या फैली) हुई हो, जिसमें पुतलियाँ ऊपर की ओर
घुमाव लेती हुई और पलके स्थिर हों तो 'विस्मिता' दृष्टि जानो। इसका
प्रयोग 'विस्मय' स्थायी भाव में किया जाए ॥ ६० ॥
स्थायिभावाश्रया ह्येता विज्ञेया दृष्टयो बुधैः।
सञ्चारिणीनां दृष्टीनां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ६१ ॥
ये दृष्टियाँ स्थायी भावों की हैं। अब संचारी भावों में होने वाली
दृष्टियों के लक्षण बतलाता हूँ ॥ ६१ ॥
संचारी भावों की अभिव्यंजक दृष्टियाँ—
समतारा समपुटा निष्कम्पा शून्यदर्शना।
बाह्यार्थाग्राहिणी क्षामा शून्या दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६२ ॥
जो क्षीण तथा स्थिर दृष्टि हो जिसमें पुतलियां और पलकें सम हों
और अपने स्थान पर ही लौटने वाली होकर जो किसी भी बाह्य-पदार्थ को
ग्रहण न करें तो उसे 'शून्या' दृष्टि जानो ॥ ६२ ॥
प्रस्पन्दमानपक्ष्मौन्ता नात्यर्थमुकुलैः पुटैः ।
मलिनान्ता च मलिना दृष्टिर्विह्वंततारका ॥ ६३ ॥
जिसकी बरौनियां घूजती हों, जिसमें पलकें अतिशय सिकुड़ी हुई न
१. पुटश्यामा—क, पुटन्यासा—ख०, ग० । २. पक्ष्मोद्देशात् ग० ।
३. विमलोद्वृत्त—ग० । ४. दृष्टोभय—ख०-ग० ।
५. दृष्टयो लक्षिता मया—ख० । ६. बाह्यार्थग्राहिणी ख-ग० ।
७. ध्यामा—क० श्यामा—ख० । ८. प्रस्यन्दमान—ख-ग० ।
९. पक्ष्मा या—क० पक्ष्माग्रा—क० । १०. विभ्रान्त—क; विस्मित—ख-ग० ।