नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ नाट्यशास्त्रम्
रहें, आँखों के कोने मलिनता लिए हों और जिसमें पुतलियां घूमती न रहें
( विहततारका ) तो उसे 'मलिना' दृष्टि जानो ॥ ६३ ॥
श्रमात्¹ प्रम्लापितपुटा ²क्षामान्ताञ्चितलोचना ।
स्रस्ता पतिततारा च श्रान्ता दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६५ ॥
श्रम के कारण जिसकी पलकें म्लान हो गई हों, आंखों के कोने सिकुड़
गए हों, दृष्टि निर्बल हो (जिसकी) पुतलियां नीचे झुकी हों, तो उसे
'श्रान्ता' दृष्टि कहते हैं ॥ ६४ ॥
किञ्चिदञ्चितपक्ष्मग्रा पतितोर्ध्वपुटक्रिया ।
त्रपाधोगततारा च दृष्टिर्लज्जान्विता तु सा ॥ ६५ ॥
जिसमें बरौनियों के अग्र भाग थोड़े झुके रहें, भीरुता से उपरी पलकें
नीचे की ओर हों और पुतलियां लज्जा से झुकी हों तो उसे 'लज्जान्विता'
दृष्टि जानो ॥ ६५ ॥
म्लानभ्रूपुटपक्ष्मा⁵ या शिथिला मन्दचारिणी ।
क्लमप्र⁷विष्टतारा च ग्लाना दृष्टिस्तु सा स्मृता ॥ ६६ ॥
जिसमें भौंहें, पलकें तथा बरौनियां म्लान हों, धीरे धीरे घूमती हों
और पुतलियां श्रम के कारण पलकों में ढँकी रहें तो उसे 'ग्लाना' दृष्टि
जानो ॥ ६६ ॥
किञ्चिच्चला स्थिरा किञ्चिदुद्वृत्ता⁸ तिर्यगायता ।
गूढा⁹ चकिततारा च शङ्किता दृष्टिरिष्यते ॥ ६७ ॥
जो दृष्टि कभी हिलती हो कभी स्थिर रहती हो कभी ऊपर कभी
तिरछी और कभी विस्तृत फैली हो, जो कभी गूढ़ हो जाए और जिसमें
पुतलियां भयभीत (या चकित) लगती हों तो उसे 'शंकिता' दृष्टि जानो ॥
विषादविस्तीर्णपुटा पर्यस्तं१०न्ता निमेषिणी ।
किञ्चित्स्निग्धतारा च कार्या दृष्टिर्विषादिनी ॥ ६८ ॥
जो दृष्टि व्यग्र हो, जिसमें विषाद के कारण पलकें फैली हों, नेत्रों के
१. श्रमप्रम्लायित-क, श्रमप्रम्ला-ख-ग० । २. क्षामाका-ख० ।
३. पतितोध्र्वंपुटा ह्रिया-ग० ४. त्रपाधोमुख-ग० ।
५. ग्लान-ग० । ६. च-ग० ।
७. क्रमप्रदृष्ट-क; क्लमप्रवृष्ट-ग० । ८. उत्तुङ्गा-क०, दुन्नता-ख० ।
९. मूढा-क । १०. पर्यस्तारा-ग० ।