नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रियाओं के आश्रित रहने वाले कार्य हैं। इनकी इसी विधि से रस तथा
भावों में संयोजना की जाए ॥ १००-१०३ ॥
दर्शन (अवलोकन) के विविध प्रकार—
अथात्रैव प्रवक्ष्यामि प्रकारान् दर्शनस्य तु ।
समं साच्यनुवृत्ते च ह्यालोकितविलोकिते ॥ १०४ ॥
प्रलोकितोल्लोकिते चाप्यवलोकितमेव च ।
समतारश्च सौम्यश्च यद् दृष्टं तत्समं स्मृतम् ॥ १०५ ॥
पक्ष्मान्तर्गततारं यत् त्र्यश्रं साचीकृतन्तु तत् ।
रूपनिर्वर्णनायुक्तमनुवृत्तमिति स्मृतम् ॥ १०६ ॥
सहसा दर्शनं यत् स्यात् तदालोकितमुच्यते ।
विलोकितं पृष्ठतस्तु पार्श्वाभ्यान्तु प्रलोकितम् ॥ १०७ ॥
ऊर्ध्वमुल्लोकितं ज्ञेयमवलोकितमप्यधः ।
इत्येष दर्शनविधिः सर्वभावरसाश्रयः ॥ १०८ ॥
अब मैं इन्हीं से सम्बद्ध दर्शन के (विभिन्न) प्रकारों को बतलाता
हूँ। ये आठ होते हैं—(१) सम, (२) साची (३) अनुवृत्त (४) आलोकित
(५) विलोकित (६) प्रलोकित (७) उल्लोकित तथा (८) अवलोकित ।
इनके क्रमशः लक्षण इस प्रकार हैं :—
जिसमें पुतलियां समान तथा सौम्य (विश्रामयुक्त या किसी विशेष
भाव से रहित) हों तो उसे 'सम', जिसमें पुतलियाँ पलकों के अन्दर
दबकर तिरछी हो जाए तो 'साची', चारों ओर किसी भी स्वरूप को ध्यान
पूर्वक देखने पर 'अनुवृत्त', सहसा किसी वस्तु का देखना 'आलोकित',
पीछे की ओर देखना 'विलोकित', (क्रमशः) दोनों कोखों की ओर देखना
'प्रलोकित', ऊपर की ओर देखना 'उल्लोकित' तथा नीचे की (भूमि की)
ओर देखना 'अवलोकित' समझना चाहिए। (इस प्रकार) सभी रसों तथा
भावों में होने वाला दर्शन का यह विधान मैंने बतलाया ॥ १०४-१०८ ॥
पुट-कर्म (पलकों के प्रकार)—
तारागतोऽस्यानुगतं पुटकर्म निबोधत ।
उन्मेषश्च निमेषश्च प्रसृतं कुञ्चितं समम् ॥ १०९ ॥
१. तथा तत्रैव वक्ष्यामः प्रकारं—ग० । २. निर्वापणा—ग० ।
३. स्फुटम्—ग० । ४. इत्यष्टौ—क० ।