नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ नाट्यशास्त्रम्
दृष्टि से देखे तो हर्ष और प्रसाद (मनोविनोद) से उद्भूत ऐसी दृष्टि 'कान्ता'
कहलाती है। इसका प्रयोग शृङ्गाररस में किया जाए ॥ ४४ ॥
प्रोद्वृत्तनिष्पन्धपुटा स्फुरदुद्वृत्ततारका।
दृष्टिर्भयानकात्यर्थं भीता ज्ञेया भयानके ॥ ४५ ॥
जिसमें पलकों को ऊपर उठाकर स्थिर कर दिया जाए और पुतलियों
को ऊपर की ओर चमकाते हुए गोल घुमाव दिया जाए तो 'भयानका' दृष्टि
होती है। यह अतिशय भय को सूचित करती है और इसका प्रयोग
'भयानकरस' में किया जाता है ॥ ४५ ॥
क्रमादाकुञ्चितपुटा सविभ्रान्ताल्पतारका।
हास्या दृष्टिस्तु कर्त्तव्या कुहकाभिनयं प्रति ॥ ४६ ॥
'हास्या' दृष्टि में दोनों पलकें क्रमशः सिकुड़ी हुई रहती हैं और ये
पुतलियों के साथ थोड़ी खुली तथा घूमती हुई (विभ्रान्त) रखी जाती
हैं। इसका प्रयोग गुदगुदाने या छू कर हंसाने के प्रदर्शन के अवसर पर
किया जाए ॥ ४६ ॥
पतितोर्ध्वपुटा सास्रा मन्युमन्थरतारका।
नासाग्रानुगता दृष्टिः करुणा करुणे रसे ॥ ४७ ॥
जिसमें दोनों उपरी पलकें नीचे की ओर आ रही हों, क्रोध के कारण
पुतलियाँ धीमी हो गई हों, आँखों से आँसू ढलकते हों तथा नासिका की
नोक पर दृष्टि स्थित हो तो उसे 'करुणा' दृष्टि समझना चाहिए। इसका
'करुणरस' में प्रयोग होता है ॥ ४७ ॥
या त्वाकुञ्चितपक्ष्माग्रा साश्चर्योद्वृत्ततारका।
सौम्या विकसितान्ता च साद्भुता दृष्टिरद्भुते ॥ ४८ ॥
जिस (दृष्टि) में बरौनियाँ नोक पर थोड़ी सिकुड़ी हुई रहें, पुतलियाँ
आश्चर्य से ऊपर की ओर उठी हुई रहें और आँखें खिली हुई दशा को
सुन्दरतापूर्वक प्रदर्शित करें तो उसे 'अद्भुता' दृष्टि जानो। इसे अद्भुत-
रस में प्रयुक्त किया जाए ॥ ४८ ॥
क्रूरा रूक्षारुणोद्वृत्ता निष्पन्धपुटतारका।
भ्रुकुटीकुटिला दृष्टिः रौद्री रौद्ररसे स्मृता ॥ ४९ ॥
१. भयानकेत्यर्थं हीना ज्ञेया भयानका—क०।
२. विभ्रान्ताकुलतारका—ग ३ चकितो, प्रतीतो—क०।
४. रौद्री रौद्रे प्रकीर्तिता—क, रौद्रे रौद्री रसा स्मृता—ग०।