मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
विषय सूची
भूमिका ७
प्रस्तावना ६
राम रक्षास्तोत्र १
मन्त्र रामायण १२
चित्र-नामावली
भूमिका
बहुधा विजया दशमी का पर्व निकट आने पर पत्र पत्रिकाओं में यदा-कदा
रामायण के विभिन्न पात्रों, जैसे श्रीराम, दशरथ, सीता, जनक आदि का वेदों
में उल्लेख होने के विषय पर विद्वानों द्वारा लेख लिखे जाते हैं। परन्तु इस
प्रकार के लेखों से कभी भी यह सिद्ध नहीं हो पाता कि इन नामों का रामायण
के इन्हीं नाम के पात्रों से या रामायण में वर्णित क्रियाकलापों से भी कोई
सम्बन्ध है। फलस्वरूप आधुनिक विद्वान् रामकथा के वेदकत्व को सिद्ध कर
पाने में अब तक असमर्थ ही रहे हैं।
परन्तु यह आश्चर्य की बात है कि अनेक शताब्दियों पूर्व प्रख्यात
भाष्यकार श्री नीलकण्ठ ने इस विषय का अत्यन्त पाण्डित्यपूर्ण समाधान कर
दिया था। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि श्री नीलकण्ठ द्वारा रचित यह
मन्त्र रामायण इतने अधिक वर्षों से अनुपलब्ध थी और आज लोगों को इसका
स्मरण भी नहीं रह गया है। नीलकण्ठ ने ऋग्वेद से १५७ मन्त्रों का चयन
कर उनकी इस प्रकार व्याख्या की है कि उन मन्त्रों से सम्पूर्ण रामकथा व्यक्त
होती है। स्पष्ट है कि नीलकण्ठ अपने तर्कपूर्ण पाण्डित्य के कारण ही इस
कार्य में सफल हुए हैं। व्याख्या में उनके तर्क इतने सटीक हैं कि इस ग्रन्थ को
पढ़ने के बाद रामकथा के वेदकत्व पर सन्देह का लेश भी शेष नहीं रहता।
यहाँ नीलकण्ठ के तर्कों की महत्ता या समीचीनता के विषय में कुछ कहना
मेरी धृष्टता होगी। मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि प्रस्तुत ग्रन्थ में नील-
कण्ठ की ऋग्वेद के मन्त्रों की रामकथा-परक व्याख्या को पढ़कर इसके वेदकत्व
के प्रति कहीं भी सन्देह का स्थान नहीं रह जाता। मुझे पूर्ण विश्वास है कि
आधुनिक विद्वान् इसे पढ़ने के बाद अब अधिक अधिकारपूर्वक रामकथा के
वेदकत्व को सिद्ध करने तथा जहाँ नीलकण्ठ ने विषय को छोड़ा है उसे आगे
बढ़ाने का प्रयास कर सकेंगे।
पुस्तक के सम्पादन में मेरा दो ही योगदान रहा है : (१) मैंने नीलकण्ठ
द्वारा सङ्कलित ऋग्वेद के मन्त्रों का सन्दर्भ संकेत दे दिया है जिससे विद्वान्
उन मन्त्रों को सरलता से खोज सकें। (२) मैंने नीलकण्ठ की व्याख्या के
८ भूमिका
आधार पर ही मन्त्रों का हिन्दी अनुवाद कर दिया है जिससे ग्रन्थ थोड़ा
अधिक बोधगम्य हो गया है।
ग्रन्थ के प्रारम्भ में मेरे विद्वान् मित्र पं० लक्ष्मी नारायण तिवारी ने एक
अत्यन्त गवेषणापूर्ण प्रस्तावना लिखकर ग्रन्थ को वास्तव में शोधकर्त्ताओं के
लिये महत्त्वपूर्ण बना दिया है। उनके इस कार्य के लिये मैं धन्यवाद देकर
औपचारिकता का निर्वाह मात्र नहीं करना चाहता। उन्होंने कितने परिश्रम और
शोध के पश्चात् इसे लिखा है यह इस प्रस्तावना को पढ़कर पाठक स्वयं समझ
सकते हैं। उन्होंने अपने इस लेख से ग्रन्थ की उपयोगिता में अत्यधिक वृद्धि
कर दी है। अतः मैं उनके प्रति अपना हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ
यदि यह ग्रन्थ श्री रामकथा के प्रचार और उसके वेदकत्व को प्रमाणित
करने में विद्वानों की कुछ भी सहायता कर सका तो मैं अपने प्रयास को सफल
मानूँगा ।
रामकुमार राय
प्रस्तावना
राम-कथा ने भारतीय समाज को चिर अतीत से ही अनुप्राणित
किया है। इसकी महिमा वर्णनातीत है। सम्प्रति दूरदर्शन पर रामकथा
प्रदर्शित हो रही है और इसके प्रदर्शन के समय नगरों की सड़कें तथा
गलियाँ वीरान हो जाती हैं, क्योंकि सम्पूर्ण भारतीय समाज दत्तचित्त
से उसे देखने में संलग्न रहता है। इतना ही नहीं, इस कार्य को वह
पूर्ण आदरभाव, भक्ति और निष्ठापूर्वक सम्पन्न करता है। असंख्य नर-
नारी इसे देखने में स्नान करके उपवास रखते हुए ही प्रवृत्त होते हैं।
यह स्थिति आधुनिक युग की है, जिसे सनातन परम्परा में 'कलिकाल'
की संज्ञा प्रदान की गयी है। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है
कि इसके पूर्व इस कथा के प्रति भारतीय जन-मानस की कितनी
आदरयुक्त निष्ठा रही होगी। रामकथा आदिमहाकाव्य, परवर्ती कतिपय
महाकाव्यों एवं अनेक काव्यों का प्रेरणा-स्रोत तो है ही, साथ ही यह
भारतीय परिवार को धर्म-पथ में नियोजित करनेवाली, आचार तथा
विचार की स्थापिका एवं संस्कार-सम्बन्धों की आदर्श-स्वरूपा है और
इस पवित्र देश की चिरन्तन भक्ति, ज्ञान एवं मैत्री भावनाओं का प्रति-
निधित्व सर्वाङ्गीण-रूप में करती है। इस कथा में जो आदर्श चित्रित
हुए हैं, वे मात्र भारतवर्ष के लिये ही मान्य अथवा आदरणीय नहीं हैं,
अपितु वे जगत् के मानव-मात्र के समक्ष उच्च नैतिक स्तर तथा
सामाजिक उदात्त भावना को प्रस्तुत करते हुए उसकी प्रतिष्ठा करते
हैं। यह कथा जीवन के स्थायी मूल्य-युक्त तत्त्वों, तथ्यों तथा सिद्धान्तों
पर आधारित है। इसमें अतीत, वर्तमान तथा अनागत की समस्त
पीढ़ियों को समीचीन रूप से राह दिखाने की क्षमता विद्यमान है, अतः
यह उदात्तता, अर्थ एवं काम की धर्मानुकूलता, विपत्ति-काल में विपत्ति-
ग्रसित व्यक्ति को संरक्षण प्रदानत्त्व, प्रताड़ित मानव की रक्षणीयता
तथा शरणागत को शरण देने आदि महनीय गुणों से संवलित है और
इस प्रकार यह विश्व के शाश्वत मूल्यों से युक्त है।
रामकथा के सर्वोज्ज्वल चरित्र श्रीराम का नाम-श्रवण करने मात्र
१० प्रस्तावना
से उनमें विद्यमान आदर्श गुण हमारे हृदय-पटल पर अङ्कित हो जाते
हैं तथा जनकनन्दिनी सीता का नाम आते ही हमारे समक्ष असाधारण
पातिव्रत्य की एक अप्रतिम प्रतिमा प्रस्तुत हो जाती है और हम
परमानन्द की अवस्था का अनुभव करने लगते हैं। पूरा भारत देश
रामकथा से इतना ओतप्रोत है कि राम तथा सीता हमें अतीत युग के
प्राणिमात्र नहीं लगते, प्रत्युत ऐसा भासित होता है कि वर्तमान में भी
उनका अपूर्व व्यक्तित्व हमारे नेत्रों के समक्ष उपस्थित है, जिसे आदर्श
मानते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं। रामकथा के प्रतिनिधिभूत ग्रन्थ
वाल्मीकि-रामायण की सर्वाङ्गीणता की ओर सङ्केत करके कवीन्द्र
रवीन्द्रनाथ ने इस कथा के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए ही यह
कहा था कि इसकी प्रधान विशेषता यही है कि इसमें गृहस्थ जीवन-
चर्या का वर्णन विस्तृत रूप से प्राप्त होता है। पिता-पुत्र, भाई-भाई,
पति-पत्नी आदि में जो धर्म तथा समाज के सूत्र एवं प्रेम तथा भक्ति से
युक्त सम्बन्धादि हैं, उनको उजागर करते हुए 'रामायण' ने इतना
महान बना दिया है कि वह सहज-रूप में महाकाव्य के उपयुक्त हो
गया है। हिमालय सदृश उच्च और व्यापक आदर्शों तथा सागर सदृश
गम्भीर विचारों का एक साथ किसी एक ग्रन्थ में समावेश हो पाया है
तो वह 'रामायण' ही है। अपने इन्हीं मौलिक वैशिष्ट्यों के कारण देश
तथा काल की सीमाओं को छोड़कर 'रामायण' आज विश्व साहित्य की
महान् कृति है एवं महामुनि वाल्मीकि विश्वकवि के रूप में सर्वत्र पूजित
हो रहे हैं।
इन्हीं उदात्त गुणों के कारण रामकथा ने केवल भारत में ही नहीं,
अपितु इसके निकटवर्ती देशों की संस्कृति तथा साहित्य में महत्त्वपूर्ण
स्थान प्राप्त किया है और तिब्बत, खोतन, हिन्दोनेशिया, हिन्द-चीन,
थाईलैण्ड एवं बर्मा आदि देशों तक कालान्तर में इसका अनेक रूपों में
प्रचार-प्रसार हुआ है। आधुनिक भारतीय भाषाओं में यह सर्वत्र व्याप्त
है। आर्य भाषाओं के साहित्य में सिहली रामकथा, काश्मीरी रामायण,
असमिया में माधव-कन्दली-रामायण आदि, बंगला में कृत्तिवास-
रामायण आदि, हिन्दी में श्री रामचरितमानसादि, मराठी में भावार्थ-
रामायणादि, गुजराती में रामलीला ना पदो आदि, उर्दू में रामायण
खुश्तर और रामायण मंजूम आदि एवं फारसी में वाल्मीकि रामायण
प्रस्तावना ११
का पद्यानुवाद और रामायण मसीही आदि प्राप्त हैं। इसी प्रकार द्रविड़
भाषाओं में, तमिल में तमिल-रामायण, तेलुगु में द्विपद रामायण आदि,
मलयालम में रामचरितम् आदि तथा कन्नड़ में तोर वे रामायण आदि
विद्यमान हैं। आदिवासी भाषा-भाषियों की कथाओं में भी रामकथा
अनेक रूपों में प्राप्त होती है। इस प्रकार रामकथा सम्पूर्ण भारत तथा
इसके निकटवर्ती देशों की संस्कृति तथा साहित्य में पूर्णतया व्याप्त है
और इसी से इसकी व्यापकता तथा महानता के सम्बन्ध में अनुमान
लगाया जा सकता है।
भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक जीवन पर मर्यादा-
पुरुषोत्तम के रूप में राम का अमिट प्रभाव विद्यमान है। हिन्दू-परिवारों
में अतीत से ही अनेक माङ्गलिक अवसरों पर रामचरित से सम्बन्धित
गीत गाये जाते हैं और अन्तिम शरीर-यात्रा भी राम के नामोच्चारण
की ध्वनि के साथ ही पूर्ण होती है। भारत में विद्यमान मन्दिरों के
ऊपर यदि विचार किया जाय तो हम यही पाते हैं कि इस पवित्र देश
के कोने-कोने में राम के मन्दिर हैं तथा यहाँ के असंख्य लोग प्रतिदिन
रामकथा के प्रतिनिधि-भूत ग्रन्थ रामायण का पाठ करते हैं एवं राम
के जीवन से सम्बन्धित अयोध्या, चित्रकूट, पञ्चवटी तथा रामेश्वर
आदि तीर्थों की यात्रा करके अपने को कृतकृत्य मानते हैं। मात्र
हिन्दुओं के ही नहीं अपितु थाईलैण्ड एवं कम्बोडिया तथा हिन्देशिया
आदि सुदूर देशों के व्यक्तियों तथा स्थानों के नाम भी रामकथा से
सम्बन्धित हैं। भगवान् के नामों में भारत में सर्वप्रसिद्ध नाम 'राम' ही
है और यह नाम भारतीय जीवन में रम-सा गया है तथा उससे इसका
एकाकार पूर्णरूपेण स्थापित है। ऐसी स्थिति में तो रामकथा की
ऐतिहासिकता पर किसी प्रकार का प्रश्न उठाने का अवकाश ही नहीं
रह जाता।
फिर भी आधुनिक युग में इस सन्दर्भ में प्रश्न उठाये गये हैं और
पाश्चात्त्य विद्वानों ने अन्य ऐतिहासिक मुद्दों की भाँति इन प्रश्नों का
समाधान भी अपने-अपने अनुसार कर डाला है, यद्यपि सत्य अतीत के
गर्भ में अन्तर्हित है। इस परिप्रेक्ष्य में सर्वप्रथम वैदिक वाङ्मय तथा
रामकथा में क्या कोई सम्बन्ध है, इस प्रश्न को लिया गया है।
रामकथा के अनेक पात्रों आदि के नाम हमें वैदिक साहित्य में
१२ प्रस्तावना
प्राप्त होते हैं। ये इक्ष्वाकु, दशरथ, राम, अश्वपति, जनक तथा सीता
आदि हैं। इन पर संक्षेप में विचार कर लेना समीचीन होगा।
इक्ष्वाकु का उल्लेख ऋग्वेद में एक बार हुआ है— 'यस्येक्ष्वाकुरुप
व्रते रेवान् मराय्येधते' (ऋ० सं० १०।६०।४; ) अर्थात् जिसकी सेवा में
धनवान् प्रतापवान् इक्ष्वाकु की वृद्धि होती है। अथर्ववेद में भी एक
बार इक्ष्वाकु का नाम आया है—'त्वा वेद पूर्वं इक्ष्वाको यम्' (अ० सं०
१९।३६।६ ) अर्थात् तुम जिसे इक्ष्वाकु पूर्वकाल में जानता था। ऋग्वेद
में ही दशरथ का एक बार उल्लेख हुआ है— 'चत्वारिंशद् दशरथस्य
शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति' (ऋ० सं० १।१२६।४); अर्थात् दशरथ के
लाल रंग अथवा भूरे रंग के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का
नेतृत्व करते हैं। अश्वपति कैकेय का वर्णन शतपथब्राह्मण ( १०।६।१।२ )
तथा छान्दोग्य उपनिषद् ( ५।११।४ ) में हुआ है। इन दोनों ग्रन्थों के
इन स्थलों पर प्रसङ्ग एक ही है। आत्मा और ब्रह्म के विषय में कई
ब्राह्मण दार्शनिक विवेचन कर रहे हैं। वैश्वानर-रूपी तत्त्व के सम्बन्ध
में इस विवेचन के सन्दर्भ में जब वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते
तो उनमें से एक का यह प्रस्ताव होता है कि अश्वपति कैकेय वैश्वानर
तत्त्व को जानते हैं। उनके यहाँ जाने पर जिज्ञासा की शान्ति होगी।
सभी की सहमति के अनन्तर वे लोग उनके यहाँ जाते हैं और अश्वपति
उनको वैश्वानर तत्त्व के सम्बन्ध में शिक्षा देते हैं।१
इक्ष्वाकु सम्बन्धी उपर्युक्त उल्लेख का कोई विशेष महत्व न मानते
हुए इस सन्दर्भ में पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा यह कहा गया है कि इसके
बारे में मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि इस नाम के कोई राजा थे
यद्यपि उनका राम के साथ कोई असाधारण सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता।
इसी प्रकार राजा दशरथ का भी उपर्युक्त उल्लेख से कोई विशेष परि-
चय नहीं प्राप्त होता। यही स्थिति अश्वपति कैकेय सम्बन्धी वर्णन की
भी है। इससे भी मात्र इतना ही ज्ञात होता है कि ये एक राजा थे,
जिनके यहाँ ब्राह्मण भी तत्त्व सम्बन्धी जिज्ञासाओं की शान्ति हेतु जाते
थे। इसके अतिरिक्त इस प्रसङ्ग में रामकथा के अन्य पात्रों से इनके
किसी सम्बन्ध की सूचना नहीं प्राप्त होती।२
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १-२, ३ ।
२. वहीं।
प्रस्तावना १३
किन्तु पाश्चात्यों की उपर्युक्त प्रकार की धारणाओं से भारतीय
परम्परागत विद्वान् सहमत नहीं हैं। उनका स्पष्ट कथन है कि वेदों में
तो सूत्र-रूप से ही ऐसी बातों की ओर इङ्गित किया गया है तथा
आख्यानों का विस्तार तो पुराणादि में प्राप्त होता है। वैदिक मन्त्रों में
आये हुए शब्दों का उपबृंहण इतिहास, पुराण तथा अन्य आर्ष-ग्रन्थों
द्वारा होता है और पाश्चात्य विद्वान् वेद की अपौरुषेयता स्वीकार
करने वाली भारतीय मनःस्थिति तथा परम्परा को यहाँ के धरातल पर
आकर समझने में समर्थ नहीं हैं और उन्हें समझाया भी नहीं जा सकता।
इक्ष्वाकु सम्बन्धी उपर्युक्त उल्लेख से यह स्थापना भी होती है कि मन्त्र
के रचनाकाल में इक्ष्वाकु एक प्राचीन वीर माने जाते थे। किन्तु स्वामी
करपात्री जी ने इस सन्दर्भ में यह कहा है— "इससे यह भी नहीं सम-
झना चाहिये कि मन्त्र-रचना के पहले इक्ष्वाकु नाम के राजा प्रसिद्ध थे,
उनके बाद मन्त्र-रचना हुई, क्योंकि लोक में यद्यपि घटनापूर्वक शब्दो-
ल्लेख होता है, तथापि वेद में शब्दानुसारिणी ही घटना होती है।”१
यही बात दशरथ के उपर्युक्त उल्लेख के सम्बन्ध में भी कही जा सकती
है। साथ ही अश्वपति कैकय को महाराज दशरथ की प्रसिद्ध पटरानी
कैकेयी का पिता मानने में कोई कठिनाई नहीं है।२
जनक का प्रथम उल्लेख हमें कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय ब्राह्मण
(३।१०।६) में प्राप्त होता है, जो सावित्राग्नि-यज्ञ के फल को बतलाने
के लिये आख्यानरूप में आया है। इसके अनुसार जनक वैदेह देवताओं
से मिलते हैं और देवता इस यज्ञ के अनेक फलों का वर्णन करते हैं।
इसके अतिरिक्त शतपथब्राह्मण के चार स्थलों (११।३।१।२-४; ११।
४।३।२०; ११।६।२।१-१०; ११. ६. ३. १) आदि में भी जनक
का वर्णन आया है। इसके साथ ही याज्ञवल्क्य का भी इन स्थलों पर
उल्लेख है। पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में इन उल्लेखों से यही ज्ञात
होता है कि जनक एक तत्त्वज्ञ पुरुष हैं तथा वे याज्ञवल्क्य को भी
शिक्षा देते हैं और स्वयं ब्राह्मण बन जाते हैं। बाद में बृहदारण्यक
उपनिषद् में स्थिति बदल गयी है। उसमें याज्ञवल्क्य ही जनक को शिक्षा
१. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ १५।
२. वहीं, पृष्ठ १७।
१४ प्रस्तावना
देते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् में यह स्थल ३।१।१-२ है। इन स्थलों
के उल्लेखों से पाश्चात्य विद्वान् यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जनक को
क्षत्रिय तथा ब्राह्मण दोनों बतलाया गया है और ये उन्हें क्षत्रिय से
ब्राह्मण बनने की ओर इङ्गित करते हैं। ये विचार रामकथा पर
अपना शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत करनेवाले फादर कामिल बुल्के के हैं।१
किन्तु पूरे प्रसङ्ग पर विचार करने पर यह उनकी भ्रान्ति ज्ञात
होती है। 'ब्रह्म' शब्द से उन्हें 'ब्राह्मण' की भ्रान्ति हुई है। शतपथ
ब्राह्मण में (११।६।२।१०) में उल्लेख आया है—
“याज्ञवल्क्यो वरं ददौ सहोवाच कामप्रश्न एव मे।
त्वयि याज्ञवल्क्यासदिति ततो ब्रह्मा जनक आस ॥”
यतः याज्ञवल्क्य ब्रह्मविद्या में निष्णात थे अतः जनक ने उनसे
यथेष्ट प्रश्न करने का वर प्राप्त किया था। कालान्तर में जब याज्ञवल्क्य
पुनः जनक के यहाँ आये तो उसी वरदान के प्रसङ्ग में जनक ने उनसे
ब्रह्म के सम्बन्ध में विविध प्रश्न किये थे और उनका उत्तर पाने पर
जनक स्वयं भी याज्ञवल्क्य के समान ब्रह्मिष्ठ हो गये। सायणाचार्य ने
उक्त प्रसङ्ग की व्याख्या में स्पष्ट-रूप से प्रतिपादित किया है कि याज्ञ-
वल्क्य से वर प्राप्त कर जनक 'ब्रह्मा' अर्थात् 'ब्रह्मिष्ठ' हो गये— “ततो
याज्ञवल्क्यवरप्रदानान्तरं स जनकः ब्रह्मिष्ठो बभूव ।” अतः यहाँ पर
'ब्रह्म' शब्द से 'ब्राह्मण' की भ्रान्ति हुई है, यह स्पष्ट है। इन प्रसङ्गों में
आये जनक में से किसी को इस तर्क के आधार पर ब्राह्मण मानना और
अन्य को क्षत्रिय मानना बिल्कुल निराधार ज्ञात होता है।२
बुल्के के अनुसार भिन्न-भिन्न राजाओं के उल्लेख प्राप्त होते हैं, जिनके
नाम जनक दिये गये हैं। इनमें से एक मिथि के पुत्र हैं तथा दूसरे
ह्रस्वरोमा के पुत्र तथा सीता के पिता। यह उल्लेख वाल्मीकि रामायण
में हुआ है। महाभारत में सीता जनक की पुत्री तो मानी जाती हैं,
लेकिन जहाँ-जहाँ जनक का स्वतन्त्र उल्लेख हुआ है, वहाँ रामकथा से
इनके किसी सम्बन्ध का निर्देशमात्र भी नहीं मिलता, साथ ही यहाँ भी
जनक नामक कई भिन्न राजाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। इन वर्णनों
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ४-६ ।
२. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ १६-१७
प्रस्तावना ५५
तथा वैदिक वाङ्मय में आये जनक के उल्लेखों से श्री बुल्के के अनुसार
हम मात्र किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि रामकथा के अन्य पात्रों की
अपेक्षा जनक वैदेह का अधिक उल्लेख प्राप्त है, किन्तु अर्वाचीन रामकथा
में ये दोनों अभिन्न माने जाते हैं। परन्तु वास्तव में दोनों की अभिन्नता
सिद्ध करने के लिये प्रमाण नहीं दिये जा सकते और यह स्वीकार करना
पड़ता है कि यहाँ पर कहीं भी यह उल्लेख नहीं प्राप्त होता कि सीता
जनक की पुत्री हैं, अथवा राम उनके जामाता हैं।¹
"किन्तु वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड, सर्ग ७१, श्लोक ४ के अनु-
सार मिथि के पुत्र प्रथम जनक हुए। वे इतने प्रतापी थे कि उनके नाम
से जनक-वंश ही चल पड़ा। उस जनक-वंश में ह्रस्वरोमा जनक के
दो पुत्र थे। छोटे का नाम कुशध्वज था और बड़े पुत्र सीता के पिता थे-
"तस्य पुत्रद्वयराज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मनः।
ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीरः कुशध्वजः ॥"² (वा.रा. १।७१।१३)
यद्यपि राजा जनक के नाम का उल्लेख यहाँ नहीं है तो भी
विष्णुपुराण (४।५।३०), वायुपुराण (८६।१५), ब्रह्माण्डपुराण
(३।६४।१५) एवं पद्मपुराण पातालखण्ड (५७।५) के अनुसार उनका
नाम सीरध्वज था। सीता के पिता सीरध्वज और जनक-याज्ञवल्क्य-
संवाद से सम्बद्ध जनक अभिन्न प्रतीत होते हैं। पुराणों के अनुसार सीता
के पिता महान् ज्ञानवान् और योगनिष्ठ थे। वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि
अपरिगणित महर्षियों से पूर्ण परिचित थे। साक्षात् विष्णुस्वरूप राम
के श्वशुर और महालक्ष्मीरूपा सीता के पिता होने का भी सौभाग्य उन्हें
प्राप्त था। इससे वैदिक जनक और रामायण के जनक की अभिन्नता
समझी जा सकती है, क्योंकि अभिन्नता का बाधक कोई प्रमाण विद्यमान
नहीं है³।"
'राम' नाम का उल्लेख भी वैदिक वाङ्मय में प्राप्त होता है।
ऋग्वेद के (१०।९३।१४) में राजा के रूप में राम का उल्लेख हुआ है-
“प्र तद् दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु ।
ये युक्त्वाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्नाव्येषाम्" ॥
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ६ ।
२. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ १७ ।
३. वहीं।
१६ प्रस्तावना
अर्थात् मैंने दुःशीम पृथवान वेन और राम (असुर) इन यजमानों
के लिये यह सूक्त गाया है। इन्होंने ५०० (घोड़े अथवा रथ) जुतवाये,
(जिससे) उनका मुझ पर अनुग्रह चारों ओर फैल गया है।
इसके अतिरिक्त ऐतरेयब्राह्मण (७।२७।३४) में राममार्गवेय,
शतपथब्राह्मण (४।६।१।७) में राम औपतस्विनि तथा जैमिनीय
उपनिषद् ब्राह्मण के दो स्थलों में (३।७।३।२ एवं ४।६।१।१)
में राम क्रातुजातेय का वर्णन आया है। इन उपर्युक्त उल्लेखों में
से प्रथम उल्लेख के विषय में श्री बुल्के ने यह प्रतिपादित किया है कि
इससे मात्र इतना ही पता लगता है राम नामक कोई राजा हुए थे।
शेष उल्लेखों को रामकथा के राम से भिन्न मानते हुए उनका यह कथन
है कि “इन विभिन्न रामों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि
प्राचीनतम वैदिक काल से ही राजाओं और ब्राह्मणों दोनों में 'राम'
नाम प्रचलित था”।१
किन्तु गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर ऋग्वेद के उपर्युक्त राम-
सम्बन्धी उल्लेख में आये राम को रामकथा के राम से अभिन्न मानने में
कोई विशेष कठिनाई दृष्टिगोचर नहीं होती। सूर्यवंशी राजा वेन के
बाद वर्णित राम अवश्य ही सूर्यवंशी थे, यह क्लिष्ट-कल्पना नहीं ज्ञात
होती। रामकथा के राम ने बड़े-बड़े यज्ञों को अनुष्ठित किया था और
'असुर' शब्द को यहाँ पर महाप्राणवान् अथवा महाबलशाली के अर्थ में
लेने में कोई कठिनाई नहीं है। साथ ही श्री बुल्के ने प्रश्नोपनिषद् के
इस उल्लेख को छोड़ दिया है— "भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राज-
पुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत" (प्र० उ० ६।१) यहाँ पर हिरण्यनाभ
कौशल्य नाम की चर्चा हुई है जो वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड,
सर्ग ७५, श्लोक १३ के अनुसार राम का ही नामान्तर है— “हिरण्यनाभो
यत्रास्ते सुतो मे सुमहाशयाः।” वैदिक वाङ्मय में राम के उल्लेख के
प्रसङ्ग में इसे छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि आपस्तम्बसूत्र में स्पष्ट
रूप से कहा गया है— “मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्”; अर्थात् मन्त्र
और ब्राह्मण दोनों की ही वेदसंज्ञा है और अधिकांश उपनिषदें ब्राह्मण-
भाग के अन्तर्गत आती हैं।२
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ३।
२. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ १६।
प्रथम काण्ड: बालकाण्ड एवं अयोध्याकाण्ड मन्त्र-रहस्य
प्रस्तावना १७
सीता के उल्लेख पर विचार करते हुए श्री बुल्के ने वैदिक वाङ्मय
से उद्धरण प्रस्तुत करते हुए इस नाम के वर्णन को अर्थ की दृष्टि से दो
कोटियों में रखा है—पहली कोटि में सीता-सावित्री उपाख्यान है जो
हमें तैत्तिरीय ब्राह्मण में प्राप्त होता है और दूसरी कोटि में 'सीता'
शब्द का प्रयोग जो लाङ्गल-पद्धति के अर्थ में वैदिक वाङ्मय के कई
स्थलों में हुआ है, दिया गया है।१ संक्षेप में श्री बुल्के के इस कथन की
आलोचना देनी समीचीन प्रतीत होती है।
कृष्णयजुर्वेद के तैत्तिरीय ब्राह्मण (२।३।१०) में जो सीता-सावित्री
उपाख्यान है, वह श्री बुल्के के अनुसार काम्य प्रयोग का प्रभाव दिखलाने
के उद्देश्य से ही उद्धृत किया गया है।२ यह उपाख्यान सीता-सावित्री
तथा सोम राजा से सम्बन्धित है और इसमें सीता और श्रद्धा दोनों
प्रजापति की पुत्रियाँ मानी जाती हैं। इस उपाख्यान में सीता सोम
राजा के प्रेम को स्थागर नामक अङ्गराग के द्वारा प्राप्त करती हैं। इस
कथा का मूल रूप श्री बुल्के के अनुसार ऋग्वेद के सूर्या सूक्त में विद्यमान
है और उनकी मान्यतानुसार यह ऋग्वेद के ऐतरेयब्राह्मण तथा
कौषितकीब्राह्मण, तैत्तिरीयसंहिता, काठकसंहिता तथा मैत्रायणीसंहिता
में भी है। तैत्तिरीयसंहिता में इस कथा का कुछ परिवर्तित रूप प्राप्त
होता है जो श्री बुल्के के ही शब्दों में इस प्रकार है—"प्रजापति ने सोम
राजा की और इसके पश्चात् तीनों वेदों की सृष्टि की थी। सोम राजा
ने इन (वेदों) को हस्तगत किया। सीता-सावित्री सोम राजा को
(पतिस्वरूप) चाहती थीं, (लेकिन) वह (सोम राजा) श्रद्धा
(सीता की बहन) को चाहते थे। सीता ने अपने पिता प्रजापति के
पास जाकर कहा, 'आपको नमस्कार, मैं आपके पास आयी हूँ और
आपकी शरण लेती हूँ, मैं सोम राजा को पतिरूप में चाहती हूँ; परन्तु
वे श्रद्धा को चाहते हैं।' प्रजापति ने उसके लिये स्थागर नामक अङ्गराग
तैयार किया और पूर्व दिशा की ओर दस होतृ-मन्त्र पढ़कर, दक्षिण
की ओर चार होतृ-मन्त्र, पश्चिम की ओर पाँच होतृ-मन्त्र, उत्तर की ओर
छह होतृ-मन्त्र, ऊपर की ओर सात होतृ-मन्त्र पढ़कर तथा सम्भार-
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ७-२३।
२. वहीं, पृष्ठ ७।
१८ प्रस्तावना
मन्त्रों और पत्नी-मन्त्रों से उस अङ्गराग को अभिमन्त्रित कर सीता का
मुख उन्होंने अलंकृत किया और इसके अनन्तर वह सोम राजा के पास
गयी। सीता को देखकर सोम राजा ने कहा कि मेरे पास आइये।
सीता ने कहा कि 'मैं आपके पास आती हूँ, परन्तु आप प्रतिज्ञा करें कि
मुझसे सम्बन्ध रखेंगे और आपके हाथ में जो है, उसे मुझे दे दीजिए।'
सोम राजा ने सीता को तीनों वेद दे दिये' ।१ इसके बाद इस अङ्गराग
की महिमा तथा इसके प्रयोग का वर्णन है।
इस उपाख्यान तथा वाल्मीकि रामायण के सम्बन्ध में श्री बुल्के का
तर्क है कि “सीता-सावित्री आदि कथाओं का इससे कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध
नहीं है, फिर भी सम्भव है कि अनसूया के अङ्गराग का वृत्तान्त इस
उपाख्यान से प्रभावित हो जो वाल्मीकि रामायण के २।११८।२० तथा
अध्यात्म रामायण के २।६।८६ में प्रस्तुत हुआ है। उनके अनुसार
गोस्वामी तुलसीदास जी भी तैत्तिरीयब्राह्मण के उपर्युक्त उपाख्यान से
परिचित थे और उन्होंने सीता की मर्यादा के विरुद्ध समझ कर इस
अङ्गराज की चर्चा नहीं की....”२ आदि।
श्री बुल्के की ऊपरिस्थित अङ्गराग-सम्बन्धी चर्चा का पूर्णरूपेण
उल्लेख करते हुए स्वामी करपात्री जी ने भारतीय परम्परा की दृष्टि से
इसकी आलोचना की है जिसे उन्हीं के शब्दों में नीचे प्रस्तुत किया जा
रहा है जिससे विद्वत् समाज उसके सम्बन्ध में उनकी दृष्टि को भी
जान ले—
“यहाँ बुल्के साहब ने तैत्तिरीयब्राह्मण में वर्णित सीता-सावित्री के
मन्त्राभिमन्त्रित स्थागर (अङ्गराग) से वाल्मीकि रामायण और
अध्यात्म-रामायण में उल्लिखित अङ्गराग की भिड़न्त भिड़ाकर स्थागर
का विकास इस रूप में माना है और तुलसीदास जी ने जान बूझकर
यह छिपा लिया, ऐसा बतलाया है। परन्तु यह कथन अयथार्थ है,
क्योंकि जो बात वाल्मीकि-रामायण और आध्यात्म-रामायण दोनों में
हो, महात्मा तुलसीदास उसका अपलाप नहीं कर सकते। अतः उनके
‘दिव्य वसन भूषण’ शब्द से अङ्गराग भी समझ लेना चाहिये। यहाँ
१. वहीं, पृष्ठ ८-६।
२. वहीं पृष्ठ ६।
प्रस्तावना १६
एक बात और ध्यान देने योग्य है, वह यह कि ऋषि सर्वज्ञकल्प होते
हैं, अतः स्वतन्त्र रूप से अनसूया-समर्पित अङ्गराग दिव्य वसन-भूषण
आदि का ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने उल्लेख किया है। संसार में समान-
रूप से मिलती-जुलती अनेक घटनाएँ हो सकती हैं, अतः यह आवश्यक
नहीं कि सावित्री सीता द्वारा प्राप्त अङ्गराग का ही यहाँ आवर्तन किया
जाय । अतएव प्रजापति द्वारा सूर्या को दत्त अङ्गराग अन्य वस्तु है
और अनसूया द्वारा सीता को प्रदत्त अङ्गराग अन्य वस्तु । सावित्री
सीता का स्थागर केवल मुखलेप है तथा अनसूया द्वारा सीता के लिये
दी गयी वस्तु अङ्गराग है। मुखलेप.वशीकरण के लिये है, यह केवल
स्वाभाविक सौन्दर्य का अभिव्यञ्जक है और अङ्गराग सर्वाङ्ग-विलेपन
है, इसके साथ दिव्य मालाएँ, वस्त्र एवं आभूषण भी हैं....।"१
उपर्युक्त के अतिरिक्त 'सीता' शब्द का प्रयोग काठकसंहिता
(२०।३), कपिष्ठलसंहिता (३२।५-६), मैत्रायणीसंहिता (३।२।४-५)
तथा तैत्तिरीयसंहिता (५।२।५।५) में तथा शतपथब्राह्मण (१३।८।२।
६-७) आदि में हुआ है और यह पाश्चात्त्य विद्वानों की दृष्टि से लाङ्गल-
पद्धति के विषय में है२ । वे मानते हैं कि उन स्थलों पर सीता के
व्यक्तित्व का आरोप विद्यमान नहीं है। तथा इससे सीता को कृषि की
अधिष्ठात्री देवी के रूप में लिया जा सकता है३ । सीता की प्रार्थना
अथर्ववेद (३।१७।१) में विद्यमान है। इसकी अधिकांश सामग्री
ऋग्वेद के दो सूक्तों से ली गयी है। परन्तु यदि इन मन्त्रों पर हम
विचार करें तो यह लाङ्गलपद्धति-मात्र की स्तुति नहीं है—
“सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव ।
यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ॥
(अथ० सं० ३।१७।८)
अर्थात् हे सीते, हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। हे सुन्दर भाग्यवाली
सीताभिमानिनी देवी, आप हमारे वैसे अभिमुख हों, जिस प्रकार से
हमलोगों के प्रति सुन्दर मनवाली हों एवं जिससे हमलोगों को शोभन
१. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायण-मीमांसा, पृष्ठ २६-३० ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ७ ।
३. वहीं, पृष्ठ ११-२३ ।
२० प्रस्तावना
फल देनेवाली हो । यह मात्र लाङ्गलपद्धतिमात्र की स्तुति नहीं हो
सकती१। क्या हम इसमें महाशक्ति की अभिव्यञ्जना नहीं पाते ? एक
प्रकार से इन सबके द्वारा इसमें आह्लादिनी सर्वशक्तिस्वरूपा तेजोमयी
शक्ति का निरूपण निर्देशित है। छान्दोग्य उपनिषद् (७।१।४) में
कहा गया है कि "इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः"। इसके अनु-
सार इतिहास पुराणादि भी वेद की कोटि में ही आ जाते हैं।
जहाँ तक वेदों के तात्पर्य का प्रश्न है, यह परब्रह्म परमेश्वर में ही
है। साथ ही अधिकांश मन्त्र तथा ब्राह्मणों के द्वारा कर्मकाण्ड और
उपासनाओं का वर्णन किया गया है। जिस प्रकार ब्रह्म निर्गुण तथा
निराकार है, वैसे ही वह अचिन्त्य सौन्दर्य तथा माधुर्य आदि से पूर्ण
साकार रूप में भी वर्णित है। वह अपने लिये भी श्रीविग्रह का निर्माण
कर सकता है। अतएव यजुर्वेदसंहिता (५।२०) में निम्नाङ्कित मन्त्र
आता है—
"प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।
यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥
विद्वानों के अनुसार यहाँ पर आये 'भीमो मृगः' से नृसिंहावतार
का निदर्शन है तथा 'कुचरः' से भूमिचारी राम, कृष्ण आदि का अव-
तार इङ्गित है और 'त्रिषु विक्रमणेषु' से वामनावतार सूचित है। इस
प्रकार से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह नहीं कहा जा सकता
कि वैदिक वाङ्मय में रामकथा का निदर्शन नहीं है२।
रामकथा की उत्पत्ति के सन्दर्भ में भी विभिन्न मत विद्वानों ने
प्रस्तुत किये हैं और इस सन्दर्भ में उन पर संक्षेप में विचार प्रस्तुत
करना समीचीन ज्ञात होता है। डा० वेबर की मान्यता है कि रामकथा
का मूल रूप दशरथजातक में सुरक्षित है तथा इसमें सीताहरण तथा
रावण युद्ध का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है; अतः सीताहरण वाले इस
अंश का मूलस्रोत सम्भवतः होमर का काव्य है जिसमें पैरिस द्वारा
हेलेन का हरण वर्णित है और लङ्का-युद्ध का आधार है यूनानी सेना
द्वारा त्राय का अवरोध३ ।
१. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ २३ ।
२. वहीं, पृष्ठ ३६-३७ ।
३. द्रष्टव्य, ए० वेबर, आन दि रामायण, पृष्ठ ११ आदि ।
प्रस्तावना २१
किन्तु आज तक इस विषय पर आलोचना तथा समीक्षा करनेवाले
किसी विद्वान् ने इस विषय पर इस दृष्टि से विचार करने का कष्ट नहीं
किया कि क्या दशरथजातक से भी पूर्व बौद्ध पालि त्रिपिटक में राम-
कथा की ओर संकेत है और उसके परिप्रेक्ष्य में दशरथजातक की स्वयं
क्या स्थिति होती है और कालक्रम का क्या प्रश्न उपस्थित होता है।
अतः इस संकेत के सन्दर्भ में इस पूरे प्रकरण पर पुनः विचार
अपेक्षित है।
त्रिपिटक के सुत्तपिटक के दीघनिकाय नामक प्रथम निकाय का
प्रथम सुत्त 'ब्रह्मजालसुत्त'१ है। इसमें भगवान् बुद्ध ने भिक्षुको को
निरर्थक प्रलाप तथा युद्ध-कथा की चर्चा करने से मना किया है। प्रसङ्ग
यह है कि एक बार भगवान् बुद्ध भिक्षु-सङ्घ के साथ राजगृह से नालन्दा
जा रहे थे और उस समय सुप्रिय परिव्राजक भी अपने शिष्य ब्रह्मदत्त के
साथ उसी मार्ग पर आरूढ़ था। सुप्रिय अनेक प्रकार से बुद्ध, धर्म तथा
सङ्घ की निन्दा कर रहा था तथा ब्रह्मदत्त इसके विपरीत प्रशंसा।
रास्ते में रात को बुद्ध एक स्थान पर ठहर गये और सुप्रिय तथा
ब्रह्मदत्त भी वहाँ ठहरे और वे दोनों उसी प्रकार से चर्चा में लिप्त
रहे। भिक्षुओं ने इस सम्बन्ध में जब बुद्ध से प्रश्न किया तो उन्होंने
उत्तर दिया कि शीलवान् होने के कारण सामान्य जन उनकी प्रशंसा
करते हैं। बुद्ध ने उस समय शील की व्याख्या इसे प्रारम्भिक, मध्यम
तथा महाशील में करके की और प्रारम्भिक शील के अन्तर्गत जीव-
हिंसा, चोरी, अब्रह्मचर्य आदि से विरत रहने को परिगणित करते हुए
कहा कि इन सबसे विरत रहने के कारण ही सामान्य जन उनकी
प्रशंसा करते हैं। आगे उन्होंने 'सम्पप्पलाप', अर्थात् निरर्थक प्रलाप
से विरत रहने का उल्लेख किया२। इस 'सम्पप्पलाप' पद की व्याख्या
दीघनिकाय की अट्ठकथा (अर्थकथा) 'सुमङ्गलविलासिनी' में आचार्य
बुद्धघोष ने इस प्रकार से की है- "अनत्थविज्ञापिका कायवचीपयोग-
समुट्ठापिका अकुसलचेतना••••सम्पप्पलापो••••तस्स द्वे सम्भारा-भारत-
युद्ध-सीताहरणादिनिरत्थककथापुरक्खारता, तथारूपी कथाकथनं
१. द्रष्टव्य, दीघनिकाय, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ३-४० ।
२. वहीं, पृष्ठ ३-६ ।
२२ प्रस्तावना
च"१। इस प्रकार निरर्थक प्रलाप के अन्तर्गत भारतयुद्ध-कथा (महा-
भारत-कथा) तथा सीताहरण-कथा (रामायण-कथा) को अट्ठकथाकार
बुद्धघोष ने रखा है। आगे चलकर मध्यम शील के वर्णन के अन्तर्गत
यह आया है कि जिस प्रकार अन्य श्रमण तथा ब्राह्मण इस प्रकार की
व्यर्थ अथवा तिरश्चीन कथाओं में लगे रहते हैं, जैसे— राजकथा,
चोरकथा, महामात्यकथा, सेनाकथा, भयकथा, युद्धकथा....आदि; उस
प्रकार से श्रमण गोतम ऐसी व्यर्थ कथाओं में नहीं लगा रहता। अतः
लोग उसकी प्रशंसा करते हैं२। यहाँ पर हम देखते हैं कि इस सन्दर्भ
में 'युद्धकथा' शब्द आया है। 'सुमङ्गलविलासिनी' में ही इसकी
व्याख्या आचार्य बुद्धघोष इस प्रकार से करते हैं— "युद्धे पि भारत-
युद्धादीसु असुकेन असुको एवं मारितो एवं विद्धो ति कामस्सादवसेन
कथा तिरच्छानकथा"३। 'सुमङ्गलविलासिनी' के थाई (स्यामी)
संस्करण में 'भारतयुद्धादीसु' के स्थान पर 'भारतरामायुद्धादीसु' पाठ
है४ जो स्पष्ट रूप से महाभारत-कथा तथा रामायण-कथा इन दोनों की
ओर इङ्गित करता है।
भारतीय वाङ्मय के प्रसिद्ध इतिहास-लेखक विन्टरनित्स ने यह
स्थापना करते हुए कहा कि बौद्ध पालि त्रिपिटक में महाभारत अथवा
रामायण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, उसी स्थल पर यह पाद-टिप्पणी दे
दी है कि 'युद्धकथा' का अर्थ अथवा अभिप्राय यदि रामायण अथवा
महाभारत प्रारम्भिक त्रिपिटक युग में ही अभिप्रेत होता तो मूल में ही
इन दोनों नामों का उल्लेख होता और मात्र युद्धकथा कह कर न छोड़
दिया जाता५। पर उनका यह कथन पूर्णतया भ्रान्ति-युक्त एवं निरर्थक
है, क्योंकि ऐसा न करने का तो कारण स्वयमेव स्पष्ट ही है कि उक्त
बौद्ध कथन में इन विशिष्टकथाओं के प्रति किसी भी प्रकार के आदर-
भाव की सम्भावना ही नहीं है। जिसे निरर्थक प्रलाप अथवा तिरश्चीन
१. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ६३-६४।
२. द्रष्टव्य, दीघनिकाय, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ६।
३. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ १०७।
४. वहीं।
५. द्रष्टव्य, एम० विन्टरनित्स, हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर,
भा० १, पृष्ठ ४७१, टि० ४।
प्रस्तावना २३
कथा कहा जा रहा हो, उसके प्रति गौरवबुद्धि कैसे हो सकती है और
ऐसा न होने पर मूल में इनके नामोल्लेख करने का प्रसङ्ग ही नहीं
उठता।
यदि यह प्रश्न उठाया जाय कि आचार्य बुद्धघोष का समय पांचवी
शताब्दी है और उस समय तक रामायण तथा महाभारतादि ग्रन्थों की
प्रतिष्ठा हो चुकी थी, अतएव उनके द्वारा इस प्रकार का व्याख्यान
प्रस्तुत हुआ, तो इसका उत्तर यह है कि बौद्ध परम्परा यह मानती है
कि सम्राट् अशोक से पूर्व हुई बौद्ध सङ्गीतियों में मूल पालि त्रिपिटक के
साथ उसको अट्ठकथाओं का भी सङ्गायन हुआ था और अशोक के समय
पाटलिपुत्र में हुई तृतीय सङ्गीति के सन्दर्भ में अशोक के पुत्र महेन्द्र
अपने साथ मूल त्रिपिटक तथा उसकी अट्ठकथाओं को सिंहल द्वीप ले
गये थे। कालान्तर में उनका सिंहली अनुवाद प्रस्तुत किया गया और
बाद में आगे चल कर आचार्य बुद्धघोष ने इनका सिंहली भाषा से
पालि अथवा मागधी भाषा में अनुवाद-मात्र किया, कोई नवीन रचना
नहीं की। 'सुमङ्गलविलासिनी' के प्रारम्भ में ही आचार्य बुद्धघोष ने
इस तथ्य को प्रकट किया है¹।
इस प्रकार दशरथजातक से स्पष्ट और प्रामाणिक उल्लेख युद्धकथा
के रूप में स्वयं त्रिपिटक में प्राप्त है। दशरथजातक तो स्वयं ही अट्ठकथा
का भाग है। जातक की मात्र गाथाएँ मूल त्रिपिटक का भाग मानी
जाती हैं, शेष कथा अट्ठकथा में दी गयी है। अतः ऊपर दिये गये 'युद्ध-
कथा' शब्द तथा उसके व्याख्यान के सन्दर्भ में डा० वेबर का सिद्धान्त
खण्डित हो जाता है कि दशरथजातक मात्र में रामकथा का मूल स्रोत
सुरक्षित है। युद्धकथा का सन्दर्भ यह व्यक्त करता है कि राम-रावण के
युद्ध की कथा रूप में रामकथा की प्रतिष्ठा समाज में उस समय हो चुकी थी
और काफी समय तक रामकथा अथवा इस कथा को व्यक्त करने वाले
काव्य को सीताहरण कहा जाता रहा। अतः सीताहरण तथा रावण
युद्ध की ओर पूर्व में ही 'युद्धकथा' से निदर्शन विद्यमान रहने के कारण
होमर के काव्य से इसके आने का प्रश्न ही नहीं उठता।
डा० याकोबी भी वेबर की भाँति ही रामकथा को दो भागों में
बाँट कर उसके दो आधारों को स्थापित करते हैं। उनके अनुसार प्रथम
१. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ३।
२४ प्रस्तावना
भाग अयोध्या की घटनाओं से सम्बन्ध रखता है और इसमें दशरथ
प्रधान नायक है तथा द्वितीय भाग में दण्डकारण्य तथा रावणवध-
सम्बन्धी कथा मिलती है और इसका मूल स्रोत वेदों की देवता-सम्बन्धी
कथाएँ प्रतीत होती हैं१ ।
श्री बुल्के को डा० याकोबी का मत तर्क-सङ्गत प्रतीत नहीं होता२,
क्योंकि उन्होंने अपने मस्तिक में यह निश्चित धारणा बना ली है कि
रामकथा का कोई वैदिक आधार नहीं है और डा० याकोबी उसका
वैदिक आधारमात्र ही नहीं देते, अपितु यह भी मानते हैं कि ईरानीय
'रामहुवास्त्र' तथा भारतीय राम का मूल स्रोत एक ही है। हापकिन्स
के मतानुसार महाभारत के शान्तिपर्व में जो रामकथा प्राप्त होती है,
उससे डा० याकोबी के मत की पुष्टि होती है३ ।
दिनेशचन्द्र सेन भी रामकथा के दो प्रधान मूल स्रोतों की कल्पना
करते हैं और ये दो स्रोत उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के हैं।
प्रथम के अन्तर्गत वे दशरथजातक को रखते हैं तथा द्वितीय के अन्तर्गत
रावण-सम्बन्धी आख्यान को तथा इन दोनों के संयोग से रामकथा की
उत्पत्ति को प्रस्तुत करते हैं४ । पर इनके विचार भी श्री वेबर की भाँति
ही हैं जिनके विरुद्ध पूर्व में तर्क प्रस्तुत किये जा चुके हैं और यह प्रदर्शित
किया जा चुका है कि युद्धकथा के रूप में दशरथजातक के पूर्व ही
रामकथा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। रावण-सम्बन्धी स्वतन्त्र आख्यानों को
सिद्ध करने के लिये सेन ने बौद्ध तथा जैन वाङ्मय का सहारा लिया
है, जिनके विषय में यह कहा जा सकता है कि उन स्रोतों के बहुत ही
पूर्व रामकथा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। साथ ही बौद्धों तथा जैनों में
रामकथा के प्रति कोई गौरवबुद्धि नहीं थी और वे उसे अपने अनुसार
तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना चाहते थे ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि रामकथा के मूल स्रोत के रूप में वैदिक
वाङ्मय को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं दृष्टिगोचर होती ।
वाल्मीकि स्वयं ही उसको वेद का उपबृंहण मानते हैं। उनकी यह
स्पष्टोक्ति है—
१. द्रष्टव्य, हर्मन याकोबो, दास रामायण, पृष्ठ ८६ ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १०५ ।
३. वहीं, पृष्ठ १०६ । ४. वहीं, पृष्ठ १०८ ।