मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ प्रस्तावना
प्राप्त होते हैं। ये इक्ष्वाकु, दशरथ, राम, अश्वपति, जनक तथा सीता
आदि हैं। इन पर संक्षेप में विचार कर लेना समीचीन होगा।
इक्ष्वाकु का उल्लेख ऋग्वेद में एक बार हुआ है— 'यस्येक्ष्वाकुरुप
व्रते रेवान् मराय्येधते' (ऋ० सं० १०।६०।४; ) अर्थात् जिसकी सेवा में
धनवान् प्रतापवान् इक्ष्वाकु की वृद्धि होती है। अथर्ववेद में भी एक
बार इक्ष्वाकु का नाम आया है—'त्वा वेद पूर्वं इक्ष्वाको यम्' (अ० सं०
१९।३६।६ ) अर्थात् तुम जिसे इक्ष्वाकु पूर्वकाल में जानता था। ऋग्वेद
में ही दशरथ का एक बार उल्लेख हुआ है— 'चत्वारिंशद् दशरथस्य
शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति' (ऋ० सं० १।१२६।४); अर्थात् दशरथ के
लाल रंग अथवा भूरे रंग के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का
नेतृत्व करते हैं। अश्वपति कैकेय का वर्णन शतपथब्राह्मण ( १०।६।१।२ )
तथा छान्दोग्य उपनिषद् ( ५।११।४ ) में हुआ है। इन दोनों ग्रन्थों के
इन स्थलों पर प्रसङ्ग एक ही है। आत्मा और ब्रह्म के विषय में कई
ब्राह्मण दार्शनिक विवेचन कर रहे हैं। वैश्वानर-रूपी तत्त्व के सम्बन्ध
में इस विवेचन के सन्दर्भ में जब वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते
तो उनमें से एक का यह प्रस्ताव होता है कि अश्वपति कैकेय वैश्वानर
तत्त्व को जानते हैं। उनके यहाँ जाने पर जिज्ञासा की शान्ति होगी।
सभी की सहमति के अनन्तर वे लोग उनके यहाँ जाते हैं और अश्वपति
उनको वैश्वानर तत्त्व के सम्बन्ध में शिक्षा देते हैं।१
इक्ष्वाकु सम्बन्धी उपर्युक्त उल्लेख का कोई विशेष महत्व न मानते
हुए इस सन्दर्भ में पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा यह कहा गया है कि इसके
बारे में मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि इस नाम के कोई राजा थे
यद्यपि उनका राम के साथ कोई असाधारण सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता।
इसी प्रकार राजा दशरथ का भी उपर्युक्त उल्लेख से कोई विशेष परि-
चय नहीं प्राप्त होता। यही स्थिति अश्वपति कैकेय सम्बन्धी वर्णन की
भी है। इससे भी मात्र इतना ही ज्ञात होता है कि ये एक राजा थे,
जिनके यहाँ ब्राह्मण भी तत्त्व सम्बन्धी जिज्ञासाओं की शान्ति हेतु जाते
थे। इसके अतिरिक्त इस प्रसङ्ग में रामकथा के अन्य पात्रों से इनके
किसी सम्बन्ध की सूचना नहीं प्राप्त होती।२
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १-२, ३ ।
२. वहीं।