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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 145 में से

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पृष्ठ 18

१४ प्रस्तावना
देते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् में यह स्थल ३।१।१-२ है। इन स्थलों
के उल्लेखों से पाश्चात्य विद्वान् यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जनक को
क्षत्रिय तथा ब्राह्मण दोनों बतलाया गया है और ये उन्हें क्षत्रिय से
ब्राह्मण बनने की ओर इङ्गित करते हैं। ये विचार रामकथा पर
अपना शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत करनेवाले फादर कामिल बुल्के के हैं।१
किन्तु पूरे प्रसङ्ग पर विचार करने पर यह उनकी भ्रान्ति ज्ञात
होती है। 'ब्रह्म' शब्द से उन्हें 'ब्राह्मण' की भ्रान्ति हुई है। शतपथ
ब्राह्मण में (११।६।२।१०) में उल्लेख आया है—
“याज्ञवल्क्यो वरं ददौ सहोवाच कामप्रश्न एव मे।
त्वयि याज्ञवल्क्यासदिति ततो ब्रह्मा जनक आस ॥”
यतः याज्ञवल्क्य ब्रह्मविद्या में निष्णात थे अतः जनक ने उनसे
यथेष्ट प्रश्न करने का वर प्राप्त किया था। कालान्तर में जब याज्ञवल्क्य
पुनः जनक के यहाँ आये तो उसी वरदान के प्रसङ्ग में जनक ने उनसे
ब्रह्म के सम्बन्ध में विविध प्रश्न किये थे और उनका उत्तर पाने पर
जनक स्वयं भी याज्ञवल्क्य के समान ब्रह्मिष्ठ हो गये। सायणाचार्य ने
उक्त प्रसङ्ग की व्याख्या में स्पष्ट-रूप से प्रतिपादित किया है कि याज्ञ-
वल्क्य से वर प्राप्त कर जनक 'ब्रह्मा' अर्थात् 'ब्रह्मिष्ठ' हो गये— “ततो
याज्ञवल्क्यवरप्रदानान्तरं स जनकः ब्रह्मिष्ठो बभूव ।” अतः यहाँ पर
'ब्रह्म' शब्द से 'ब्राह्मण' की भ्रान्ति हुई है, यह स्पष्ट है। इन प्रसङ्गों में
आये जनक में से किसी को इस तर्क के आधार पर ब्राह्मण मानना और
अन्य को क्षत्रिय मानना बिल्कुल निराधार ज्ञात होता है।२
बुल्के के अनुसार भिन्न-भिन्न राजाओं के उल्लेख प्राप्त होते हैं, जिनके
नाम जनक दिये गये हैं। इनमें से एक मिथि के पुत्र हैं तथा दूसरे
ह्रस्वरोमा के पुत्र तथा सीता के पिता। यह उल्लेख वाल्मीकि रामायण
में हुआ है। महाभारत में सीता जनक की पुत्री तो मानी जाती हैं,
लेकिन जहाँ-जहाँ जनक का स्वतन्त्र उल्लेख हुआ है, वहाँ रामकथा से
इनके किसी सम्बन्ध का निर्देशमात्र भी नहीं मिलता, साथ ही यहाँ भी
जनक नामक कई भिन्न राजाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। इन वर्णनों
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ४-६ ।
२. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ १६-१७