मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ प्रस्तावना
अर्थात् मैंने दुःशीम पृथवान वेन और राम (असुर) इन यजमानों
के लिये यह सूक्त गाया है। इन्होंने ५०० (घोड़े अथवा रथ) जुतवाये,
(जिससे) उनका मुझ पर अनुग्रह चारों ओर फैल गया है।
इसके अतिरिक्त ऐतरेयब्राह्मण (७।२७।३४) में राममार्गवेय,
शतपथब्राह्मण (४।६।१।७) में राम औपतस्विनि तथा जैमिनीय
उपनिषद् ब्राह्मण के दो स्थलों में (३।७।३।२ एवं ४।६।१।१)
में राम क्रातुजातेय का वर्णन आया है। इन उपर्युक्त उल्लेखों में
से प्रथम उल्लेख के विषय में श्री बुल्के ने यह प्रतिपादित किया है कि
इससे मात्र इतना ही पता लगता है राम नामक कोई राजा हुए थे।
शेष उल्लेखों को रामकथा के राम से भिन्न मानते हुए उनका यह कथन
है कि “इन विभिन्न रामों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि
प्राचीनतम वैदिक काल से ही राजाओं और ब्राह्मणों दोनों में 'राम'
नाम प्रचलित था”।१
किन्तु गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर ऋग्वेद के उपर्युक्त राम-
सम्बन्धी उल्लेख में आये राम को रामकथा के राम से अभिन्न मानने में
कोई विशेष कठिनाई दृष्टिगोचर नहीं होती। सूर्यवंशी राजा वेन के
बाद वर्णित राम अवश्य ही सूर्यवंशी थे, यह क्लिष्ट-कल्पना नहीं ज्ञात
होती। रामकथा के राम ने बड़े-बड़े यज्ञों को अनुष्ठित किया था और
'असुर' शब्द को यहाँ पर महाप्राणवान् अथवा महाबलशाली के अर्थ में
लेने में कोई कठिनाई नहीं है। साथ ही श्री बुल्के ने प्रश्नोपनिषद् के
इस उल्लेख को छोड़ दिया है— "भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राज-
पुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत" (प्र० उ० ६।१) यहाँ पर हिरण्यनाभ
कौशल्य नाम की चर्चा हुई है जो वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड,
सर्ग ७५, श्लोक १३ के अनुसार राम का ही नामान्तर है— “हिरण्यनाभो
यत्रास्ते सुतो मे सुमहाशयाः।” वैदिक वाङ्मय में राम के उल्लेख के
प्रसङ्ग में इसे छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि आपस्तम्बसूत्र में स्पष्ट
रूप से कहा गया है— “मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्”; अर्थात् मन्त्र
और ब्राह्मण दोनों की ही वेदसंज्ञा है और अधिकांश उपनिषदें ब्राह्मण-
भाग के अन्तर्गत आती हैं।२
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ३।
२. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ १६।