मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना १३
किन्तु पाश्चात्यों की उपर्युक्त प्रकार की धारणाओं से भारतीय
परम्परागत विद्वान् सहमत नहीं हैं। उनका स्पष्ट कथन है कि वेदों में
तो सूत्र-रूप से ही ऐसी बातों की ओर इङ्गित किया गया है तथा
आख्यानों का विस्तार तो पुराणादि में प्राप्त होता है। वैदिक मन्त्रों में
आये हुए शब्दों का उपबृंहण इतिहास, पुराण तथा अन्य आर्ष-ग्रन्थों
द्वारा होता है और पाश्चात्य विद्वान् वेद की अपौरुषेयता स्वीकार
करने वाली भारतीय मनःस्थिति तथा परम्परा को यहाँ के धरातल पर
आकर समझने में समर्थ नहीं हैं और उन्हें समझाया भी नहीं जा सकता।
इक्ष्वाकु सम्बन्धी उपर्युक्त उल्लेख से यह स्थापना भी होती है कि मन्त्र
के रचनाकाल में इक्ष्वाकु एक प्राचीन वीर माने जाते थे। किन्तु स्वामी
करपात्री जी ने इस सन्दर्भ में यह कहा है— "इससे यह भी नहीं सम-
झना चाहिये कि मन्त्र-रचना के पहले इक्ष्वाकु नाम के राजा प्रसिद्ध थे,
उनके बाद मन्त्र-रचना हुई, क्योंकि लोक में यद्यपि घटनापूर्वक शब्दो-
ल्लेख होता है, तथापि वेद में शब्दानुसारिणी ही घटना होती है।”१
यही बात दशरथ के उपर्युक्त उल्लेख के सम्बन्ध में भी कही जा सकती
है। साथ ही अश्वपति कैकय को महाराज दशरथ की प्रसिद्ध पटरानी
कैकेयी का पिता मानने में कोई कठिनाई नहीं है।२
जनक का प्रथम उल्लेख हमें कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय ब्राह्मण
(३।१०।६) में प्राप्त होता है, जो सावित्राग्नि-यज्ञ के फल को बतलाने
के लिये आख्यानरूप में आया है। इसके अनुसार जनक वैदेह देवताओं
से मिलते हैं और देवता इस यज्ञ के अनेक फलों का वर्णन करते हैं।
इसके अतिरिक्त शतपथब्राह्मण के चार स्थलों (११।३।१।२-४; ११।
४।३।२०; ११।६।२।१-१०; ११. ६. ३. १) आदि में भी जनक
का वर्णन आया है। इसके साथ ही याज्ञवल्क्य का भी इन स्थलों पर
उल्लेख है। पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में इन उल्लेखों से यही ज्ञात
होता है कि जनक एक तत्त्वज्ञ पुरुष हैं तथा वे याज्ञवल्क्य को भी
शिक्षा देते हैं और स्वयं ब्राह्मण बन जाते हैं। बाद में बृहदारण्यक
उपनिषद् में स्थिति बदल गयी है। उसमें याज्ञवल्क्य ही जनक को शिक्षा
१. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ १५।
२. वहीं, पृष्ठ १७।