मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ५५
तथा वैदिक वाङ्मय में आये जनक के उल्लेखों से श्री बुल्के के अनुसार
हम मात्र किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि रामकथा के अन्य पात्रों की
अपेक्षा जनक वैदेह का अधिक उल्लेख प्राप्त है, किन्तु अर्वाचीन रामकथा
में ये दोनों अभिन्न माने जाते हैं। परन्तु वास्तव में दोनों की अभिन्नता
सिद्ध करने के लिये प्रमाण नहीं दिये जा सकते और यह स्वीकार करना
पड़ता है कि यहाँ पर कहीं भी यह उल्लेख नहीं प्राप्त होता कि सीता
जनक की पुत्री हैं, अथवा राम उनके जामाता हैं।¹
"किन्तु वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड, सर्ग ७१, श्लोक ४ के अनु-
सार मिथि के पुत्र प्रथम जनक हुए। वे इतने प्रतापी थे कि उनके नाम
से जनक-वंश ही चल पड़ा। उस जनक-वंश में ह्रस्वरोमा जनक के
दो पुत्र थे। छोटे का नाम कुशध्वज था और बड़े पुत्र सीता के पिता थे-
"तस्य पुत्रद्वयराज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मनः।
ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीरः कुशध्वजः ॥"² (वा.रा. १।७१।१३)
यद्यपि राजा जनक के नाम का उल्लेख यहाँ नहीं है तो भी
विष्णुपुराण (४।५।३०), वायुपुराण (८६।१५), ब्रह्माण्डपुराण
(३।६४।१५) एवं पद्मपुराण पातालखण्ड (५७।५) के अनुसार उनका
नाम सीरध्वज था। सीता के पिता सीरध्वज और जनक-याज्ञवल्क्य-
संवाद से सम्बद्ध जनक अभिन्न प्रतीत होते हैं। पुराणों के अनुसार सीता
के पिता महान् ज्ञानवान् और योगनिष्ठ थे। वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि
अपरिगणित महर्षियों से पूर्ण परिचित थे। साक्षात् विष्णुस्वरूप राम
के श्वशुर और महालक्ष्मीरूपा सीता के पिता होने का भी सौभाग्य उन्हें
प्राप्त था। इससे वैदिक जनक और रामायण के जनक की अभिन्नता
समझी जा सकती है, क्योंकि अभिन्नता का बाधक कोई प्रमाण विद्यमान
नहीं है³।"
'राम' नाम का उल्लेख भी वैदिक वाङ्मय में प्राप्त होता है।
ऋग्वेद के (१०।९३।१४) में राजा के रूप में राम का उल्लेख हुआ है-
“प्र तद् दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु ।
ये युक्त्वाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्नाव्येषाम्" ॥
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ६ ।
२. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ १७ ।
३. वहीं।