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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ १६०

१६० | क्षेमकुतूहलम्
शणपुष्पम्
क. विधि- शणपुष्प (सनई के फूल) को तक्र में स्वेदन (उबाल कर) करते हैं, इसे
तप्त तैल में हिंगु से सुगन्धित कर, अम्ल पदार्थ का चूर्ण मिश्रित करके-पाक
चूर्ण करते हैं।
ख. गुण-
१. सर | २. बल
३. असृक प्रदर | ४. मधुर
५. रुचिद | ६. मधुर विपाकी
७. रुचिवर्धन | ८. अल्प विबन्धकारक
(नाशक-४-८)
अथ मधूकपुष्पम्
सद्यश्च्युतं स्थूलमधूकपुष्पं
संशोधितं केसरधूलिवर्जितम्।
संपाचितं शुभ्रसिताघृताभ्यां
सजीरकं जीवनदं हि जीविनाम्॥ १७६॥
बृंहणीयं सुमधुरं मधूककुसुमं गुरु।
वातपित्तप्रशमनं हृद्यं रुच्यं मुखप्रियम्॥ १७७॥
इति पुष्पाधिकारः।
मधूक पुष्प
क. विधि- स्वयं-तुत्वारित (सद्यच्युत) पतित (गिरे हुए) मधूक के स्थूल (बड़े)
पुष्प (फूलों) को लेकर, पुष्प केशर को निकाल देते हैं, तथा जल से प्रक्षालित
(धोकर), शुद्ध कर लेते हैं। तदनन्तर, इस द्रव्य को घृत में भृष्ट जीरक (छोंक)
देते हैं, फिर श्वेत शर्कर मिलाकर, पाक कर लेते हैं। यह प्राणियों (जीविनाम्)
को जीवन (जीवनदंहि) प्रदान करता है।
ख. गुण-
१. वृंहणीय (मांस वर्धन) | २. सुमधुर
३. गुरु (गरिष्ठ) | ४. वातपित्त शामक
५. हृद्य | ६. रुच्य
७. मुख प्रियम् (मुँह को अच्छा बनाने वाला)
पुष्पाधिकार समाप्तः


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अथाष्टमोत्सवः | १६१
अथ पल्लवाः ।
अथ तोरई पत्र शाकम्
कोशातकीवल्लिभवाग्रपल्लवाः
सुपीडितास्तक्रयुताः सुसंभृताः।
संभर्जिताः सैन्धवहिङ्गुनाऽधिके
तैलेऽतिरुच्या तनुपुष्टिदायिकाः॥ १७८॥
कोशातकी पल्लव
कोशातकी (तोरई) नामक वल्ली (लता) के अग्रभाग में उपलब्ध पल्लवों
(कोमल पत्रों) को एकत्र करते हैं, जिनको तक्र (मट्ठा) में स्वेदिह (उबालकर) पीड़ित
(कर), पिण्डाकार बनाकर, अधिक मात्रा में तैल में, हिंगु (भृष्ट) कर सैंधव लवण
(छोंककर) भून लेते हैं (संभर्जितः)। इस रीति से सिद्ध शाक शरीर को दृढ़ता प्रदान
करता है, अतिरुचिंदायक है (अतिसच्च तनु हरदायिकाः)।
अथाम्रपल्लवाः
स्विन्ना निष्पीडिताः कामं कोकिलाहापल्लवाः।
घृतसिन्धूत्थसंंसिद्धा रुच्या रामठवासिताः॥ १७९॥
सर्पिषा खण्डयुक्तेन तलयेदाम्रपल्लवम्।
लवङ्गाद्र्रकसंयुक्तमरुचौ रुचिकारकम्॥ १८०॥
आम्रपल्लव
सर्वप्रथम कोकिलाहार (आम्र) के मृदु पत्रों या पल्लवों को एकत्र करते हैं; इनकी
घृत एवं खण्ड में तलते (तलयेदाम्रपल्लवम्) हिंगु (भृष्ट) सहित, इसी में लवंग (लौंग)
एवं आर्द्रक (अदरक) की चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। यह शाक अरुचि का निवारण कर,
रुचिकारक होता है।
अथ निम्बपल्लवाः
निम्बस्य कोमलतराणि दलानि भृष्ट्वा
स्वाज्ये क्षिपेत्तदनु सैन्धवयुक्ततक्रे।
शालेयतण्डुलकणैः सह रामठेन
वाधारितं ददति रोचनमेव लेह्यम्॥ १८१॥

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१६२ क्षेमकुतूहलम्
निम्ब पल्लव
क. विधि- निम्ब (नीम) अति मृदु (मुलायम) पत्तों (कोमलतराणि दलानि) को
एकत्र कर, घृत में भूनकर (स्वाज्ये क्षिपेत्तदनु), सैंधव मिश्रित तक्र में डाल देते
हैं तथा हिंगु (भृष्ट) से छौंकते हैं। इस सिद्ध (वाघारितम्)। इस रीति से सिद्ध ल
हम रूपी पाक शाक रोचन होता है (रुचिवर्धक)।
निम्बः शीतो लघुर्ग्राही दाहजित्त्वग्निकारकः।
व्रणपित्तकफच्छर्दिकुष्ठहृल्लासमेहनुत् ॥ १८४॥
इति पल्लवाधिकारः
ख. गुणः-
१. शीत २. लघु ३. ग्राही
४. दाहवित् ५. अग्निकारक ६. व्रण रोपण
७. पित्तजन्य रोगशामक ६. कफजन्य रोगहर ८. वमन शामक
१०. कुष्ठनाशक ११. हल्लास निरोधक १२. प्रमेहहर
पल्लवप्रमेद पूर्ण
अथ दण्डाधिकारः
दण्ड शाक
अथ कदलीदण्डशाकः
वृन्ताच्छिन्नः सलिलविधुतः कृत्ततन्तुः प्रयत्नात्
कम्बुभ्रान्ता जलविरहितोक्षारजम्बीरभृष्टः।
मध्ये मध्ये तनुसकलितश्राईकेनातिपूर्णः
स्वादुस्तूर्णं भवति सुतरां गर्भदण्डः कदल्यः॥ १८३॥
योनिदोषहरो दण्डः कादलोऽसृग्दरं जयेत्।
रक्तपित्तहरः शीतः सुरुच्यो बलवर्धनः॥ १८४॥
कदलीदण्डशाक
क. विधि- कदली (केले) को वृत्त को गर्भदण्ड से पृथक करके, तन्तुओ को
प्रयत्नपूर्वक निष्कासित कर देते हैं। इस शंख (कम्बुभ्रान्त्या) जैसा जल का भी
निष्क्रमण कर लेते हैं, फिर उसे (जल विरहित) क्षार तथा जम्बीर द्रव मे भृष्ट


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अथाष्टमोत्सवः १६३
करके (भून लेते) है। तथा बीच-बीच (मध्ये मध्ये) आर्द्रक खण्डों (छोटे) को
मिलाते जाते हैं। इसरीति से कदली गर्भदण्ड यथा शीघ्र अत्यन्त स्वादु (स्वादुस्तूर्णं
भवति सुतराम्) रूप में प्रस्तुत होता है।
ख. गुण-
१. योनिदोषहर २. असृग्दर (प्रदर) नाशक
३. रक्तपित्त शानक ४. शीत
५. सुरुच्य ६. बलवर्धन
अथ ढेहिशाकम्
संक्षुद्य तक्रेऽम्लतरे सुस्विन्नं
प्रतप्तमाज्ये नवढेहिशाकम्।
ससैन्धवं रामठदत्तवासं स्वाद-
न्नरो निन्दति व्यञ्जनानि ॥ १८५ ॥
ढेहिका वातला रूक्षा शीता गुर्वी विषापहा।
सुस्विन्ना रोचनी हृद्या अस्विन्न कण्ठकर्तरी ॥ १८६ ॥
ढेहिशाक
क. विधि- ढेहिशाक को संक्षुद्य (कुचल/आहत) कर, तक्र अम्ल मे सुस्विन्नं
(उबालकर) करने के बाद, तप्त आज्य (घृत) में भर्जित करते (भूनते) हैं। फिर,
सैन्धव तथा रामठ (हिंगू) चूर्ण से सुवासित कर लेते हैं। इस रीति से सिद्ध शाक
(ढेहि) का भोक्ता, अन्य समस्त व्यंजनों की निन्दा करेगा (नरो निन्दति व्यञ्जनानि)
अर्थात् ढेहिशाक के भक्षणोपरान्त अन्य सभी भोज्य पदार्थों का त्याग करने
(उसके समान स्वाद न होने के कारण) के योग्य समझता है।
ख. गुण-
१. वातकारक २. रूक्ष
३. शीत ४. गुर्वी (दुष्पाच्य)
५. विषनाशक
सुस्विन्न (सम्यक् रूप से उबाल हुआ) ढेहिशाक- १. रुचिकारक, २. हृद्य।
अस्विन्न ढेहिशाक- कण्ठकर्तरी (गले की काटने बला होता है।
अथ सार्षपः शाक
सार्षपः कोमलो दण्डः स्विन्नस्तक्रेण पीडितः।
तमतैले सुहिङ्ग्वाढ्ये भर्जिताः सैन्धवान्वितः ॥ १८७॥

१६४ क्षेमकुतूहलम्
सर्षप शाक
क. विधि- सर्षप (सरसों) के मृदु (कोमल) पत्र एवं नाल सहित दण्ड को (प्रक्षालन
करके) तक्र में सुस्वित्र करके (उबालते) हैं; इसे पीड़ित (निचोड़कर) पिण्डी बना
लेते हैं, जिसे हिंगु (भृष्ट) को तप्त तैल में, लवण के साथ, भर्जित करते हैं।
सार्षपी कन्दली सूक्ष्मा खण्डिता स्निग्धभाजने।
स्थापिता मण्डसहिता त्वथवा तण्डुलोदकैः॥ १८८॥
समरात्रात्परं चुक्रतुल्यं सम्यक्प्रजायते।
तत एव समाकृष्य तलयेद्वा प्रलेहयेत्॥ १८९॥
काप्यकेति समाख्याता सूदधर्मोपजीवकैः।
सार्षपं कटुतीक्ष्णोष्णं वातश्लेष्मव्रणापहम्॥ १९०॥
कृमिकण्डूहरं दद्रुकुष्ठघ्नं रुचिकारकम्।
सर्षप कन्दली
सर्

१६६ क्षेमकुतूहलम्
अथ सूरणशाकम्
अम्लीकापचूर्णेन मिश्रितेन जलेन वा।
काञ्जिकेनाऽथवा क्वाथ्यः सूरणो रौद्रताँ ज्यजेत् ॥ १९५ ॥
दिग्धो बाह्लीकतोयै रजनिरसयुतैर्गोचरे सूर्यमेरोः
संक्षिप्योत्क्षिप्य पात्रे तिलरससहिते साधितः सैन्धवेन।
जातः स्निग्धः सुगन्धिर्मरिचपरिचितः पाकरागं दधानो
दुर्नामघ्नस्तु कन्दः सपदि मदयते प्रार्थितो जाठराग्निम् ॥ १९६ ॥
सूरण शाक
क. विधि- १) चिंचा (अम्लीका) पत्रों (चूर्ण) के जल अथवा कांजिक में क्वथित
(उबाला हुआ) सूरण अपना रौद्ररूप (भयंकरता) का परित्याग कर देता है।
२) सूरण ग्रह सुमुहूर्त में सम्पन्न करने का विधान है- उदयाचल मेरुपर्वत (सूर्यमेरोः)
के ऊर्ध्व गोचर (रजनिरसयुतैर्गोचरे) होने पर सूरण कन्द उबाल (स्वेदन) करके
(वल्कलसहित रहित अवस्था में काटकर) रजनिरस (हरिद्रा रस) तथा हिंगु जल
(बाह्लीक तोय) के साथ, तिलतैल (तिल रस सहित) युक्त पात्र में- सैन्धव
सहित-पाक कर लेते हैं, एवं फिर सुगन्धित पदार्थ तथा मरिचचूर्ण कर मिश्रण
कर देते हैं।
ख. गुण- इस सूरण कन्द शाक का सेवन से दुर्नाम (अर्श) का नाश होता है तथा
पाचकाग्नि प्रदीप्त हो जाती है।
कन्दस्तूदरमृत्तिकाभिरहितः संवेष्टितोऽसौ मृदा '
कारीषानलपाचितस्त्वगयुतः क्षोदीकृतो मिश्रितः।
शुद्धः सैन्धवतैलजीरकरजज्जम्बीरनारार्द्रकै-
र्जड्यं पाण्डुरता तथैव हरते वह्नेरयं पूरणः ॥ १९७॥
सूरण कद शाक : अन्य प्रकार
अ. सूरण कन्द की प्राकृतिक चिपकी मृत्तिका (भूमिगत) को निष्कासित-स्वच्छ
करके, मृदा (मिट्टी) का अविष्टन (लेप) करते हैं; इसको करीषानल (उपलों की
आग) में पका लेते हैं। जब शीतल हो जाये, तब वल्कल (त्वक्) विहीन करके,
क्षोदित (मसलकर) भर्त्ता बनाते हैं, जिसमें सैन्धव, तिल तैल, जीरक चूर्ण,
परिपक्व जम्बीर रस एवं आर्द्रक का मिश्रण कर देते हैं।।१९७।।


अथाष्टमोत्सवः १६७
इस प्रकार का सूरणकन्द (भर्त्ता रूप) शरीर जाड्य (जड़ता) एवं पाण्डु रोग नाशक
हैं, एवं पाचकाग्नि वर्धन होता है।
सूरणं कटुतैलेन तलित्वाऽम्लरसैः सह।
शोषयेद्वेसवाराढ्यं यथा भोक्तुरभीप्सितम् ॥ १९८ ॥
आ. स्विन्न सूरण कन्द (उबाले हुए) सूरणकन्द (त्वक् रहित) को काटकर, कटु तैल
(सरसों के तैल) में तलन करते हैं (तलते हैं) इसमें अम्लरस के साथ वेसवार
(मसाला) छोड़कर, शुष्क करते हैं अथवा भोक्ता की इच्छानुसार (रुचि) के
अनुसार निर्माण करना चाहिए।
मृल्लिप्तं सौरणं कन्दं पक्त्वाऽग्नौ पुटपाकवत् ।
अद्यात्सपैललवणं रामठेनानुवासितम् ॥ १९९ ॥
इ) मृत्तिका आलेपित सूरण कन्द (मृल्लिप्तम्) को पुटपाक विधान के अनुसार
अग्नि में पाक करते हैं, फिर हिंगु (भृष्ट) को तैल तथा सैन्धव में सुगन्धित
बनाकर प्रस्तुत करते हैं।
सूरणोऽग्निकरो रूक्षः कासार्शःकर्तनो लघुः ।
सन्धानयोगसंप्राप्तादस्तिगुणकारकः ॥ २०० ॥
ई) सूरण कन्द अग्नि (पाचकाग्नि) वर्धन तथा रूक्ष है, कासहर, अर्श (कर्तन) एवं
सुपाच्य है (संधान योग संप्राप्तम्) संधान विधि से निर्माण करने पर, इसके
गुणों में वृद्धि हो जाती है (अस्तिगुण कारक)।
अथ मृणालकन्दशाकम्
बिसाङ्कुरा भोक्तृशोङ्कुरोथिताः
समाहृताः कृष्पलगादगाधतः ।
संकृत्तखण्डास्तनुतारकप्रभाः
प्रलेहयोगैः सुधिया विपाचिताः ॥ २०१ ॥
मृणालं दुर्जरं शीतं पिच्छलं कफवातकृत् ।
कषायं मधुरं स्वादु विष्टम्भाध्मानकारकम् ॥ १०२ ॥
मृणालकन्द शाक
क. विधि- भोक्ता के यश को अंकुरित (वृद्धि) करनेवाले, मृणालकन्द-बिसांकुर

१६८ क्षेमकुतूहलम्
(भिंसौड़ा-भिस) को कष्यज (अगाधजल) से निष्कासित कर, दुर्बल तारा के प्रकाश
(अनुतारकप्रभवः) में कन्द के छोटे-छोटे खण्ड टुकड़े (सकृत्त खण्डाः) बना लेते
हैं; इसको प्रलेह-विधि से बुद्धिमान् (सुधिया) मनुष्य पाक करते हैं (विपाचिताः)।
ख. गुण- १. दुर्जर (दुष्पाच्य) २. शीत (शीतल)
३. पित्तनाशक ४. कफ जनन
५. वातजनन ६. कषाय रस
७. मधुर रस ८. स्वादु (स्वादिष्ट)
९. विष्टम्भ (मलावरोधक) १०. आध्मान कर
संख्याऽनन्ता कति कति न ते शाकपाकप्रभेदाः
किं तैरुक्तैरहितविरसैरल्यसत्त्वप्रदुष्टैः।
मूलं पत्रं कुसुममथवा पल्लवंवा फलं वा
भक्त्या राद्धं भवति चतुरैः सर्वमेवातिरुच्यम्॥२०३॥
शाक पाक : सामान्य ज्ञातव्य
अ. शाक संख्या- अनन्त संख्य युक्त शाक क्या पाक भेद से नहीं हैं अर्थात्
शाकों की संख्या अपरिगणनीय है, परन्तु उनका नामोल्लेख का वर्णन करने से
कोई लाभ नहीं, जो अहितकर, विरस, अल्प सत्त्वं (बलहीन) तथा प्रदूषित होते
हैं।
आ. स्वभक्ति पाक- मूल, पत्र, कुसुम (पुष्प), पल्लव (नवीन पत्र) तथा फल
(कन्द-दण्ड-नाल सहित)- ये जो भी शाक (वर्गों में उल्लिखित) हैं ये सभी
शाक चतुर (बुद्धिमान) सूपदक (पाचक) पर निर्भर करता है, कि वह श्रद्धापूर्वक
(भक्ति से) इनका पाक करे, तब ये शाक उत्पन्न रुचिकर (सर्वमेतातिरुच्यम्)
सिद्ध होते हैं।
अतिजीर्णमकालोत्थं रूक्षंसिद्धमभूमिजम्।
जरठं कोमलं चातिशीतव्यालादिदूषितम्॥२०४॥
तत्स्र्वं वर्जनीयं हि भिषजा हितकारिणा।
सुशुष्कं सकलं शाकं नाश्नीयान्मूलकैर्विना॥२०५॥
अथाष्टमोत्सवः १६९
इ. वर्जित शाक
इन शाकों या उनकी विशिष्ट अवस्थाओं को निषिद्ध शाकों की श्रेणी में रखा गया
है, यथा-
१. अत्यन्त जीर्ण (जीर्ण-शीर्ण स्थिति)
२. अतिरूक्ष (बहुत शुष्क)
३. निकृष्टस्थानोत्पन्न (निन्दनीय स्थल में उगा हुआ)
४. अतिपुराण (बहुत पुराना)
५. अतिकोमल (बहुत मुलायम)
६. हिम, सर्प आदि से दूषित (शीत व्यालादि दूषित)
७. अकालोत्थ (असमय-ऋतु के विपरीत उत्पन्न)
इन समस्त प्रकार के शाक-द्रव्यों को भिषक् (महानस से सम्बन्धित) को वर्जित
कोटि में रखना चाहिए। समस्त प्रकार के शुष्क शाकों का भक्षण नहीं करे,
(सशुष्कशाकम्), परन्तु मूलक शाक सेवनीय होता है।
सर्वं शाकमचक्षुष्यमजिग्नेयमपौरुषम्।
विना पटोलवास्तूककाकमाचीपुनर्नवाः॥२०६॥
हानिकारक शाक
१. पटोल (परवल)
२. वास्तुक (बथुआ) इन चार प्रकार के शाकों (१-४) को छोड़कर सर्वप्रकार
३. काकमाची (मकोय) के शाक नेत्र, नासा तथा पौरुष (पुरुषत्व) के लिए
४. पुनर्नवा (सोठी) हानिकर होते हैं।
सर्वासां शाकजातीनां प्रकारः कथितो मया।
सन्धानवटकादीनामुच्यते तदनन्तरम्॥२०७
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मत्स्यमांसप्रशंसनो नामहृष्टमोत्सवः।।८।।
उपसंहारात्मक रूपरेखा
मैंने समस्त प्रकार के शाको के प्रकारो भेदो-जातियो) का वर्णन किया है। इसके
पश्चात् (आगामी उत्सवनवम मे) सन्धान तथा वटक के विषय में वर्णन करेंगे।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का विविधशाक
निर्माण वर्णन नामक आठवां उत्सव समाप्त॥

पृष्ठ १

अथ नवमोत्सवः
(नौवा प्रकरण)
अथ संधानकम्
राजिकाजीरलवणनिशाढ्ये कटुतैलके।
फलं मूलं च पुष्पं च घर्मे स्थाप्यं दिनत्रयम्॥ १॥
ततश्चाम्लतरं जातं शीघ्रं संधानकं स्मृतम्।
संधान विधि
राजिका (राई) जीरक (जीरा), लवण (सेंधानमक) तथा निशा (हरिद्रा-हल्दी)- इन
समस्त द्रव्यों को सम्मिलित करके, कटु तैल (सर्षप तैल-सरसों के तैल) में, फल (जड़),
मूल (कन्द) जड़। तथा पुष्प (फूलों) को डालकर, दिनत्रय (तीन दिनों) की अवधि तक
घर्म (सूर्य की रोशनी-किरणों के प्रकाश) में स्थापित कर देते हैं। इस प्रकार, यह मिश्रण
अम्लतर (अधिक अम्लयुक्त-अधिक खट्टा) ही जायेगा। इस मिश्रण को 'संधानक' या
संधान कहा जाता है॥११/२॥
निम्बाम्रबिम्बिवार्ताकमार्द्रकं त्रपुषीफलम्॥ २॥
कूष्माण्डबिल्वमरिचं पिप्पलीविशतिन्दुकम्।
सूरणं कदलीकन्दो मूलकं बंसजाङ्कुरः॥ ३॥
इत्यादिबस्ततजातं हि सन्धेयं दृष्टकर्मणा।
वार्ताकं तेषु सुस्वेद्य सन्धेयं चान्यदामकम्॥ ४॥
एवं निम्बादिकं सर्वं कटुतैले विनिक्षिपेत्।
स्थापयेद्वर्षमात्रं तु तदूर्ध्वं नैव युज्यते॥ ५॥
विभिन्न द्रव्यों का संधानक
१. निम्ब (नीम) २. आम्र (आम) ३. निम्बी (कन्दूरी)
४. वार्ताक (बैंगन) ५. आर्द्रक (अदरक) ६. त्रपुषीफल (खीरा)
७. कूष्माण्ड (कुंहड़ा) ८. बिल्व (बेल) ९. मरिच (काली मिरच)
१०. पिप्पली (छोटी पीपल) ११. विश्वा (सोंठ) १२. तिन्दुक (तेंदू)


पृष्ठ २

नवमोत्सवः १७१
१३. सूरण (जिमीकन्द) १४. कदली कन्द (केला) १५. मूलक (मूली)
१६. वंशजाङ्कुर (बाँस अंकुर)
इन द्रव्यों का संधान करने हुए, जिस व्यक्तियों ने इस विधि का प्रत्यक्षकर्म
(दृष्टकर्मणाम्) का अभ्यास किया हो या अवलोकन (प्रत्यक्ष कर्माभ्यास) कर रखा हो,
उसके द्वारा (या संधान कर्म ज्ञाता के निर्देशन) संधानक तैयार करना चाहिए।
इस संधान कर्म में वृन्ताक (बैंगन) को सुस्वेद्य (उबाल कर अल्प स्वेदन) करके
प्रयोग करते हैं, जबकि अन्य द्रव्यों (१-१६) को आमरूप (कच्चा-अस्वेद-बिना
उबाले हुए) प्रयोग किया जाता है।
इन समस्त द्रव्यों (उपरोक्त नामांकित-१-१६) की कटु तैल (सर्षप तेल-सरसों
के तैल) में डालकर, एक वर्ष की अवधि पर्यन्त स्थापित कर देते हैं। (एक साल तक
रखा रहे)। तदुपरान्त इस 'संधानक' की प्रक्रिया पूर्ण होने पर उपयोग में लाते हैं, परन्तु
इस (संधानक को) एक वर्ष के उपरान्त (एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर) करने का निर्देश
(अनुमति) नहीं है॥२-५॥
अथ लावासन्धानकम्
लावकान् मत्स्यखण्डान् वा स्वेदयेदिक्षुजे रसे।
कृत्वा फाणितमध्ये तु तैले वा सर्षपोद्भवे॥ ६॥
स्थापिताः सर्वकालं तु तिष्ठन्ति वै हि तादृशाः।
लावासंधानक
लावा (पक्षी) का मांस या मत्स्य (मछली) के खण्डों (टुकड़ों) को इक्षुरस (गन्ने
के रस) में स्वेदन (उबाल) कर, फाणित (राब) के बीच (मध्य) में अथवा सर्षपोद्भूत
(सरसों के) तैल में रखते हैं। इसको इस विधि से स्थापित करने से अपने स्वरूप में
ही सदैव रहते हैं (स्थापिताः सर्वकालं तु तिष्ठन्ति वै हि तादृशः)॥६१/२॥
अथ तित्तिरिसन्धानम्
स्विन्नन्निर्गलिते दध्नि तैले पक्त्वाऽथ तित्तिरिम्॥ ७॥
तदेव तैलसंयुक्तं निम्बुकस्य रसे न्यसेत्।
तित्तिर संधानक
तित्तिर (तीतर) के मांस (के टुकड़ों) को दधि (दही) में उबाल करते हैं, तथा

१७२ क्षेमकुतूहलम्
छानकर तैल में पाक करते हैं तथा फिर निम्बूक स्वरस में मिलाकर रखा रहने देते
हैं।।७^१/_२।।
अथ वाराहब्रध्नसन्धानम्
वाराहाजिनमुद्धृत्य निशाराजिसैन्धवैः ॥ ८ ॥
तीक्ष्णे घर्मेऽतिसंशुष्कं क्षालितं हिङ्गुसंयुतम् ।
सनिम्बकरसं शुष्कं क्षिपेत्तैले सनिम्बुके ॥ ९ ॥
वाराहब्रध्न संधानक
वाराह (सूअर) के मांस-त्वक (चमड़ा निष्कासित-अजित) रहित करके-प्रक्षालन
कर, शुष्क कर लेते हैं; फिर हिंगु, हरिद्रा, राजिका तथा सैंधवलवण मिलाकर तीक्ष्ण
घर्म (तीव्रधूप) में रखकर; शुष्क कर (सुखा) लेते हैं, तथा निम्बूक स्वरस को
मिलाकर, फिर शुष्क कर लेते हैं। इसके बाद मांस को निम्बूक स्वरस सहित, तैल में
डालकर रखते हैं।।८-९।।
अथ मत्स्यसन्धानकम्
खण्डा मत्स्यस्य तैलेन सुपक्वाः कोष्ठासंभवाः।
स्थापिताः सार्षपे तैले सदा तिष्ठन्ति तादृशाः ॥ १० ॥
सर्वं पित्तकरं प्रोक्तं सन्धानं रुचिकारकम्।
वातहृद्द्रस्तुभेदाच्च संविचार्य गुणागणम् ॥ ११ ॥
मत्स्यसंधानक
क. विधि- मत्स्य (मछली) के कोष्ठांगों के खण्डों (टुकड़ों) को सर्षप तैल में
भलीभांति पक्व करके, इसी तैल में स्थापित कर देते है, जिससे वह एक समान
ही रहेगा।
ख. मत्स्यसंधानक-गुण-कर्म
१. समस्त संधानीय द्रव्य पित्तकारक (सर्वं पित्तकरम्), रुचिकारक, वातहृत्।
२. द्रव्यों के भेद-गुण तथा दुर्गुण (गुणागुणम्) विचारणीय (संविचार्य)
अथ वटिकावटकप्रकारः
अथ पिष्टशुष्कवटी
तप्ततैले विनिक्षिप्ता वटिका माषपिष्टजा ।
नवमोत्सवः १७३
तलिता तक्रसिक्ता च शुष्कीकृत्य प्रचालिता ॥ १२ ॥
अथवा क्वथिते तक्रे सर्वोपस्करसंयुते ।
मांसप्रलेहवत्पाच्या वटी पिष्टसमुद्भवा ॥ १३ ॥
वटिकावटक प्रकार
पिष्टशुष्कवटी- माष (उड़द) की पिष्ट (पिट्ठी) बनाकर तप्त तैल (सरसों के
तैल) में डालकर तलन करें (तलते हैं)। इसकी तक्र (मट्ठा) में डाल देते हैं, अथवा
शुष्क करके (सुखाकर) कर रखते हैं। इसमें सर्व उपस्कार (मसाल), लवण आदि-
हिंगु, तैल आदि सहित) मिलाते हैं। इसको क्वथित (उबाले हुए) तक्र (मट्ठे) में मिश्रण
करके, प्रलेह विधि के अनुसार पाक किया जाता है। इस निर्माण को 'पिष्टवटी'
कहते हैं।
अथार्द्रपिष्टवटी
तैले पक्त्वा वटीं तप्ते रन्धयेद्वेसवारकैः।
सर्वद्रव्यसमायुक्तैर्वटीतुल्यं च रन्धयेत् ॥ १४॥
आर्द्रपिष्ट वटी
माष (उड़द) की पिष्ट (पिट्ठी) तैयार करके, गर्म (तप्त) तैल में डालते हैं, इसमें
वेसवार (मसाल, लवण तथा हिंगु सहित) पाक करते हैं, अथवा समस्त द्रव्यो का
मिश्रण करके, वटी के समान पाक करना चाहिए।।१४।।
अथ धूमांसी वटिका
धूमांसीवटिकाऽप्येवं स्थूला तैलेन पाचिता ।
मेलिता संस्कृते तक्रे क्वथिते च मनोरमे ॥ १५ ॥
माषस्य वटिका हृद्या बल्या पुष्टिप्रदायिनी ।
वातहच्छुक्लला सा च तलिताऽथ प्रलेहिता ॥ १६ ॥
धूमांसी वटिका
धूमांसी (पंचांग) को ग्रहण-स्वच्छ करके वटी तथा वटिका का निर्माण किया
जाता है (इसके लिए पूर्ववत् विधि के अनुसरण करना चाहिए। इसको तप्त तैल में
पका लेने हैं, तथा राजिका, हिंगु, लवण आदि सहित, क्वथित (उबाला हुआ) मनोहरी
तक्र (मट्ठे) में मिला देते हैं। यह पदार्थ तैयार हो गया है- भोज्य द्रव्य के रूप में
उपयोगी है।
क्षे. कु. 12

१७४ क्षेमकुतूहलम्
क. माष वटिका (कर्म-गुण) - माष (उड़द) की वटिका के विशिष्ट गुण निम्नोक्त हैं:
१. हृद्य २. बल्य ३. पुष्टिप्रदायिनी
४. वातहृत् ५. शुक्रत्
ख. विधि- यह वटिका को तल कर (तलित) या प्रलेह बनाकर प्रयोग करते हैं। इन
दोनों भेदों (प्रकारों) में माष वटिका तथा माष प्रलेह-के गुण-कर्म लगभग एक
समान (जो उपरोक्त हैं) होते हैं॥१५-१६॥
अथ माषपिण्डेण्डरी
माषस्येण्डरिकां कृत्वा खण्डशः सैन्धवान्विताम्।
रन्धयेद्वेसवारेण तैले पक्वा वटीसमाम्॥१७॥
माषपिण्डेण्डरी (माषेण्डरी)
सैंधव लवण युक्त मांस (उड़द) की इण्डरी (विशेष आकार के कारण नामकरण)
को खण्ड (टुकड़ा-टुकड़ा) करके बनाते है- तैल में वटी के पाक करें- मसाला
मिलाकर पकाते हैं। इसको 'भाषस्येण्डरिका' कहा जाता है॥१७॥
अण्डरी शुक्रदा वृष्या रूक्षा विष्टम्भकारिणी।
कफवातहरा प्रोक्ता माषपिष्टभवेण्डरी ॥१८॥
मुद्गपिष्टिकयाऽप्येवं विधाय वटिकां वटीम्।
तप्ततैले वेसवारसंयुक्ते रन्धयेद्वटीम्॥१९॥
माषपिण्टेण्डरी
क. माष की इण्डरी, शुक्रदा, वृष्या, रूक्षा, विष्टकारिणी तथा कफवातहर होती हैं
(उड़द की वटी/वटिका या बरी-बड़ी/ वाड़ा-बारा)।
ख. मुद्ग (मूँग) की पिष्टी (पीठी-पिट्ठी) से वरी या वटिका बनाकर, (उपरोक्त रीति
से), तप्ततैल में बेसरवार (लवण सहित) पाक करते हैं (रन्धयेद्वटीम्)।
अथ मुद्गेण्डरी
बाल्हीकजीरकनवार्द्रकपूर्णगर्भा
बाह्ये जातपचना नवमुद्गपिण्डा।
चूर्णीकृता सुरभिहिङ्गुकृताधिवासा
मन्दानलस्य रुचिदा न भवेत् कस्य॥२०॥


नवमोत्सवः १७५
मुद्गस्य बहुधा भक्ष्याः शीतला लघुपाचकाः।
त्रिदोषशमनाः प्रोक्ता रुच्याः संस्कारयोगतः॥२१॥
मुद्गेण्डरी
क. विधि- नव मुद्ग पिण्ड (मूँग से बने नये पिण्ड) में हिंगु, जीरक तथा नवार्द्रक
को पूरण करके, बाह्यरूप से पाक कर लेते हैं। तथा इसको चूर्ण (उद्घूलन)
द्वारा सुगंधित पदार्थों से सुवासित कर देते हैं।
आफ. यह (इस रीति से) निर्मित द्रव्य किसकी मन्दाग्नि की प्रदीपक नहीं
होता- इसका तात्पर्य है कि यह समस्त व्यक्तियों की पाचकाग्नि की वृद्धि
(दीपन) करने का कार्य करता है, विशेषरूप से जिन्हें मन्दाग्नि हो जाती है
(मन्दानलस्य रुचिदा न महेत्तु कस्य)।
ख. गुण-कर्म- विविध प्रकार के भक्ष्य पदार्थों के पाचन में सहायक एवं लघु,
(सुपाच्य), शीतल, लघु पाचक (पचने में हल्का या सुपाच्य), त्रिदोषशामक
तथा रुचिवर्धक होता है, यह संस्कार योग की गुण रखता है अर्थात् अन्य द्रव्यों
के संयोग से, उनके गुणों का ग्रहण करता है॥२०-२१॥
अथालीकमत्स्येण्डरीनिर्माणम्
नागवल्लीदलं ग्राह्यं वेसवारेण लेपितम्।
माषपिष्टकया लिप्तं संप्रसार्य समावृतम्॥२२॥
स्विन्नमाखण्डितं तैलं भृष्टं हिङ्गुसमन्वित्।
रन्धयेद्वेसवाराम्लैरलीका मत्स्यका इमे॥२३॥
अलीकमत्स्यका रुच्या बल्या वृष्यातिपुष्टिदाः।
वातहृच्छुक्रलाः प्रोक्ताः किञ्चित्पित्तप्रकोपकाः॥२४॥
अलीकमत्स्येण्डरी
क. पान-ताम्बूल (नामवल्लीदल) के पत्र पर वेसवार (मसाले) का आलेपन करते
हैं, फिर माप-पिष्टी (उड़द की पिट्ठी) का मोटा लेप (फैलाकर-लपेटकर) लगाते
हैं, (लिप्तं प्रसार्य समावृतम्), तदनन्तर, इस (पान के पत्ते) को स्विन्न (उबालकर)
करके खण्डित (टुकड़ा-टुकड़ा) कर लेते हैं। तत्पश्चात् उसको तप्त तैल में,
हिंगु का लेप लगाकर (भृष्ट) भूनते हैं, फिर इसमे वेसवार तथा चिंचा चूर्ण
मिश्रित कर पकाते हैं।

सप्तम से द्वादश उत्सव: फल-संरक्षण, पेय-पदार्थ, भोजनामृत व उपसंहार

Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image:

[Left Page]
१७६ क्षेमकुतूहलम्
ख. गुण-कर्म (अलीकमत्स्येण्डरी)
१. रुच्य (रुचिवर्धक) २. वल्य (बलकारक)
३. वृष्य (वाजीकरण) ४. पुष्टिदा (अति)
५. वातहृत् (वातनाशक) ६. शुक्रजनन (वीर्य उत्पादक)
अथ वेसनस्य वटकनिर्माणम्
आलोड्य वेसनं तोये क्वाथयेद्धिङ्गुना युते।
पाके घनत्वं विज्ञाय तदुत्तार्य समे क्षिपेत्॥ २५॥
पीठे हस्ततलाघातैरिदं च पुटयेत्ततः।
अलीककन्दखण्डाख्यं खण्डितं दीर्घसूक्ष्मकम्॥ २६॥
टिण्टीबिम्बीफलाकारं कार्येद्वहुधा त्विदम्।
तप्ततैले ततः पाच्यं रन्धयेद्वेसवारितम्।
शुष्कं प्रलेहितं वापि वटिकेव प्रपाचयेत्॥ २७॥
वेसन वटक-प्रलेह
वेसन (वेसन) को जल में (आलीड्य वेसनं तोये) द्रवित (घोल) कर तथा हिंगु
मिश्रित करके उपग्नि पर पाक करते हैं, जब यह पदार्थों (पाकाधीन-क्वाथ हेतु) घनत्व
या गाढ़े होने की अवस्था (पाकै घनत्वं विज्ञाय) आ जाने पर, किसी समतल पात्र में
निकाल लेते हैं। फिर पीठ पर, हस्ततल से (मर्दन) द्वारा संपुटित (लम्ब-स्थूलकन्दाकार)
किया जाता है। इस खण्ड (टुकड़े) से विविध प्रकार की फलों की आकृतियाँ, जैसे
टिंटी/करीरफल, बिम्बी कन्दूरी) बना कर, तप्त तैल में वेसवार मिलाकर पका लेते हैं
(रंघयेत्)।
इस वाटिका की शुष्क (सूखा) अथवा प्रलेह-दोनों रूपों में पाचन (निर्माण)
किया जा सकता है॥२५-२७॥
अथ पक्ववटीनिर्माणम्
तोयेन वेसनं लोड्यं मथितं हिङ्गुना सह।
तप्ततैले प्रदातव्या वट्यामलकमात्रया॥ २८॥
वेसवारयुते तक्रे क्वथिते वेसनान्विते।
तत्र सा वटिकाक्षिप्ता नाम्ना पक्ववटी स्मृता॥ २९॥


[Right Page]
नवमोत्सवः १७७
आह्लादिका मृगदृशा मृदुना स्वरेण
स्पष्टस्वरैरपि विलोलितसर्वगात्र।
स्नेहाधिका सुमधुराऽरुणसर्वदेहा
नीराहराऽतिरुचिरा च वटी च चेटी॥ ३०॥
पक्व वटी
क. विधि- जल में हिंगु सहित वेसन घोलते हैं (लोड्य-मथित) तथा मथते (फेंट
लेते) हैं। इस पदार्थ की आमलक के आकार की वटी बनाकर, तप्त तैल में
डालकर पकाते हैं (छान लेते)। फिर वेसवार (मसाला) तथा वक्र के साथ वेसन
वटिका (बड़ी) को डाल देते हैं (सिप्त्वा)- इस निर्माण को 'पक्व वटी' नाम
दिया गया है (नाम्ना पक्व वटी स्मृता)।
ख. गुण-कर्म-प्रभावस्वरूप आदि
१. आह्लादिक (मन को प्रसन्न करने वाली)
२. मृगदृशा (मृग के समान नेत्र)
३. स्पष्ट स्वरैरपि विलोलित सर्वगात्रा (स्पष्ट स्वर से सम्पूर्ण शरीर में संवेदना-गति
उत्पन्न करने वाली)
४. स्नेहाधिका सुमधुरारुण सर्वदेहा (अश्रु प्रतिरोधक-वेटी के समान मृग नेत्र सत्
कोमल मन को प्रसन्नतादायक)।
५. नीराहराऽतिरुचिरा च वटी च वेटी) (परिपाक के समय स्पष्ट स्वरों के साथ
सम्पूर्ण अंगों में कम्पन+उत्पादक)।
६. अधिक तैलादि स्नेह, युक्त, मधुर तथा अरुण वर्णयुक्त, रस से भरी हुई वटी
या चेटी अति रुचिवर्धन होती है।
अथ संस्कृतचणकस्य गुणाः
चणकः कृतसंस्कारः कफघ्नो लघुदीपनः।
शीतलो रूक्षविष्टम्भी वातकृत्पुंस्त्वनाशनः॥ ३१॥
संस्कृत चणक
गुण-कर्म- विविध प्रकार से संस्कृत चणक (चना) तथा उससे निर्मित पदार्थों
के गुण इस प्रकार हैं-

१७८ क्षेमकुतूहलम्
१. कफघ्न (कफनाशक)
२. लघु (सुपाच्य)
३. दीपन (जाठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला)
४. शीतल (शीत कारक)
५. रूक्ष (रूक्षता कारक)
६. विष्टम्भी (दुर्ज्जर-विवन्धकारक)
७. वातकृत् (वात उत्पन्नकर्त्ता)
८. पुंसखनाशन (पौरुष हेतु हानिकर)
अथ वटकप्रकारनिरूपणम्
माषपिष्टिकया कृत्वा बृंहणाः वटकास्ततः।
अनल्पतैलसंपक्वा मेलिता घोलके रसे॥३२॥
कार वटक
माषपिष्टी (उड़द की पिठ्ठी) के बड़े वटक बनाकर, अल्प तैल में पकाकर,
घोल- दधि से निर्मित- में डाल देते हैं (मेलिताघोलके रसे)॥३२॥
मरिचार्द्रकजीरकसैन्धव
त्वचबाह्लीकनतान्तमिश्रिताः।
तलितास्तिलतैलमध्यगाः
प्रश्रुताः कोरवटा रुचिप्रदाः ॥ ३३॥
मरिच, आर्द्रक, जीरक, सैंधव, त्वक् (दालचीनी) तथा बाह्लीक (हिंगु) मिश्रित
कर, तैल में तलित (तला हुआ) तथा घोलक (दधि निर्मित) में डाला हुआ, माषपिष्टी
से निर्मित वटक-कोरवटक (बड़े) तैयार हो जाते हैं।
इनका सेवन करने से भोजन में रुचि वर्धन होता है॥३३॥
अथ भीमवटकनिर्माणम्
हिङ्गुजीराम्रचूर्णैस्त्वचमरिचयुतैराद्रैर्कैः पूर्णगर्भः
स्निग्धस्तब्धस्वरूपः परिमलबहुलः कोमलः कुङ्कुमाभः।
भग्नौ दन्तान्तराले मुरुमुरुलरवोल्लापको व्यक्तशब्दः
सो धन्यानां मुखेषु प्रविशति वटको भीमयोगेनसिद्धः॥३४॥
नवमोत्सवः १७९
बल्यो वातहरः कोरो वटो विष्टम्भिपिक्तकृत्।
आह्लादजननः प्रोक्तो दाहकारी तृषाकरः॥३५॥
भीम वटक
क. विधि- हिंगु, जीरक, आम्रचूर्ण (शुष्क आम का चूर्ण), त्वक (दारुसिता),
मरिच, आर्द्रक- इन द्रव्यों से पूरित (पूर्णगर्भ), स्निग्ध-एवं स्तब्ध रूप युक्त,
अधिक सुगन्धित, मृदु (कोमल) तथा कुंकुम सदृश (केशर के रंग वाला),
दन्तान्तराले भग्न होकर मुरु-मुरु शब्द करनेवाला (मुरुमुरुलरवोल्लापको व्यक्तशब्दः)
भीम (कर्पूर) योग से निर्मित वटक (बड़ा) मुख में प्रवेश करता है (सीधन्यानां
मुखेषु प्रविशति)- उनके जो भाग्यशाली भोक्ता (खाने वाले) है।
ख. गुण-कर्म-कोरोवटक भीम वटक के गुण इस प्रकार हैं-
१. वल्य (बलदायक) २. वातहर (वातनाशक)
३. विष्टम्भि (दुर्ज्जर मलावरोधक) ४. पित्तकृत् (पित्तजनक)
५. आह्लाद जनन (प्रसन्नतादायक) ६. दाहकारी (जलन उत्पन्न करनेवाला)
७. तृषाकर (प्यास की वृद्धिकारक)
अथ घोलवटकनिर्माणम्
आभैरवं प्रचुरसैन्धवशृङ्गवेर-
बाह्लीकजीररिरचैर्मिलितोऽल्पभागैः।
संस्थापितः सुरभिणो मथितस्य मध्ये
कस्येति घोलवटको रुचिसंप्रदोऽस्तम् ॥ ३६ ॥
घोलवटक
सैन्धव (अधिक/प्रचुर), अर्द्रक (अल्पमात्रा), हिंगु, जीरक तथा मरिच- समस्त
द्रव्यों का चूर्ण मिश्रित आदि सुगन्धित दधि (मथित जलरहित) के बीच (मथितस् मध्ये)
रखें (संस्थापित) यह 'घोलवटक' होता है। इस प्रकार का 'घोलवटक' किसकी रुचि
की वृद्धि नहीं करेगा (कस्येति रुचि संप्रदोऽस्तम्) अर्थात् घोलवटक भोक्ता समस्त
व्यक्तियों की रुचिवर्द्धन करता है॥३६॥
माष्यस्य वटको हृद्यो बल्यः शुक्रकरो गुरुः।
विष्टम्भी घोलसंयुक्तोऽविदाही पवनापहः॥३७॥

१८० क्षेमकुतूहलम्
भाववटक (उड़द का वटक-बड़ा) इन गुणों का सम्पादन करता है-
१. हृद्य (हृदय की बलकारक) २. बल्य (शरीर का बलवर्धक)
३. शुक्रकर (वीर्य संजनन) ४. गुरु (भारी दुष्पाच्य)
५. विष्टम्भी ( ) ६. उपविदाहो (घोल से युक्त वटक)
७. पवनापह (वातनाशक)
अथ क्वथितवटकनिर्माणम्
सधान्यं वेसनं तक्रं वस्त्रे निर्गाल्य क्वाथयेत्।
ततः शुण्ठीं जीरकं च हिङ्गु निःक्षिप्य साधितम्।
क्वथिताख्यमिदं प्रोक्तं वटाः स्युस्तेन संयुताः॥३८॥
क्वथित वटक
धान्यक चूर्ण युक्त वेसन को तक्र में घोल बनाकर तथा कपड़े से छानकर (वस्त्रे
निर्गाल्य क्वाथयेत) पाक करते हैं। इस घोल में शुण्ठी, जीरक का हिंगु का मिश्रित चूर्ण
डालकर पकावे के बाद वटक डाल देते हैं। इस प्रकार घोल वटक का निर्माण हो जाता
है॥३८॥
अजाजी बाह्लीकार्द्रकमरिचसिन्धूत्थभरितः
स्वपाकात्स्वादीयान्दधिमथितदालीविरचितः।
कृतैलासंवासः क्वथितव्युषिते स्वैरमुषितो
विहन्ताऽयं साक्षादरुचिग्रहणीमम्लवटकः॥३९॥
अम्ल वटक (क्वथित वटक)
दधि-घोल में माष दालि की पिष्टी (उड़द दाल की पिट्ठी), जिसमें अजाजी
(जीरका, वाह्लीक (हिंगु), आर्द्रक, मरिच, सिन्धूत्थ (सैंधव लवण) मिला हो, दो
निर्मित स्वयंपाक हो जाने से, स्वाद, एला-सुगन्ध से सुवासित, क्वाथ में (पर्युषित या)
वासी तैयार कर, वटक डालना चाहिए॥३९॥
क्वथितायां परिक्षिप्तो वटको रुचिकारकः।
विष्टम्भजननो दृष्टिनाशनो रक्तपित्तकृत्॥४०॥
इस प्रकार (उपरोक्त रीति से निर्मित) क्वथित घोल में वटक छोड़कर बनाया
हुआ भोज्य पदार्थ, विविध रूप से गुणवान् होता है (क्वथितायां परिक्षितो वटको)-
नवमोत्सवः १८१
१. रुचि कारक (भोजन में रुचि बढ़ाने वाला)
२. विष्टम्भ जननी
३. दृष्टिनाशन (नेत्र ज्योति के लिए हानिकर)
४. रक्तपित्त कृत् (रक्तपित्त उत्पन्न करने वाला)
५. विष्टम्भजनन (दुष्पाच्य मलावरोधक)
यह अम्लवटक-क्वथित घोल वटक को गुणों से युक्त वर्णित है, जो विशेष रूप
से भोक्ता (खाने वाले) की भोजन में रुचि (तथा स्वयं सन्मर्गत वटक प्रयोग) रुचि
उत्पन्न करना है।
अथ काञ्जिकवटकनिर्माणम्
नूतना मन्थिनी यत्नात्कटुतैलेन मार्जिता।
रामठेन ततो धूमं दद्यात्तक्रं ततः क्षिपेत्॥४१॥
पल्वलेनाम्बुनाऽऽपूर्य क्षिपेत्तस्या सुचूर्णकम्।
राजिकाजीरलवणहिङ्गुशुण्ठी समन्वितम्॥४२॥
काकिण्यां पिण्डिकां चैव ततस्तां वासरद्वयम्।
आतपे स्थापयेत्तत्पश्चाद्वटिकां तत्र निःक्षिपेत्॥४३॥
ततो दिनत्रयादूर्ध्वं स्फूरदम्लवटा इति।
राजकावटिका कैश्चित्कथ्यन्तेऽथ तुषाम्बुकाः॥४४॥
काञ्जिकवटक
नूतन मन्थिनी (नयी मथने वाली (दधि मन्थनार्थ) हेतु-प्रयुक्त, ने) स्नेह से
प्रयासपूर्वक उपलेपित (यलात्कटुतैलेन मार्जिता) सर्वप्रथम करते हैं। फिर हिंगु-धूपन
(रामठ धूप) करें, तथा उसमें तक्र जल देते हैं, तथा उसको तालाब-जल (पल्वलेनाम्बु)
के पूरण करते (भरते) हैं, और राजिका-जीरक-लवण-हिंगु-शुण्ठी का चूर्ण मिश्रित कर
देते हैं। तत्पश्चात् पिण्डका-कुड़ी (काविण्यां पिण्डिकाम) मे भर देते है तथा इसको दो
दिनों तक घर्म (सूर्य की धूप) में रखते है, और (तदनन्तर) इसमे वाटिका को डाल
देते हैं। इस तरह तीन दिनों के बाद (ततो दिनत्रयादूर्ध्व स्फूरदम्लवटा इति) खिले हुए
वटक (बड़े) द्रव की सतह पर (ऊपर) तैरने लगते हैं।
इसको राजिका का वटक अथवा तुषाम्बुक वटक (व्यक्तियो द्वारा अलग-अलग नामो
से ज्ञात) नाम दिए जाते हैं। जिसकी निर्माण विधि उपरोक्त प्रकार से (समान) होती है।

१८२
क्षेमकुतूहलम्
बाह्लीकधूमाकूलपात्रमध्ये
सराजिके वारि किरेदणीयः।
तत्रारनालोदरपूर्णवर्ती
सराजिकोऽयं वटकः पटीयान् ॥ ४५ ॥
सराजिक वटक
साजिका जल (सुगन्धित हिंगु धूम से सुवासित) से परिपूर्ण पात्र के बीच में
वटक बड़े (आकृति में छोटे) डाल देते हैं। इस तरह से आरनाल (काँजिक) से परिपूर्ण
'सराजिक वटक' का निर्माण हो जाता है॥४५॥
तुषाम्बुवटकों हृद्यो वातजिद्रुचिकारकः।
रक्तपित्त करश्चोष्णास्त्वहितो नेत्ररोगिणाम् ॥ ४६ ॥
तुषाम्बु वटक
तुषाम्बु वटक के प्रयोग करने से गुण-कर्म इस प्रकार हैं—
१. हृद्य (हृदय के लिए बलदायक)
२. वातजित् (वातनाशक)
३. रुचिकारक (रोचन-रुचिवर्द्धन)
४. रक्तपित्तकर (रक्तपित्तकारक)
५. उष्ण (उष्णवीर्य)
६. अहितकर-नेत्ररोग (अचक्षुष्य)
अथाश्चर्यवटक निर्माणं गुणाश्च
कणान् गोधूमानामपगततुषाभां सुरभिते
जले बद्ध्वा वस्त्रे परिलघु निदध्याद्दिनयुगम्।
ततस्तोये तस्मिल्लवणमुखकुक्षिम्भरियं
स्थितः पक्षं यावद्भवति रुचिदाश्चर्यवटकः ॥ ४७ ॥
आश्चर्यवटकस्तृप्तिकारकौ रुचिकारकः।
वातहृद्यावकः सद्यः पित्तकृच्छोफकारकः ॥ ४८ ॥
आश्चर्यवटक
क. विधि- तुष विहीन गोधूम कण (भूसी निकले हुए गेंहूँ के दानों) को (कणान्
नवमोत्सवः १८३
गोधूमनामपगततुषाभां सुरभिते) पतले कपड़े में बाँधकर सुरभितया सुगन्धयुक्त जल
में (जले बद्ध्वा वस्त्रे पीरलघु) दो दिवस (निदध्याद्दिनयुगम्) तक रखा रहने देते
हैं, इसमें लवण के समान मुखकुक्षिमभारियम्)। इसको एक पक्ष पर्यन्त स्थित रहने
देते है (द्रव क्षिप्त वटक); अन्ततः 'आश्चर्य वटक' का निर्माण, सम्पन्न हो जाता
है। जोकि रुचिद (स्वयं तथा भोजन में रुचिवर्द्धक) प्रमुख गुण-युक्त होता है।
ख. गुण-कर्म
१. तृप्तिकारक (भोजन में आ वटक खाने से तृप्ति देनेवाला)
२. रुचिकारक (रुचिवर्धक)
३. वातहृत् (वातनाशक)
४. सद्य पित्तकारक ] (दृष्टव्य सं. ६)
५. शोथ कारक
६. यावक (यव/जौ से निर्मित वटक सद्य पित्तकारक तथा शोथकारक)
अथ चिञ्चावटकनिर्माणं गुणाश्च
शैलपचेलिमचिञ्चा
जलगुडगुलितो मरीचसंपृक्तः।
प्रविशति चिञ्चावटकः
सुकृतिनमेवाननं रुचिकः ॥ ४९ ॥
चिञ्चेयवटकस्त्वम्लो पित्तकृद्रुचिकार्कः।
मधुरो बातहृद्बल्यः पित्तकृच्छोफकृत्सरः॥ ५० ॥
चिञ्चा वटक
क. विधि- चिंचा रस- जो पर्वतीय क्षेत्रो में उत्पन्न होने इमली के वृक्षो से संग्रहीत
फलों को रस (शैलेय चेलिमचिञ्चा) में गुड़ तथा मरिच चूर्ण मिलाकर, वटक को
प्रक्षिप्त कर देते हैं- यह 'चिंचा वटक' को तैयार करने की प्रक्रिया सम्पन्न
(सरलता से) हो जाती है।
ख. गुण-कर्म-वैशिष्ट्य- यह 'चिंचा वटक' सुकृतियो शुभकार्य करते वालो के
मुख में प्रवेश करता है। (प्रविशति चिञ्चावटकः सुकृतिन मेवाननम्) अर्थात्
भाग्यशाली व्यक्तियों का चिंचा वटक सेवन का अवसर मिलता है। इस वटक
(माष या मुद्ग से निर्मित तथा तैल में तलित) को चिंचारस में प्रक्षेपण करके

/extra?
Look at it:
स ् व
Then: stem 1 with top curve to stem 2 (न) -> that is नि!
Then: stem 3 with top curve to stem 4 (म) -> that is मि!
Then: त्त!
Wait, why did I think there was an extra i?
Because the matra of 'नि' and the matra of 'मि' look close together:
स्वनि + मित्त = स्वनिमित्त!
Wait! Is there an extra 'ि'?
Look closely at:
स् व [ि] न [ि] म त्त
Wait, between 'न' and 'म', is there only ONE line (the matra for म)?
Yes!
Wait, let's look at the top curve:
There is a curve over 'न', and a curve over 'म'.
Wait, why does 'न' have a loop?
Ah, it is: स्वनि-मित्त-गुणाः!
Wait, look at the second curve: does it have a dot or a reph?
No, it's just 'स्वनिमित्तगुणाः'!
Wait, look at line again:
"स्वनिमित्तगुणाः सर्वे ज्ञातव्याः कथिता बुधैः॥५५॥"
Wait, look at the spacing between 'स्वनि' and 'मित्त':
Wait, is it "स्वनिमित्तगुणाः" or "स्वनि

[पृष्ठ १]

अथ दशमोत्सवः
(दशम प्रकरण)
अथ फेनिकानिर्माणं गुणाश्च
घृतेन मोदयित्वाऽथ दधि दत्त्वा विमर्दयेत्।
कणिका वर्तिताः कुर्याद्बह्व्यस्ताः पिष्टिकावधि॥ १॥
नवनीतयुतैः पिष्टैस्तण्डुलानां च लेपयेत्।
पश्चात्तः पटवद्द्द्वेष्ट्या स्वयं वृन्तेन छदयेत्॥ २॥
द्विधा एकैकखण्डेन संप्रसार्यातिनैपुणात्।
सा च सर्पिषि संपक्वा मृद्वी पुटवती स्मृता॥ ३॥
वहिः खण्डप्रलिप्ता च फेनिकेयमिति स्मृता।
माषाजां फेणिकां केचित्केचित्क्षीरसमुद्भवाम्॥ ४॥
श्रृङ्गाटशालुकादीनामाहुर्युक्तां कणीकजाम्।
सरसैः पटलैरेता पुराणस्येव सन्धयः॥ ५॥
हसन्तीव सितत्वेन फेनिका मेनकापतिम्।
फेणिका पुष्टिनी शुभ्रा विस्तीर्णा वर्तुला लघुः॥ ६॥
निर्मांणं युक्तिभिस्तासां जानन्ति कुशलः स्त्रियः।
फेनिका (फेणिका प्रकार)
(क) विधि
अ. गोधूम फणिका (मैदा) में घृत तथा दधि मिश्रित कर, पिण्ड की वर्तिकाकारं
(प्रसारण अधिकाधिक संभा०) बनाते हैं; फिर तण्डुल चूर्ण तथा नवनीत (मक्खन),
जल मिश्रित कर लेप बनाकर, उस पर लगा देते हैं। इसे वस्त्र समान लपेटकर,
आगे के भाग को काटते हैं (प्रत्येक खण्ड के दो भाग कर लेते हैं, फिर उसे
फैलाकर, घृत में छान लेते हैं, जिससे यह मृदु पुटवाली हो जाये जिसपर वाह्य
द्वेपेण खण्ड से प्रलिप्त करते हैं (चाशनी से)। इस पदार्थ को फेणिका (फेनी)
कहा जाता हैं।
आ. कतिपय व्यक्तियों द्वारा माषणा माष पिष्ट (उड़द की पिट्ठी) तथा कुछ व्यक्ति


[पृष्ठ २]

दशमोत्सवः १८७
खोया याम माना (केचितकेचित्क्षीरसमुद्भवम्) से फेमिका का निर्माण करने का
मन्तव्य प्रगट करते हैं। साथ ही, श्रृंगाटक (सिंघाड़ा), शालूक (कमलकन्द) की
पिट्ठी (पीठी) से फेनिका को बनाने का परामर्श देते हैं।
(ख) वैशिष्ट्य
यह फेनिका अपने सरस पटलों से पुराण की सन्धियो के सभाव है; तथा यह
(फेनिका) अपने श्वेत वर्ण के कारण मेनका पति हिमालय को भी हास्य पूर्ण प्रतीत
होती है। केतिका का निर्माण कुशल (पाकविद्या में निपुण) स्त्रियों को भलीभाँति
ज्ञात है, जिससे पुष्टि, शुभ्रा (सफेद), विस्तीर्णा (लम्बी-चौड़ी) वर्तुला (गोल),
लघु (छोटी) तथा अन्य आकृतियों में की फेनिका बन सकती है, इसको युक्तिपूर्वक
फेनिका निर्माण में दक्ष स्त्रियां विभिन्न आकार-प्रकार की प्रस्तुति (फेनिका हेतु)
प्रदान करती हैं।
वातपित्तहरा बल्या किञ्चित्कफकरा सरा॥ ७॥
सुस्निग्धा मधुरा शीता रुच्या गुर्वी मनोहरा।
(ग) गुण-कर्म
१. वातपित्तहरा (वात-पित्तनाशक) २. बल्या (बलवर्धक)
३. किंचित्कफकरा (कुछ कफवर्धक) ४. सरा (वातानुलोमक-सुखविरेचक)
५. सुस्निग्धा (अति स्निग्ध/ स्नेहयुक्त) ६. मधुरा (मधुर-स्वादु)
७. शीता (शीतल) ८. रुच्या (रुचिवर्धक)
९. गुर्वी (गुरु/दुष्पाच्य गरिष्ठ) १०. मनोहरा (मन को आकर्षित करने वाली)
यह फेनिका उपरोक्त गुण-कर्म द्वारा शरीर पर प्रभाव करती है, तथा एक
स्वादपूर्ण खाद्य (मधुर रसे युक्त व्यंजन) के रूप में अपना स्थान रखती है।
अथ नवनीतफेणिकानिर्माणं गुणाश्च
दुग्धाम्बुना स्विन्नमुद्गद्विदलं तण्डुलैः सह॥ ८॥
नवनीतेन दघ्ना च मिश्रं पिष्ट्वा पचेद्वटान्।
घृते तप्ते बहिः खण्डचूर्णैनोद्धूलयेदिमान्॥ ९॥
नवनीतयुता मृदी फेणिका दुग्धसंयुता।
वातपित्तहरा बल्या स्निग्धा शीताऽतिपुष्टिदा॥ १०॥

पृष्ठ १८८

१८८ क्षेमकुतूहलम्
नवनीत फेणिका
क. विधि- दुग्ध (दूध) में स्विन्न (उबाले हुए) मुद्र (मूँग) दाल्वि, को तण्डुल के
साथ भिष्टी (पिट्टी) बनाकर, नवनीत (मक्खन) तथा दधि (दही) मिश्रित कर
वटक बना लेते हैं, फिर इनको तप्त घृत में पका कर रखते हैं। इन वटकों को
बाहर से खण्ड चूर्ण (पिसी शर्करा) से उद्धूलन किया जाता है।
ख. गुण-कर्मादि- नवनीत तथा दुग्ध से युक्त मृदु फेनिका के गुण इस प्रकार हैं-
१. वातपित्त हरा (वातपित्त नाशक) २. बल्या (शरीर बलवर्धक)
३. स्निग्ध (मोहयुक्त चिकनी) ४. शीत (शीतल)
५. अति पुष्टिदा (अत्यन्त पुष्टिदायक)
अथ माषफेणिकानिर्माणं गुणाश्च
निस्तुषां माषविदलां सूक्ष्मा द्विस्त्रिस्तु पेषयेत्।
शिलायां पिष्टितामित्थं नवनीतेव संयुताम्॥ ११॥
छागचर्ममयोपेते छिद्रिते पूरितां दृढम्।
घृतपूर्णभाजनस्य तप्तस्योपरि भ्रामयेत्॥ १२॥
पूरिता तेन छिद्रेण सा षिष्ठी धारया घृते।
पतिता पच्यते स्वच्छा ह्रस्वा पक्वा प्रपूरिणी॥ १३॥
वर्तुला चसुरस्त्रा वा दीर्घा वा फेनिका ततः।
प्रलेपयेद्बहिर्भिश्चन्नं पक्वखण्ड धारया॥ १४॥
माषपिष्टभवा फेणी गुर्वी स्निग्धाऽतिवातहा।
उष्णा संतर्पणा बल्या शुक्रस्थूलत्वकृत्सरा॥ १५॥
माष फेणिका
क. विधि- माष (उड़द) की दाल (मिस्तुषां माष विदलाम्)- जिसमें भूसी नहीं हो
तथा महीन (सूक्ष्मा) दो-तीन बार पाषाण पर पिसी हुई (द्विस्त्रिस्तु पेषयेत् शिलायां
पिष्टितामित्थं) लेते हैं; इस दाल की पिट्टी में नवनीत (मक्खन) मिश्रित करते
हैं, जिसको छागचर्म की थैली (द्वारा चर्ममयोपेते छिद्रिते) में पूर्ण करके तथा
दृढ़ता पूर्वक पीड़ित करते (पूरितां दृढ़म्) हुए, तप्तघृत से परिपूर्ण भाजन
(घृतपूर्ण भाजनस्य तप्तस्योपरि) पर घास रूप में घुमाते हैं (भ्रामयेत्)। इस रीति
से पिष्ट (थैली से निकल कर- घी की कड़ाही (कटाह या उपयुक्त-पात्र अग्नि


पृष्ठ १८९

दशमोत्सवः १८९
पर स्थापित) में गिरकर पकने पर स्वच्छ तथा खिंता जाती है (पतिता पच्यते
स्वच्छा ह्रस्वा पक्वा प्रपूरिणी); वह वर्तुल, चौकोर या लम्बी-विभिन्न आकारो में
फेनिका बन जाती है; तदनन्तर इसको बाह्य रूप से पक्व खण्ड (चाशनी) का
प्रलेपित किया जाता है। इस प्रकार 'माषफेनिका' का निर्माण हो जाता है,
(जिसका लोक परम्परा में 'इमरती'- इमिरिती भी कहा जा सकता है) वह
माषपिष्टभवा फेणी' का मिष्ट व्यंजनों (मिठाइयों को संमिलित है।
ख. गुण-
१. गुरु (भारी-दुर्जर) २. स्निग्ध (चिकनी/अन्तः स्निग्धता कारक)
३. अतिवातहा (अत्यन्त वातनाशक)
४. उष्णा (गर्भ) ५. संतर्पणा (तर्पणकारी)
६. बल्या (शरीर को बलप्रदायक)
७. शुक्रस्थूल कृत् (शुक्र-वीर्य में सान्द्रताकर)
८. सरा (सुखविरेचक)
अथ लड्डुकप्रकारः
प्रथमं दधिलड्डुकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वस्त्रान्निर्गल्य पिष्टं तु शालेस्तरयुतेन तु।
दध्ना सेवा घृते पक्त्वा मेलयेद्दलितां सिताम्॥ १६॥
दधिशालिभवं मेध्यं लड्डुकं पित्तनाशनम्।
बल्यं वातहरं हृद्यं विशेषाद्दाहनाशनम्॥ १७॥
लड्डू प्रभेद
दधि लड्डुक
क. विधि- शालि (चावल) की पिष्टी-दधि मिश्रित-को वस्त्र से छानकर, सेव की
आकृति में बनाते हैं तथा घृत में (डालकर) पका लेते हैं तथा इसमे सिता
(शक्कर-बूरा) को मिलदिते हैं। इस प्रकार 'दधि लड्डू' का निर्माण करते हैं।
ख. गुण-
१. मेध्य (मस्तिष्क बल/कार्य शान्तिवर्धक) २. पित्तनाशन (पित्तशामक)
३. बल्य (शरीरबल दायक) ४. वताहर (वायुनाशक)
क्षे. कु. 13

१९० क्षेमकुतूहलम्
५. हृद्य (हृदयबलदायक)
६. दाहनाशन विशेषतः (जलन को शान्त करने वाला, विशिष्ट प्रभाव)
अथ कणिकान्नलड्डुकनिर्माणविधिः
कणिका सर्पिषा मिश्रा तोयपिण्डितमर्दिता।
तस्या मौक्तिकसदृशास्तुल्यास्तन्त्वादिनाऽथवा॥१८॥
वर्तिवत्सेविकाः स्थूलास्त्वथवाऽभीष्टमात्रया।
सुपक्वा सर्पिषि मिते खण्डपाकविमिश्रिताः॥१९॥
वर्तुलाः मोदकाः कार्यास्तुल्या वा मुष्टकेन तु।
कणिकान्न लड्डू
निर्माण विधि
गोधूम कणिका (गेहूं का मैदा) में जल मिलाकर पिण्डाकार भलीभाँति मर्दन
(मसल) कर- मौक्तिक (मोती) के समान, तन्तु समान, वर्ती जैसे या बड़े छोटे
(अभीष्ट) जैसे चाहें, सेव बनाते हैं; फिर इनको घृत में पका लेते हैं, तथा अनुमि खण्ड
पाक (शक्कर की) चाशनी मिलाकर) करते हैं, इस द्रव्य के मोदक-मुट्ठी जैसे या
वर्तुल-गोल आदि आकृति के निर्माण कर लेते हैं॥१७-१९ १/२॥
अथ गोधूमचूर्णलड्डुकनिर्माणविधिः
ईषद्वृतेन संमिश्रा कणिका भर्जिता मनाक्॥२०॥
खण्डपाके विनिक्षिप्य मर्दयेद्दृढपाणिना।
ततस्तया विनिर्मायं यावदिष्टप्रमाणकम्॥२१॥
गोधूमचूर्ण लड्डुक
गोधूम चूर्ण (आटा या मेदा-कणिका) को घृत में भर्जित (भून) कर, खण्डपाक
(शक्कर की चाशनी) करते हैं- इस द्रव्य को हाथ से बलपूर्वक मसलते हैं (मर्दयेद्दृढ-
पाणिना), तत्पश्चात् स्वेच्छानुसार (इष्ट प्रमाणकम्)- उपयुक्त (अभिलाषित) आकृति।
प्रमाण में लड्डू का निर्माण करते हैं॥२०-२१॥
अथ दीर्घलड्डुकनिर्माणविधिः
मोदकाः खण्डपाकेन यदि तेनापि वेष्टयेत्।
श्लक्ष्णयेच्छ्लक्ष्णहस्तेन ततस्तान् सौरभोत्कटान्॥२२॥
दशमोत्सवः १९१
दीर्घलड्डूक
गोधूम चूर्ण को खण्डपाक करके-सुगन्धित बनाकर, स्निग्धपाणि (चिकने हाथों
से)- हाथों से लम्बे (दीर्घ) मोदकों का निर्माण करते हैं॥२२॥
अथ चित्तमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
उत्कृष्टशर्करापाके घृतभृष्टः सुवर्तिभिः।
बद्धः कर्पूरसुरभिर्मोदजश्चित्तमोदकः॥२३॥
एवं बहुविधाः कार्या गोधूमान्नस्य लड्डुकाः।
स्थूला वा सूक्ष्मकाश्चापि पक्वखण्डविमिश्रिताः॥२४॥
मोदका मरिचैलाभिर्वासिता नृपवल्लभाः।
सेववर्तिकया ये स्युर्नाम्ना ते तन्तुलड्डुकाः ॥२५॥
स्थूलसेवभवाः स्थूलाः सूक्ष्माजाः सूक्ष्मसंज्ञकाः।
सेवमौक्तिजसदृशास्ते स्युर्मौक्तिक लड्डुकाः॥२६॥
इत्येते सेवजा ख्याताः विशेषप्राप्तसंज्ञकाः।
लड्डुका जगति ख्याताः कणिकाप्रभृतेरपि॥२७॥
चित्तमोदक
क. विधि
उत्कृष्ट शर्करा (खण्ड) पक्व, घृत भर्जित, सम्यक् रूप से वर्ति समान बद्ध,
सुगन्धित (कर्पूर आदि सुरभि द्रव्यों से सुवासित) तथा चित्त (मन) को प्रसन्न (आह्लाद)
देने वाला मोदक 'चित्तमोदक' कहलाता है। इसी भाँति गोधूम चूर्ण से विभिन्न प्रकार के
मोदक (लड्डू) बनाये जा सकते हैं।
ख. वैशिष्ट्य
इस रीति से निर्मित मोदक (लड्डू) स्थूल (बड़े) या छोटे (सूक्ष्म), खण्डपाक
युक्त, एला चूर्ण से सुगन्धित मोदक राजाओं (नृपवल्लभाः) के लिए प्रिय होते हैं।
सेवों (वर्तिकाओं) से निर्मित मोदक 'तन्तुमोदक' का नाम ग्रहण करते हैं। ये
स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों प्रकार के होते हैं। मौक्तिक (मोती) समान सेवों से बने मोदक
'मौक्तिक लड्डू' कहे जाते हैं। इस तरह विभिन्न (अनेक) प्रकार के सेवों से बने मोदक
उसी विशेष नामों की संज्ञा प्राप्त करते हैं।

१९२ क्षेमकुतूहलम्
विश्व में गोधूम चूर्ण तथा अन्य सम्बन्धित द्रव्यों से अनेक प्रकार के मोदक
विख्यात हैं॥२३-२७॥
बल्यो गुरुतरः शीतो मधुरो वातपित्तहा।
कफशुक्रप्रदः स्निग्धो गोधूमान्नस्य लड्डुकः॥२८॥
गुण
१. बल्य (देह बलवर्धक) २. गुरुतर (भारी/दुर्जन)
३. मधुर (मीठा, स्वादु) ४. वातपित्तहा (वात पित्तनाशक)
५. कफ प्रद (कफ वृद्धिकर) ६. शुक्रजनन (वीर्यवर्धक)
अथ माषलड्डुकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
माषपिष्टभवाः सेवा सेवा वा मुद्गपिष्टजाः।
सुदर्या छिद्रमार्गेण विश्राव्य घृतपाचिताः॥२९॥
खण्डपाकस्य योगेन यान्ति मोदकहेतुताम्।
माषस्य च गुरुः स्निग्धो मोदको बलशुक्रदः॥३०॥
उष्णः संतर्पणो वृष्यः स्वादुपाकोऽनिलापहः।
माष लड्डुक
क. विधि
माष (उड़द) या मुद्ग (मूँग) की पिष्टी करे, सुदर्वी (उपयुक्त तथा अच्छी प्रकार
की करछुल) के छिद्रों से पातन (गिराकर) सेव निकालकर, घृत में पाक कर लेते हैं,
तथा खण्डपाक (चाशनी) मिश्रित कर, मोदक का निर्माण उपयुक्त रीति से किया
जाता है।
ख. गुण
१. गुरु (गरिष्ठ) २. स्निग्ध (चिकनाहट पैदा करने वाला)
३. बलदायक (शरीरबलवर्धन) ४. शुक्रदायक (शुक्रजनन)
५. उष्ण (गर्म) ६. सन्तर्पण (तृप्तिदायक)
७. वृष्य (वाजीकरण) ८. स्वादुपाक (मधुरपाक)
९. अनिलापह (वातनाशक)
दशमोत्सवः १९३
अथ माषमुद्गकोद्रवतण्डुलानां पर्पटलड्डुकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पर्पटैर्घृतसंभृष्टैश्चूर्णितैः खण्डमिश्रितैः।
कणिकालड्डुकाकारं कर्तव्यं च यथेप्सितम्॥३१॥
त एव पक्वखण्डेन लेपिता मोदका बहिः।
पर्पटस्य समुद्भूतो लड्डुको रुचिकारकः॥३२॥
विशेषोऽत्रान्नजो ग्राह्यो विपाके मधुरो हि सः।
पर्पट लड्डुक
क. विधि- माष (उड़द), मुद्ग (मूँग) तथा कोद्रव (कोंदो) धण्डुल (चावल) के चूर्ण
में खण्ड (शर्करा) मिश्रित करके- जल मिलाकर (उचित मात्रा में) के साथ
पिण्ड बनाकर, पर्पट (पपड़ी) के आकार का बना लेते हैं, ऊपर से खण्डपाक
(चाशनी) से आलेपित कर देते हैं। इस पर्पट-स्वरूप द्रव्य से मोदक (लड्डू) का
निर्माण किया जाता हैं।- यही 'पर्पट लड्डुक' होता है।
ख. गुण-
१. रुचिकारक (रोचन-रुचिवर्धन)
२. अन्नजमोदक (अन्न से निर्मित मोदक ग्रहणीय विशेषरूपेण)
३. मधुरविपाको (मोदक सं.-२ पर प्रदर्शित)
अथ मत्स्यलड्डुकनिर्माणविधिगुणाश्च
गतत्वङ्‌मत्स्यखण्डानि तक्रेणोत्स्वेदयेन्मनाक्।
ततो निष्कण्टकं कृत्वा तक्रेणातिविमर्दयेत्॥३३॥
अथ वस्त्रेण निर्गाल्य स्विन्नशालूकमिश्रितम्।
शिलायां पेषयेत्तौ च पिष्टिकां कारयेत्ततः॥३४॥
वर्तयित्वा तथा सेवान् पचेत्तन्मृदुते भृशम्।
तैले विषमगन्धस्य निवृत्त्यर्थं पचेदथ॥३५॥
सेवा ये मौक्तिकनिभाः पक्वखण्डेन वेष्टिताः।
अथ वै मुद्गपिष्टेन पक्वे सेवस्य बन्धनम्॥३६॥
कृत्वैवं तत्तु खण्डेन इति केचिद्ब्रुवन्ति च।
आमगन्धनिवृत्त्यर्थं पुनस्तैलेन पाचयेत्॥३७॥
मत्स्यजा लड्डुका बल्या गुरवः कफकारकाः।
वृष्यानिलहराः प्रोक्ताः किञ्चित्पित्तप्रकोपकाः॥३८॥

१९४ क्षेमकुतूहलम्
मत्स्य लड्डूक
क. विधि- मत्स्य (मछली)- चर्मविहीन- को तक्र में स्विन्न करके- निष्कण्टक
(काँटा निकालना) कर, तक्र के साथ मर्दन (मसले) फिर, इस पदार्थ 'शालूक'
(कमलकन्द) का मिश्रण करते हैं- इस मिश्रण को पिष्ट करके, इससे सेव (या
बूँदी) बनाकर, तप्त घृत में पका लेते हैं। इसको तैल में पकाने से विषमगंध या
दुर्गन्ध का निराकरण हो जाता है। इस द्रव्य (सेव) को खण्डपाक में सम्यक् रूप
से मिश्रित कर देते हैं तथा लड्डुक (मोदक) बनाते हैं। यदि आमगंध (दुर्गन्ध) है,
तब पुनः तैल में पाक करना चाहिए।
ख. गुण-
१. बल्य (शरीर बल वर्धक)
२. गुरु (भारी, गरिष्ठ, दुर्जर)
३. देह-शक्तिदा बल्य (देह अंग-प्रत्यंग शक्तिवर्धन)
४. कफकारक (श्लेष्महर)
५. वृष्य (वाजीकरण)
६. अनिलहर (वातनाशक)
७. किंचित् पित्त प्रकोपक (कुछ पित्त का कोप करने वाला)
अथ मांसलड्डुकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
इत्थमेव विधातव्या मांसस्यापि हिलड्डुकाः।
अप्सु संस्विन्नमन्नेन मिश्रितेन कणीकया॥३९॥
मत्स्यमांसस्य रीत्या तु कर्तव्या मांसलड्डुकाः।
गुणा मांसानुसारेण ज्ञातव्या लड्डुकेषु च॥४०॥
मांस लड्डूक
क. विधि- मत्स्य मोदक की विधि (पूर्वोक्त) के समान मांस के लड्डुओं का निर्माण किया
जाता है। मांस को जल में स्विन्न करके, अन्नचूर्ण का मिश्रण करके, मांस के छोटे या
अभीष्ट आकृति (एवं प्रमाण) के लड्डू बनाते हैं (मत्स्यमांसस्य रीत्या तु कर्तव्या मांस
लड्डुकोः) जिसमें मत्स्य लड्डू की रीति का अनुसरण करने का निर्देश है।
ख. गुण- मांस लड्डूक के गुण, प्रयुक्त मांस के समान (प्राणः) होते हैं (गुण
मांसानुसारेण ज्ञातव्या लड्डुकषुच)।
दशमोत्सवः १९५
अथ शालूकलड्डुकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
शालूकं स्वेदितं निस्त्वक् पिष्टिकां कारयेत्ततः।
वर्तयित्वा तथा सेवा घृते तप्ते पचेत्ततः॥४१॥
सेवानां लड्डुकं कार्यं पक्वखण्डेन वेष्टितम्।
तदीयमौक्तिकैः कार्यं श्रेष्ठं मौक्तिक्लड्डुकम्॥४२॥
तयैव चूर्णितया वा पक्वखण्डविमिश्रितम्।
मांसलड्डुकवद्रीत्या सर्वं कुर्याद्विचक्षणः॥४३॥
दुर्जरः कफपित्तघ्नो विष्टम्भाध्मानकारकः।
कषायो वातकृद्रूक्षः शालूकलड्डुकः स्मृतः॥४४॥
शृङ्गाटपद्मिनीबीजसंबन्धिलड्डुकादिकम्।
ज्ञातव्यं प्रागिव कृत्स्नं स्वबुद्ध्या कारयेद्बुधः॥४५॥
शालूक लड्डूक
क. विधि-
अ. शालूक (कमलकन्द) की स्वेदित-त्वक् रहित करके, पिष्टिका बनाते हैं, जिससे
सेव (या बूँदी) को तप्त घृत में पाक करते हैं, फिर इस पर पक्व खण्ड
(चाशनी) का मिश्रण (सम्यक् रूप से) करते हैं- अन्ततः इस द्रव्य से लड्डू का
निर्माण कर लेते हैं, जो मोती के समान बूँदो के बने होने के कारण 'मौक्तिक
लड्डूक' (मोतीचूर के लड्डू) संज्ञा भी प्राप्त करते हैं।
आ. इस तरह शालूक चूर्ण में शक्कर (शर्करा खण्ड पाक) की चाशनी मिलाकर
उपयुक्त रीति से सम्मिश्रित करके, मांस लड्डूक के समान सभी पदार्थों का
निर्माण हो जाता है, जो विचक्षण (विद्वानों) का कार्य है।
ख. गुण-
१. दुर्जर ५. कषाय
२. कफपित्तघ्न ६. वातकृत
३. विष्टम्भकर ७. रूक्ष
४. आध्मान कारक
इ. शृंगष्टक (सिंघाड़ा) तथा कमलिनी (पद्मिनी) के बीजों का तथा अन्य द्रव्यों
लड्डूक-पाकशास्त्र के ज्ञाताओं को स्वबुद्धि के अनुसार, सम्पूर्ण निर्माण करना चाहिए।

१९६ | क्षेमकुतूहलम्
अथ सूरणमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पूर्ववत्स्वेदिताः खण्डाः सौरणा घृतपाचिताः।
खण्डपाकविमिश्राश्च यान्ति मोदकहेतुताम्॥४६॥
बल्यो वर्ण्योऽग्निकृत्सद्यः सौरणो मोदकः स्मृतः।
अत्यर्थं सर्वदा सेव्यश्चर्मकीलयुतैर्नरैः॥४७॥
सूरण मोदक
क. विधि- स्वेदित (उबाले हुए) सूरण कन्द (जिभीकन्द) के खण्डों से छिलका
निकालकर (निस्त्वक्), तप्त घृत में पाक करते हैं, इसके पूर्व कन्द की पिष्टी
(पिट्ठी) सेव बना लेते हैं। इस सामग्री को खण्डपाक (शक्कर की चाशनी) में
भलीप्रकार मिलाकर, मोदक (लड्डू) निर्माण करना चाहिए।
ख. गुण-
१. बल्य (शरीर का बलवर्धक)
२. वर्ण्य (देह का वर्ण प्रसारण)
३. अग्निकृत् (पाचकाग्नि जनन)
४. चर्मकील (अर्श) नाशक
(अर्श के रोगियों का अधिक सेवन इस मोदक विशेष का करना हितकर है।
अथाऽर्द्रकमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अम्लीकापत्रसंमिश्रं क्वाथयेदार्द्रकं जले।
ततः क्षीरे विनिष्क्वाथ्य सुखण्डांस्तस्य कारयेत्॥४८॥
ते च तण्डुलपिष्टेन वेष्टिता घृतपाचिताः।
पक्वखण्डे समालोड्य कर्तव्या त्वेलयाऽन्विताः॥४९॥
आर्द्रकस्यैव संभूतो मोदको रुचिबोधकः।
कण्ठ्योऽग्निजनकः प्रोक्तो विशेषाच्छ्वासकासहा॥५०॥
आर्द्रक मोदक
क. विधि- आर्द्रक (अदरक) को चिंचा पत्र मिले जल में क्वाथ बनाते समय डाल
देते हैं। फिर निकाल कर दुग्ध में पाक करके सुखण्ड (सुन्दर, छोटे टुकड़े)
बनाते हैं, जिनको तण्डल पिष्ट (चावल की पिट्ठी) आलेपित कर, तप्त घृत में
दशमोत्सवः | १९७
पाक करके पक्व खण्ड (चाशनी) में डुबोते हैं, और एला-चूर्ण से सुगन्धित कर
लेते हैं- इस द्रव्य के मोदक बनाते हैं।
ख. गुण-
१. रुचिबोधक (रुचिकर)
२. कण्ठ्य (कण्ठ-गले को हितकर)
३. अग्निजनक (पाचकाग्निवर्धक)
४. श्वासवृद्धि ┐ श्वास एवं कास नाशक
५. कास ┘ विशेषरूपेण
अथ कूष्माण्डमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कूष्माण्डस्य च कर्तव्यः सर्व आर्द्रकवद्विधिः।
स्वेदनं कर्तनं स्वाज्ये भर्जनं खण्डवेष्टनम्॥५१॥
कूष्माण्डजनितश्चायं लड्डूकः पित्तनाशनः।
बलकृद्वातहत्सद्योरुचिकृत्कफकृद्धिमः ॥५२॥
कूष्माण्ड मोदक
क. विधि-कूष्माण्ड (कोहड़ा-कुम्हेड़ा) का मोदक-निर्माणार्थ आर्द्रक विधि का
अनुसरण करना चाहिए। इस हेतु स्वेदन, कर्तन, आज्य, भर्जन तथा खण्ड-
वेष्टन प्रभृति कर्तव्य पूर्ववत् किए जायेगे। इस रीति से कूष्माण्ड-मोदक तैयार हो
जाता है। (चिंचा पत्र उक्त जल मे उबालना, छोटे टुकड़े करना घी मे भूनना तथा
चाशनी। शक्कर मिलाना आदि क्रियाये आर्द्रक मोदक के समान कूष्माण्ड
जनित लड्डूक बनाने के लिए)।
ख. गुण-
१. पित्तनाशक | २. बलकृत् | ३. वातहत्
४. सद्यरुचिकृत् | ५. कफकृत् | ६. शीत
अथ कूष्माण्डादिबीजमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कूष्माण्डबीजैर्निस्त्वग्भिर्भिट्यादिप्रियालजैः ।
खण्डपाकविमिश्रैश्च कुर्यात्तेषां हि मोदकान् ॥५३॥
नालिकेरभवा मज्जा खण्डिता दुग्धपाचिता।
भर्जिता घृतमण्डेन खण्डपाकेन लेपिता॥५४॥

१९८ क्षेमकुतूहलम्
सर्वे मज्जाभवाः प्रोक्ता मोदका मोदकारकः।
धातुपुष्टिकरा बल्याः स्वनिमित्तगुणावहाः॥५५॥
कूष्माण्ड मज्जा मोदक
क. विधि- कूष्माण्ड फल-बीज त्वक् निष्कासित की मज्जा (गूदा) को स्विन्न कर
लेते हैं, तथा पिष्ठी बनाकर घृत में भर्जित करते (भूनते) हैं फिर खण्डपाक
(चाशनी) मिलाकर, मोदक बनाते हैं।
नारिकेल मज्जा मोदक- नारिकेल (नारियल) की मज्जा को खण्डित (छोटे-
छोटे टुकड़े कर), दुग्ध पाक तथा घृत में भजित करते हैं, खण्डपाक का
सम्मिलन किया जाता है-इस रीति से मोदक बना लेते हैं।
अन्य मज्जा मोदक- इसी विधि से अन्य बीजों तथा मज्जा से मोदक का
निर्माण किया जाना चाहिए।
ख. गुण- सामान्यतः, समस्त प्रकार के मोदक मन (चित्त) को मुदित (प्रसन्न) करने
वाले होते हैं अतः मोदक नामकरण है-
१. मोदकादक २. धातुपुष्टिकारक
३. बल्य ४. स्वनिमित्त गुणावह (स्रोत-द्रव्य मज्जा के अनुसार
मोदक गुण युक्त)।
अथ दुग्धप्रकार
अथ दुग्धस्य निस्नेहसक्तुनिर्माणविधिः
दुग्धं विनष्टं निर्गाल्यं भृष्ट्वा भृष्ट्वाऽन्तरान्तरम्।
सखण्डं गालयेद्वस्त्रान्निःस्नेहं सक्तुवद्भवत्॥५६॥
पाकपिण्डीकृतं दुग्धं नवमृन्मयभाजने।
मर्दितं गालितं चापि वस्त्रे स्यात्सक्तुसन्निभम्॥५७॥
दुग्ध प्रकार
दुग्ध स्नेह रहित सक्तु
दुग्ध (विनष्ट) को पाक करके बनाया हुआ खोया (मावा), वस्त्र निर्गाल्य
(निचोड़ कर) तथा दुग्ध की भृष्ट करके (भृष्ट्वा भृष्ट्वाऽन्तरान्तरम्), सखण्डित (छोटे-
छोटे टुकड़े कर) वस्त्रगालन (गालपेद्वस्त्रात्निस्नेहम्) या छानकर स्नेहविहीन कर लेते
दशमोत्सवः १९९
हैं- जो सक्तु (सत्तू) के समान प्रतीत होता है (सक्तुवद्भवेत)। इसमें सत्तू के समान दुग्ध
हो जमा करता है॥५६-५७॥
अथ क्षीरवटक-वटीनिर्माणविधिः
मरीचिगर्भीता नष्टदुग्धजा वटका वटी।
पक्त्वा घृते क्षिपेत्क्षीरे खण्डपाकेऽथवा क्षिपेत्॥५८॥
क्षीर-वटक
दुग्ध (मरीचिगर्भीता नष्ट दुग्धजा) का छैना निष्कासित कर बनी वटक (या वटी)
को घृत में भर्जित (पक्त्वा घृते) कर दुग्ध में डालते हैं (क्षिपेत्क्षीरम्) अथवा खण्डपाक
(चाशनी) में डालकर रख देते हैं (क्षिपेत्)। यह क्षीर वटक या क्षीर वटी का निर्माण
हो जाता है॥५८॥
अथ क्षीरलड्डुकनिर्माणविधिः
नष्टं दुग्धं शिलापिष्टं युक्तं तण्डुलपिष्टकैः।
घृते पक्त्वाऽथ संचूर्ण्य खण्डपाकेऽथ मिश्रितम्॥५९॥
मोदकादिप्रकाराणां हेतुतामुपगच्छति।
क्षीर लड्डूक
दुग्ध के खोया (नष्ट दुग्ध) की पिष्ठि (शिलापिष्टम्), में शर्करा (स्वच्छ) तथा
तण्डुल पिष्ट (चावल की पिट्ठी) मिलाकर, घृत में पाक करके, खण्डपाक (चाशनी) का
सम्मिश्रण कर देते हैं। इसरीति से यह द्रव्य मोदक आदि निर्माण के लिए उपयुक्त हो
जायेगा (मोदकादिप्रकाराणां हेतुतामुपगच्छति)॥५९१/२॥
अथ स्वादुलड्डुकनिर्माणविधिः
शालिपिष्टयुतं क्षीरं घृतं तेन तु कारिता।
वटिका घृतसंपक्वा पिण्डदुग्धे सशर्करे॥६०॥
मेलिता विविधस्वादुलड्डुकानां च हेतवः।
स्वादु लड्डूक
शालि (जड़हन चावल) की पिष्ठी (पीठी) को दुग्ध में पाक करके, घृत मिश्रित
कर तथा पका कर, शर्करायुक्त निर्माण करते हैं। जो अनेक प्रकार के स्वाद युक्त होते
हैं (मेलिता विविधस्वादुलड्डुकानां च हेतवः)॥६०१/२॥