क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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१७६ क्षेमकुतूहलम्
ख. गुण-कर्म (अलीकमत्स्येण्डरी)
१. रुच्य (रुचिवर्धक) २. वल्य (बलकारक)
३. वृष्य (वाजीकरण) ४. पुष्टिदा (अति)
५. वातहृत् (वातनाशक) ६. शुक्रजनन (वीर्य उत्पादक)
अथ वेसनस्य वटकनिर्माणम्
आलोड्य वेसनं तोये क्वाथयेद्धिङ्गुना युते।
पाके घनत्वं विज्ञाय तदुत्तार्य समे क्षिपेत्॥ २५॥
पीठे हस्ततलाघातैरिदं च पुटयेत्ततः।
अलीककन्दखण्डाख्यं खण्डितं दीर्घसूक्ष्मकम्॥ २६॥
टिण्टीबिम्बीफलाकारं कार्येद्वहुधा त्विदम्।
तप्ततैले ततः पाच्यं रन्धयेद्वेसवारितम्।
शुष्कं प्रलेहितं वापि वटिकेव प्रपाचयेत्॥ २७॥
वेसन वटक-प्रलेह
वेसन (वेसन) को जल में (आलीड्य वेसनं तोये) द्रवित (घोल) कर तथा हिंगु
मिश्रित करके उपग्नि पर पाक करते हैं, जब यह पदार्थों (पाकाधीन-क्वाथ हेतु) घनत्व
या गाढ़े होने की अवस्था (पाकै घनत्वं विज्ञाय) आ जाने पर, किसी समतल पात्र में
निकाल लेते हैं। फिर पीठ पर, हस्ततल से (मर्दन) द्वारा संपुटित (लम्ब-स्थूलकन्दाकार)
किया जाता है। इस खण्ड (टुकड़े) से विविध प्रकार की फलों की आकृतियाँ, जैसे
टिंटी/करीरफल, बिम्बी कन्दूरी) बना कर, तप्त तैल में वेसवार मिलाकर पका लेते हैं
(रंघयेत्)।
इस वाटिका की शुष्क (सूखा) अथवा प्रलेह-दोनों रूपों में पाचन (निर्माण)
किया जा सकता है॥२५-२७॥
अथ पक्ववटीनिर्माणम्
तोयेन वेसनं लोड्यं मथितं हिङ्गुना सह।
तप्ततैले प्रदातव्या वट्यामलकमात्रया॥ २८॥
वेसवारयुते तक्रे क्वथिते वेसनान्विते।
तत्र सा वटिकाक्षिप्ता नाम्ना पक्ववटी स्मृता॥ २९॥
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नवमोत्सवः १७७
आह्लादिका मृगदृशा मृदुना स्वरेण
स्पष्टस्वरैरपि विलोलितसर्वगात्र।
स्नेहाधिका सुमधुराऽरुणसर्वदेहा
नीराहराऽतिरुचिरा च वटी च चेटी॥ ३०॥
पक्व वटी
क. विधि- जल में हिंगु सहित वेसन घोलते हैं (लोड्य-मथित) तथा मथते (फेंट
लेते) हैं। इस पदार्थ की आमलक के आकार की वटी बनाकर, तप्त तैल में
डालकर पकाते हैं (छान लेते)। फिर वेसवार (मसाला) तथा वक्र के साथ वेसन
वटिका (बड़ी) को डाल देते हैं (सिप्त्वा)- इस निर्माण को 'पक्व वटी' नाम
दिया गया है (नाम्ना पक्व वटी स्मृता)।
ख. गुण-कर्म-प्रभावस्वरूप आदि
१. आह्लादिक (मन को प्रसन्न करने वाली)
२. मृगदृशा (मृग के समान नेत्र)
३. स्पष्ट स्वरैरपि विलोलित सर्वगात्रा (स्पष्ट स्वर से सम्पूर्ण शरीर में संवेदना-गति
उत्पन्न करने वाली)
४. स्नेहाधिका सुमधुरारुण सर्वदेहा (अश्रु प्रतिरोधक-वेटी के समान मृग नेत्र सत्
कोमल मन को प्रसन्नतादायक)।
५. नीराहराऽतिरुचिरा च वटी च वेटी) (परिपाक के समय स्पष्ट स्वरों के साथ
सम्पूर्ण अंगों में कम्पन+उत्पादक)।
६. अधिक तैलादि स्नेह, युक्त, मधुर तथा अरुण वर्णयुक्त, रस से भरी हुई वटी
या चेटी अति रुचिवर्धन होती है।
अथ संस्कृतचणकस्य गुणाः
चणकः कृतसंस्कारः कफघ्नो लघुदीपनः।
शीतलो रूक्षविष्टम्भी वातकृत्पुंस्त्वनाशनः॥ ३१॥
संस्कृत चणक
गुण-कर्म- विविध प्रकार से संस्कृत चणक (चना) तथा उससे निर्मित पदार्थों
के गुण इस प्रकार हैं-