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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

१९८ क्षेमकुतूहलम्
सर्वे मज्जाभवाः प्रोक्ता मोदका मोदकारकः।
धातुपुष्टिकरा बल्याः स्वनिमित्तगुणावहाः॥५५॥
कूष्माण्ड मज्जा मोदक
क. विधि- कूष्माण्ड फल-बीज त्वक् निष्कासित की मज्जा (गूदा) को स्विन्न कर
लेते हैं, तथा पिष्ठी बनाकर घृत में भर्जित करते (भूनते) हैं फिर खण्डपाक
(चाशनी) मिलाकर, मोदक बनाते हैं।
नारिकेल मज्जा मोदक- नारिकेल (नारियल) की मज्जा को खण्डित (छोटे-
छोटे टुकड़े कर), दुग्ध पाक तथा घृत में भजित करते हैं, खण्डपाक का
सम्मिलन किया जाता है-इस रीति से मोदक बना लेते हैं।
अन्य मज्जा मोदक- इसी विधि से अन्य बीजों तथा मज्जा से मोदक का
निर्माण किया जाना चाहिए।
ख. गुण- सामान्यतः, समस्त प्रकार के मोदक मन (चित्त) को मुदित (प्रसन्न) करने
वाले होते हैं अतः मोदक नामकरण है-
१. मोदकादक २. धातुपुष्टिकारक
३. बल्य ४. स्वनिमित्त गुणावह (स्रोत-द्रव्य मज्जा के अनुसार
मोदक गुण युक्त)।
अथ दुग्धप्रकार
अथ दुग्धस्य निस्नेहसक्तुनिर्माणविधिः
दुग्धं विनष्टं निर्गाल्यं भृष्ट्वा भृष्ट्वाऽन्तरान्तरम्।
सखण्डं गालयेद्वस्त्रान्निःस्नेहं सक्तुवद्भवत्॥५६॥
पाकपिण्डीकृतं दुग्धं नवमृन्मयभाजने।
मर्दितं गालितं चापि वस्त्रे स्यात्सक्तुसन्निभम्॥५७॥
दुग्ध प्रकार
दुग्ध स्नेह रहित सक्तु
दुग्ध (विनष्ट) को पाक करके बनाया हुआ खोया (मावा), वस्त्र निर्गाल्य
(निचोड़ कर) तथा दुग्ध की भृष्ट करके (भृष्ट्वा भृष्ट्वाऽन्तरान्तरम्), सखण्डित (छोटे-
छोटे टुकड़े कर) वस्त्रगालन (गालपेद्वस्त्रात्निस्नेहम्) या छानकर स्नेहविहीन कर लेते
दशमोत्सवः १९९
हैं- जो सक्तु (सत्तू) के समान प्रतीत होता है (सक्तुवद्भवेत)। इसमें सत्तू के समान दुग्ध
हो जमा करता है॥५६-५७॥
अथ क्षीरवटक-वटीनिर्माणविधिः
मरीचिगर्भीता नष्टदुग्धजा वटका वटी।
पक्त्वा घृते क्षिपेत्क्षीरे खण्डपाकेऽथवा क्षिपेत्॥५८॥
क्षीर-वटक
दुग्ध (मरीचिगर्भीता नष्ट दुग्धजा) का छैना निष्कासित कर बनी वटक (या वटी)
को घृत में भर्जित (पक्त्वा घृते) कर दुग्ध में डालते हैं (क्षिपेत्क्षीरम्) अथवा खण्डपाक
(चाशनी) में डालकर रख देते हैं (क्षिपेत्)। यह क्षीर वटक या क्षीर वटी का निर्माण
हो जाता है॥५८॥
अथ क्षीरलड्डुकनिर्माणविधिः
नष्टं दुग्धं शिलापिष्टं युक्तं तण्डुलपिष्टकैः।
घृते पक्त्वाऽथ संचूर्ण्य खण्डपाकेऽथ मिश्रितम्॥५९॥
मोदकादिप्रकाराणां हेतुतामुपगच्छति।
क्षीर लड्डूक
दुग्ध के खोया (नष्ट दुग्ध) की पिष्ठि (शिलापिष्टम्), में शर्करा (स्वच्छ) तथा
तण्डुल पिष्ट (चावल की पिट्ठी) मिलाकर, घृत में पाक करके, खण्डपाक (चाशनी) का
सम्मिश्रण कर देते हैं। इसरीति से यह द्रव्य मोदक आदि निर्माण के लिए उपयुक्त हो
जायेगा (मोदकादिप्रकाराणां हेतुतामुपगच्छति)॥५९१/२॥
अथ स्वादुलड्डुकनिर्माणविधिः
शालिपिष्टयुतं क्षीरं घृतं तेन तु कारिता।
वटिका घृतसंपक्वा पिण्डदुग्धे सशर्करे॥६०॥
मेलिता विविधस्वादुलड्डुकानां च हेतवः।
स्वादु लड्डूक
शालि (जड़हन चावल) की पिष्ठी (पीठी) को दुग्ध में पाक करके, घृत मिश्रित
कर तथा पका कर, शर्करायुक्त निर्माण करते हैं। जो अनेक प्रकार के स्वाद युक्त होते
हैं (मेलिता विविधस्वादुलड्डुकानां च हेतवः)॥६०१/२॥