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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 136 में से

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पृष्ठ 98

१९० क्षेमकुतूहलम्
५. हृद्य (हृदयबलदायक)
६. दाहनाशन विशेषतः (जलन को शान्त करने वाला, विशिष्ट प्रभाव)
अथ कणिकान्नलड्डुकनिर्माणविधिः
कणिका सर्पिषा मिश्रा तोयपिण्डितमर्दिता।
तस्या मौक्तिकसदृशास्तुल्यास्तन्त्वादिनाऽथवा॥१८॥
वर्तिवत्सेविकाः स्थूलास्त्वथवाऽभीष्टमात्रया।
सुपक्वा सर्पिषि मिते खण्डपाकविमिश्रिताः॥१९॥
वर्तुलाः मोदकाः कार्यास्तुल्या वा मुष्टकेन तु।
कणिकान्न लड्डू
निर्माण विधि
गोधूम कणिका (गेहूं का मैदा) में जल मिलाकर पिण्डाकार भलीभाँति मर्दन
(मसल) कर- मौक्तिक (मोती) के समान, तन्तु समान, वर्ती जैसे या बड़े छोटे
(अभीष्ट) जैसे चाहें, सेव बनाते हैं; फिर इनको घृत में पका लेते हैं, तथा अनुमि खण्ड
पाक (शक्कर की) चाशनी मिलाकर) करते हैं, इस द्रव्य के मोदक-मुट्ठी जैसे या
वर्तुल-गोल आदि आकृति के निर्माण कर लेते हैं॥१७-१९ १/२॥
अथ गोधूमचूर्णलड्डुकनिर्माणविधिः
ईषद्वृतेन संमिश्रा कणिका भर्जिता मनाक्॥२०॥
खण्डपाके विनिक्षिप्य मर्दयेद्दृढपाणिना।
ततस्तया विनिर्मायं यावदिष्टप्रमाणकम्॥२१॥
गोधूमचूर्ण लड्डुक
गोधूम चूर्ण (आटा या मेदा-कणिका) को घृत में भर्जित (भून) कर, खण्डपाक
(शक्कर की चाशनी) करते हैं- इस द्रव्य को हाथ से बलपूर्वक मसलते हैं (मर्दयेद्दृढ-
पाणिना), तत्पश्चात् स्वेच्छानुसार (इष्ट प्रमाणकम्)- उपयुक्त (अभिलाषित) आकृति।
प्रमाण में लड्डू का निर्माण करते हैं॥२०-२१॥
अथ दीर्घलड्डुकनिर्माणविधिः
मोदकाः खण्डपाकेन यदि तेनापि वेष्टयेत्।
श्लक्ष्णयेच्छ्लक्ष्णहस्तेन ततस्तान् सौरभोत्कटान्॥२२॥
दशमोत्सवः १९१
दीर्घलड्डूक
गोधूम चूर्ण को खण्डपाक करके-सुगन्धित बनाकर, स्निग्धपाणि (चिकने हाथों
से)- हाथों से लम्बे (दीर्घ) मोदकों का निर्माण करते हैं॥२२॥
अथ चित्तमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
उत्कृष्टशर्करापाके घृतभृष्टः सुवर्तिभिः।
बद्धः कर्पूरसुरभिर्मोदजश्चित्तमोदकः॥२३॥
एवं बहुविधाः कार्या गोधूमान्नस्य लड्डुकाः।
स्थूला वा सूक्ष्मकाश्चापि पक्वखण्डविमिश्रिताः॥२४॥
मोदका मरिचैलाभिर्वासिता नृपवल्लभाः।
सेववर्तिकया ये स्युर्नाम्ना ते तन्तुलड्डुकाः ॥२५॥
स्थूलसेवभवाः स्थूलाः सूक्ष्माजाः सूक्ष्मसंज्ञकाः।
सेवमौक्तिजसदृशास्ते स्युर्मौक्तिक लड्डुकाः॥२६॥
इत्येते सेवजा ख्याताः विशेषप्राप्तसंज्ञकाः।
लड्डुका जगति ख्याताः कणिकाप्रभृतेरपि॥२७॥
चित्तमोदक
क. विधि
उत्कृष्ट शर्करा (खण्ड) पक्व, घृत भर्जित, सम्यक् रूप से वर्ति समान बद्ध,
सुगन्धित (कर्पूर आदि सुरभि द्रव्यों से सुवासित) तथा चित्त (मन) को प्रसन्न (आह्लाद)
देने वाला मोदक 'चित्तमोदक' कहलाता है। इसी भाँति गोधूम चूर्ण से विभिन्न प्रकार के
मोदक (लड्डू) बनाये जा सकते हैं।
ख. वैशिष्ट्य
इस रीति से निर्मित मोदक (लड्डू) स्थूल (बड़े) या छोटे (सूक्ष्म), खण्डपाक
युक्त, एला चूर्ण से सुगन्धित मोदक राजाओं (नृपवल्लभाः) के लिए प्रिय होते हैं।
सेवों (वर्तिकाओं) से निर्मित मोदक 'तन्तुमोदक' का नाम ग्रहण करते हैं। ये
स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों प्रकार के होते हैं। मौक्तिक (मोती) समान सेवों से बने मोदक
'मौक्तिक लड्डू' कहे जाते हैं। इस तरह विभिन्न (अनेक) प्रकार के सेवों से बने मोदक
उसी विशेष नामों की संज्ञा प्राप्त करते हैं।