क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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मत्स्य लड्डूक
क. विधि- मत्स्य (मछली)- चर्मविहीन- को तक्र में स्विन्न करके- निष्कण्टक
(काँटा निकालना) कर, तक्र के साथ मर्दन (मसले) फिर, इस पदार्थ 'शालूक'
(कमलकन्द) का मिश्रण करते हैं- इस मिश्रण को पिष्ट करके, इससे सेव (या
बूँदी) बनाकर, तप्त घृत में पका लेते हैं। इसको तैल में पकाने से विषमगंध या
दुर्गन्ध का निराकरण हो जाता है। इस द्रव्य (सेव) को खण्डपाक में सम्यक् रूप
से मिश्रित कर देते हैं तथा लड्डुक (मोदक) बनाते हैं। यदि आमगंध (दुर्गन्ध) है,
तब पुनः तैल में पाक करना चाहिए।
ख. गुण-
१. बल्य (शरीर बल वर्धक)
२. गुरु (भारी, गरिष्ठ, दुर्जर)
३. देह-शक्तिदा बल्य (देह अंग-प्रत्यंग शक्तिवर्धन)
४. कफकारक (श्लेष्महर)
५. वृष्य (वाजीकरण)
६. अनिलहर (वातनाशक)
७. किंचित् पित्त प्रकोपक (कुछ पित्त का कोप करने वाला)
अथ मांसलड्डुकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
इत्थमेव विधातव्या मांसस्यापि हिलड्डुकाः।
अप्सु संस्विन्नमन्नेन मिश्रितेन कणीकया॥३९॥
मत्स्यमांसस्य रीत्या तु कर्तव्या मांसलड्डुकाः।
गुणा मांसानुसारेण ज्ञातव्या लड्डुकेषु च॥४०॥
मांस लड्डूक
क. विधि- मत्स्य मोदक की विधि (पूर्वोक्त) के समान मांस के लड्डुओं का निर्माण किया
जाता है। मांस को जल में स्विन्न करके, अन्नचूर्ण का मिश्रण करके, मांस के छोटे या
अभीष्ट आकृति (एवं प्रमाण) के लड्डू बनाते हैं (मत्स्यमांसस्य रीत्या तु कर्तव्या मांस
लड्डुकोः) जिसमें मत्स्य लड्डू की रीति का अनुसरण करने का निर्देश है।
ख. गुण- मांस लड्डूक के गुण, प्रयुक्त मांस के समान (प्राणः) होते हैं (गुण
मांसानुसारेण ज्ञातव्या लड्डुकषुच)।
दशमोत्सवः १९५
अथ शालूकलड्डुकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
शालूकं स्वेदितं निस्त्वक् पिष्टिकां कारयेत्ततः।
वर्तयित्वा तथा सेवा घृते तप्ते पचेत्ततः॥४१॥
सेवानां लड्डुकं कार्यं पक्वखण्डेन वेष्टितम्।
तदीयमौक्तिकैः कार्यं श्रेष्ठं मौक्तिक्लड्डुकम्॥४२॥
तयैव चूर्णितया वा पक्वखण्डविमिश्रितम्।
मांसलड्डुकवद्रीत्या सर्वं कुर्याद्विचक्षणः॥४३॥
दुर्जरः कफपित्तघ्नो विष्टम्भाध्मानकारकः।
कषायो वातकृद्रूक्षः शालूकलड्डुकः स्मृतः॥४४॥
शृङ्गाटपद्मिनीबीजसंबन्धिलड्डुकादिकम्।
ज्ञातव्यं प्रागिव कृत्स्नं स्वबुद्ध्या कारयेद्बुधः॥४५॥
शालूक लड्डूक
क. विधि-
अ. शालूक (कमलकन्द) की स्वेदित-त्वक् रहित करके, पिष्टिका बनाते हैं, जिससे
सेव (या बूँदी) को तप्त घृत में पाक करते हैं, फिर इस पर पक्व खण्ड
(चाशनी) का मिश्रण (सम्यक् रूप से) करते हैं- अन्ततः इस द्रव्य से लड्डू का
निर्माण कर लेते हैं, जो मोती के समान बूँदो के बने होने के कारण 'मौक्तिक
लड्डूक' (मोतीचूर के लड्डू) संज्ञा भी प्राप्त करते हैं।
आ. इस तरह शालूक चूर्ण में शक्कर (शर्करा खण्ड पाक) की चाशनी मिलाकर
उपयुक्त रीति से सम्मिश्रित करके, मांस लड्डूक के समान सभी पदार्थों का
निर्माण हो जाता है, जो विचक्षण (विद्वानों) का कार्य है।
ख. गुण-
१. दुर्जर ५. कषाय
२. कफपित्तघ्न ६. वातकृत
३. विष्टम्भकर ७. रूक्ष
४. आध्मान कारक
इ. शृंगष्टक (सिंघाड़ा) तथा कमलिनी (पद्मिनी) के बीजों का तथा अन्य द्रव्यों
लड्डूक-पाकशास्त्र के ज्ञाताओं को स्वबुद्धि के अनुसार, सम्पूर्ण निर्माण करना चाहिए।