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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 136 में से

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पृष्ठ 96

[पृष्ठ १]

अथ दशमोत्सवः
(दशम प्रकरण)
अथ फेनिकानिर्माणं गुणाश्च
घृतेन मोदयित्वाऽथ दधि दत्त्वा विमर्दयेत्।
कणिका वर्तिताः कुर्याद्बह्व्यस्ताः पिष्टिकावधि॥ १॥
नवनीतयुतैः पिष्टैस्तण्डुलानां च लेपयेत्।
पश्चात्तः पटवद्द्द्वेष्ट्या स्वयं वृन्तेन छदयेत्॥ २॥
द्विधा एकैकखण्डेन संप्रसार्यातिनैपुणात्।
सा च सर्पिषि संपक्वा मृद्वी पुटवती स्मृता॥ ३॥
वहिः खण्डप्रलिप्ता च फेनिकेयमिति स्मृता।
माषाजां फेणिकां केचित्केचित्क्षीरसमुद्भवाम्॥ ४॥
श्रृङ्गाटशालुकादीनामाहुर्युक्तां कणीकजाम्।
सरसैः पटलैरेता पुराणस्येव सन्धयः॥ ५॥
हसन्तीव सितत्वेन फेनिका मेनकापतिम्।
फेणिका पुष्टिनी शुभ्रा विस्तीर्णा वर्तुला लघुः॥ ६॥
निर्मांणं युक्तिभिस्तासां जानन्ति कुशलः स्त्रियः।
फेनिका (फेणिका प्रकार)
(क) विधि
अ. गोधूम फणिका (मैदा) में घृत तथा दधि मिश्रित कर, पिण्ड की वर्तिकाकारं
(प्रसारण अधिकाधिक संभा०) बनाते हैं; फिर तण्डुल चूर्ण तथा नवनीत (मक्खन),
जल मिश्रित कर लेप बनाकर, उस पर लगा देते हैं। इसे वस्त्र समान लपेटकर,
आगे के भाग को काटते हैं (प्रत्येक खण्ड के दो भाग कर लेते हैं, फिर उसे
फैलाकर, घृत में छान लेते हैं, जिससे यह मृदु पुटवाली हो जाये जिसपर वाह्य
द्वेपेण खण्ड से प्रलिप्त करते हैं (चाशनी से)। इस पदार्थ को फेणिका (फेनी)
कहा जाता हैं।
आ. कतिपय व्यक्तियों द्वारा माषणा माष पिष्ट (उड़द की पिट्ठी) तथा कुछ व्यक्ति


[पृष्ठ २]

दशमोत्सवः १८७
खोया याम माना (केचितकेचित्क्षीरसमुद्भवम्) से फेमिका का निर्माण करने का
मन्तव्य प्रगट करते हैं। साथ ही, श्रृंगाटक (सिंघाड़ा), शालूक (कमलकन्द) की
पिट्ठी (पीठी) से फेनिका को बनाने का परामर्श देते हैं।
(ख) वैशिष्ट्य
यह फेनिका अपने सरस पटलों से पुराण की सन्धियो के सभाव है; तथा यह
(फेनिका) अपने श्वेत वर्ण के कारण मेनका पति हिमालय को भी हास्य पूर्ण प्रतीत
होती है। केतिका का निर्माण कुशल (पाकविद्या में निपुण) स्त्रियों को भलीभाँति
ज्ञात है, जिससे पुष्टि, शुभ्रा (सफेद), विस्तीर्णा (लम्बी-चौड़ी) वर्तुला (गोल),
लघु (छोटी) तथा अन्य आकृतियों में की फेनिका बन सकती है, इसको युक्तिपूर्वक
फेनिका निर्माण में दक्ष स्त्रियां विभिन्न आकार-प्रकार की प्रस्तुति (फेनिका हेतु)
प्रदान करती हैं।
वातपित्तहरा बल्या किञ्चित्कफकरा सरा॥ ७॥
सुस्निग्धा मधुरा शीता रुच्या गुर्वी मनोहरा।
(ग) गुण-कर्म
१. वातपित्तहरा (वात-पित्तनाशक) २. बल्या (बलवर्धक)
३. किंचित्कफकरा (कुछ कफवर्धक) ४. सरा (वातानुलोमक-सुखविरेचक)
५. सुस्निग्धा (अति स्निग्ध/ स्नेहयुक्त) ६. मधुरा (मधुर-स्वादु)
७. शीता (शीतल) ८. रुच्या (रुचिवर्धक)
९. गुर्वी (गुरु/दुष्पाच्य गरिष्ठ) १०. मनोहरा (मन को आकर्षित करने वाली)
यह फेनिका उपरोक्त गुण-कर्म द्वारा शरीर पर प्रभाव करती है, तथा एक
स्वादपूर्ण खाद्य (मधुर रसे युक्त व्यंजन) के रूप में अपना स्थान रखती है।
अथ नवनीतफेणिकानिर्माणं गुणाश्च
दुग्धाम्बुना स्विन्नमुद्गद्विदलं तण्डुलैः सह॥ ८॥
नवनीतेन दघ्ना च मिश्रं पिष्ट्वा पचेद्वटान्।
घृते तप्ते बहिः खण्डचूर्णैनोद्धूलयेदिमान्॥ ९॥
नवनीतयुता मृदी फेणिका दुग्धसंयुता।
वातपित्तहरा बल्या स्निग्धा शीताऽतिपुष्टिदा॥ १०॥