क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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विश्व में गोधूम चूर्ण तथा अन्य सम्बन्धित द्रव्यों से अनेक प्रकार के मोदक
विख्यात हैं॥२३-२७॥
बल्यो गुरुतरः शीतो मधुरो वातपित्तहा।
कफशुक्रप्रदः स्निग्धो गोधूमान्नस्य लड्डुकः॥२८॥
गुण
१. बल्य (देह बलवर्धक) २. गुरुतर (भारी/दुर्जन)
३. मधुर (मीठा, स्वादु) ४. वातपित्तहा (वात पित्तनाशक)
५. कफ प्रद (कफ वृद्धिकर) ६. शुक्रजनन (वीर्यवर्धक)
अथ माषलड्डुकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
माषपिष्टभवाः सेवा सेवा वा मुद्गपिष्टजाः।
सुदर्या छिद्रमार्गेण विश्राव्य घृतपाचिताः॥२९॥
खण्डपाकस्य योगेन यान्ति मोदकहेतुताम्।
माषस्य च गुरुः स्निग्धो मोदको बलशुक्रदः॥३०॥
उष्णः संतर्पणो वृष्यः स्वादुपाकोऽनिलापहः।
माष लड्डुक
क. विधि
माष (उड़द) या मुद्ग (मूँग) की पिष्टी करे, सुदर्वी (उपयुक्त तथा अच्छी प्रकार
की करछुल) के छिद्रों से पातन (गिराकर) सेव निकालकर, घृत में पाक कर लेते हैं,
तथा खण्डपाक (चाशनी) मिश्रित कर, मोदक का निर्माण उपयुक्त रीति से किया
जाता है।
ख. गुण
१. गुरु (गरिष्ठ) २. स्निग्ध (चिकनाहट पैदा करने वाला)
३. बलदायक (शरीरबलवर्धन) ४. शुक्रदायक (शुक्रजनन)
५. उष्ण (गर्म) ६. सन्तर्पण (तृप्तिदायक)
७. वृष्य (वाजीकरण) ८. स्वादुपाक (मधुरपाक)
९. अनिलापह (वातनाशक)
दशमोत्सवः १९३
अथ माषमुद्गकोद्रवतण्डुलानां पर्पटलड्डुकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पर्पटैर्घृतसंभृष्टैश्चूर्णितैः खण्डमिश्रितैः।
कणिकालड्डुकाकारं कर्तव्यं च यथेप्सितम्॥३१॥
त एव पक्वखण्डेन लेपिता मोदका बहिः।
पर्पटस्य समुद्भूतो लड्डुको रुचिकारकः॥३२॥
विशेषोऽत्रान्नजो ग्राह्यो विपाके मधुरो हि सः।
पर्पट लड्डुक
क. विधि- माष (उड़द), मुद्ग (मूँग) तथा कोद्रव (कोंदो) धण्डुल (चावल) के चूर्ण
में खण्ड (शर्करा) मिश्रित करके- जल मिलाकर (उचित मात्रा में) के साथ
पिण्ड बनाकर, पर्पट (पपड़ी) के आकार का बना लेते हैं, ऊपर से खण्डपाक
(चाशनी) से आलेपित कर देते हैं। इस पर्पट-स्वरूप द्रव्य से मोदक (लड्डू) का
निर्माण किया जाता हैं।- यही 'पर्पट लड्डुक' होता है।
ख. गुण-
१. रुचिकारक (रोचन-रुचिवर्धन)
२. अन्नजमोदक (अन्न से निर्मित मोदक ग्रहणीय विशेषरूपेण)
३. मधुरविपाको (मोदक सं.-२ पर प्रदर्शित)
अथ मत्स्यलड्डुकनिर्माणविधिगुणाश्च
गतत्वङ्मत्स्यखण्डानि तक्रेणोत्स्वेदयेन्मनाक्।
ततो निष्कण्टकं कृत्वा तक्रेणातिविमर्दयेत्॥३३॥
अथ वस्त्रेण निर्गाल्य स्विन्नशालूकमिश्रितम्।
शिलायां पेषयेत्तौ च पिष्टिकां कारयेत्ततः॥३४॥
वर्तयित्वा तथा सेवान् पचेत्तन्मृदुते भृशम्।
तैले विषमगन्धस्य निवृत्त्यर्थं पचेदथ॥३५॥
सेवा ये मौक्तिकनिभाः पक्वखण्डेन वेष्टिताः।
अथ वै मुद्गपिष्टेन पक्वे सेवस्य बन्धनम्॥३६॥
कृत्वैवं तत्तु खण्डेन इति केचिद्ब्रुवन्ति च।
आमगन्धनिवृत्त्यर्थं पुनस्तैलेन पाचयेत्॥३७॥
मत्स्यजा लड्डुका बल्या गुरवः कफकारकाः।
वृष्यानिलहराः प्रोक्ताः किञ्चित्पित्तप्रकोपकाः॥३८॥